शाद अज़ीमाबादी वो इज़्ज़त-ओ-शोहरत नहीं मिली जिसके वो मुस्तहिक़ थे।

8 जनवरी 1846 को बिहार के अज़ीमाबाद में पैदा हुए सैयद अली मोहम्मद को दुनिया आज शाद अज़ीमाबादी के नाम से जानती है। अज़ीमाबाद और उसके आसपास का इलाक़ा, एैसी सरज़मीन है जहाँ फ़नकार तो पैदा होते हैं लेकिन उनकी क़द्र उसी सरज़मीन पर नहीं होती है। शाद अज़ीमाबादी के साथ भी ऐसा ही हुआ; उन्हें वो इज़्ज़त-ओ-शोहरत वहाँ नहीं मिली जिसके वो मुस्तहिक़ थे। नक़्क़ादों ने भी उन पर ख़ास तवज्जो नहीं दिया; शायद वो भी यही समझते रहे कि अच्छे शायर और फ़नकार तो दिल्ली, आगरा, लखनऊ और हैदराबाद जैसे शहरों में ही पैदा होते हैं। शाद अज़ीमाबादी को पहचाना तो अल्लामा इक़बाल ने पहचाना, शाद को 25 अगस्त 1924 को लिखे गए ख़त मे वो लिखते हैं, के अगर अज़ीमाबाद (पटना) लाहौर (उस वक़्त पंजाब) से दुर न होता तो वोह ख़ुद शाद अज़ीमाबादी से दर्स लेने अज़ीमाबाद यानी पटना आते।

ढूँडोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम
जो याद न आए भूल के फिर ऐ हम-नफ़सो वो ख़्वाब हैं हम

रफ़्ता-रफ़्ता शाद और उनकी शायरी पहचानी गई। उन पर मज़ामीन लिखे जाने लगे। उनके फ़न पर कुछ काम हुआ लेकिन अभी बहुत कुछ काम होना बाक़ी है। ख़ानक़ाही रंग और वजदानी कैफ़यत के इस दरवेशनुमा शायर शाद अज़ीमाबादी का इंतक़ाल 7 जनवरी 1927 को हुआ जिसने उर्दू अदब की दुनिया में न सिर्फ़ बिहार का नाम बल्की पुरे मुल्क का नाम रौशन किया। शाद बुद्ध की सरज़मीन में पैदा हुए थे। इस महात्मा के ज़िन्दगी से वो बहुत मुतास्सिर नज़र आते हैं। हिन्दी और फ़ारसी ज़बानों का भी उनकी शायरी पर गहरा असर दिखाई देता है। शाद ने अमीरी और रियासती शान व शौकत में आंख खोली थी। अरबी, फ़ारसी और दीनीयात की शिक्षा योग्य शिक्षकों से प्राप्त की। इस्लाम के साथ साथ अन्य धर्मों का भी अध्यन किया। मानवता उन के अन्दर कूट कूट कर भरी हुई थी।

शायरी में उल्फत हुसैन फ़रियाद अज़ीमबादी की शागिर्दी में इस्लाह हासिल की। उन्होंने कुछ ग़ज़लों में सफ़ीर बलगरामी की भी इस्लाह ली। मीर अनीस और मिर्जा दबीर की सुहबतों से भी बहुत फ़ैज़याब हुए। शाद अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा भी जानते थे। उनका ननिहाल पानीपत था। एक बार वे वहां गए और हाली से मुलाकात की। अलीगढ़ भी गए और वहां सर सैयद से भी मुलाकात हुई। उनके साथ विडंबना यह रही कि उनके एक दीवान और कोषाध्यक्ष ने उनके राज्य और जागीर का बड़ा हिस्सा बेच दिया और रुपया हड़प लिया; जो हज़ारों और लाखों में खेलता था उसे अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में केवल एक हज़ार रुपया मासिक सहायता पर गुज़र-बसर करनी पड़ी।

शाद कई साल तक पटना में मजिस्ट्रेट रहे। उनकी साहित्यिक सेवाओं के बदले में सरकार से ”ख़ान बहादुर” के ख़िताब से नवाज़ा। ”मयख़ाना इल्हाम” के नाम से उनका दीवान छपा। मर्सिया, रुबायात, मसनवी और नसर की कई किताबें उनकी यादगार हैं। शाद को अपने युग का मीर कहा गया है। शाद ने उर्दू अदब के हर पहलू पर काम किया, क़सीदा, मर्सिया, मसनवी, कतआ, रुबाई और ग़ज़ल सभी शैलियों पर उन का कलाम मौजूद है। ग़ज़ल आपको बहुत प्रिय था। शाद अज़ीमाबादी बिहार के सबसे सफ़ल कवी माने जाते हैं, क्युंके आलोचकों ने भी उनकी कविता की सराहना की है।

उनकी मशहूर किताबें “फरोग हस्ती” 1857 में, “कुल्लियाते शाद” 1975 में और “रुबाइयात” बेहद लोकप्रिय रहीं। 1857 की क्रांति के नायक पटना के “पीर अली” पर लिखी उनकी नावेल भी बहुत मशहुर हुई। “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में” जैसी इंक़लाबी नज़्म लिखने वाले बिस्मिल अज़ीमाबादी उनके शागिर्द थे, जिन्होने यह नज़्म 1921 में लिखी थी। जिस काग़ज़ पर यह नज़्म लिखी गई है, उस पर उनके उस्ताद शायर शाद अज़ीमाबादी ने सुधार भी किया है। इसकी मूल प्रति आज भी बिस्मिल अज़ीमाबादी के परिवार के पास सुरक्षित है और इसकी नकल खुदाबख्श लाइब्रेरी में रखी हुई है।

शाद अज़ीमाबादी की एक मशहुर ग़ज़ल

तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
खिलौने दे के बहलाया गया हूँ।

दिल-ए-मुज़तर से पूछ ए रौनक़-ए-बज़्म
मैं खुद आया नहीं लाया गया हूँ।

लहद में क्यों न जाऊँ मुँह छुपाए
भरी महफ़िल से उठवाया गया हूँ।

न मै था मक़सद-ए-एजाज़-ए-मय का
बड़ी मुश्किल से मनवाया गया हूँ।

हूँ इस कूंचे के हर ज़र्रे से वाक़िफ़
इधर से मुद्दतों आया गया हूँ।

सवेरा है बहुत ए शोर-ए-महशर
अभी बेकार उठवाया गया हूँ।

सताया आके पहरों आरज़ू ने
जो दम भर आप में पाया गया हूँ।

क़दम उठते नहीं क्यों जानिब-ए-दह्र
किसी मस्जिद में बहकाया गया हूँ।

अदम में किसने बुलवाया है मुझको
के हाथों हाथ पहुँचाया गया हूँ।

कुजा मैं और कुजा ए शाद दुनिया
कहाँ से किस जगह लाया गया हूँ।


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