शहीद जगत सिंह : ग़दर आंदोलन का एक गुमनाम क्रांतिकारी

1894 को बिंजल लुधियाना पंजाब के एक सिख घराने मे पैदा हुए शहीद जगत सिंह के वालिद का नाम सदा सिंह और वालिदा का नाम किशन कौर था।

बचपन से ही जगत सिंह काफ़ी बहादुर थे, इस वजह कर 18 साल की उमर मे हीं हिन्दुस्तानी फ़ौज के 47वें सिख पलटून मे शामिल हो गए। दो साल बाद फ़ौज की नौकरी छोड़ शिंघाई चीन चले गए। फिर वहां से फ़िलीपींस गए। पर वहां अधिक दिनो तक नही टिके और वापस शिंघाई लौट आए… यहीं 1914 मे इनकी मुलाक़ात बाबा सोहन सिंह भाकना से हुई जो उस समय ग़दर पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष थे, इसके बाद जगत सिंह अपने साथियों के साथ ग़दर पार्टी से जुड़ गए।

गदर पार्टी का मक़सद प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पूरे भारत में वैसा ही ग़दर मचाना था जैसा 1857 में क्रांतिकारी सिपाहीयों ने मचाया था और इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए जगत सिंह अपने 50-60 साथियों के साथ मनीला के रास्ते नागासाकी से हांग कांग पहुंच गए, और इसके बाद भारत। इस सफ़र में उनके साथ जो लोग थे उनमे से कुछ का नाम हैं :- हाफ़िज़ अबदुल्लाह (जगराओं), कांसी राम (मारौली), रहमत अली शाह ( पटयाला), धियान सिंह (बंसीपुरा), लाल सिंह (लुधियाना), चंदन सिंह (बहराईच), कचरभालगंधा सिंह वग़ैरा।

और भारत पहुंच कर ये लोग भेस बदल कर पोर्ट से गुप्त रूप से फ़रार हो गए।
इसके बाद अंग्रेज़ो को नुक़सान पहुचाने और फ़ौजी बग़ावत को अंजाम देने के लिए एक साथ मिल कर मियां मीर, लाहौर और फ़िरोज़पुर छावनी पर हमला करने का इरादा किया।

26 नवम्बर 1914 को ग़दर पार्टी की एक मिटिंग फ़िरोज़पुर शहर के बाहर जलालाबाद रोड पर हुआ लेकिन वहां आगे के लिए किसा भी प्लान पर बात नही हो सकी।

27 नवम्बर 1914 को कर्तार सिंह सराभा के साथ सब लोग लुधयाना के लिए ट्रेन से निकले पर जगत सिंह अपने कुछ साथियों के साथ पीछे ही छुट गए और उन्होने मोगा ज़िला जाने का इरादा किया और टांगे पर सवार हो कर कचरभाल गंधा सिंह, रहमत अली शाह, धियान सिंह और चंदा सिंह के साथ उधर के लिए निकल पड़े।

रास्ते मे पुलिस स्टेशन के पास कुछ पुलिस अहलाकार थे जिनमे अधिकतर ज़ैलदार, लम्बरदार और थानेदार थे।

महेशरी पुल के पास टांगे पर बैठ कर आ रहे ग़दरीयों को पुलिस द्वारा रोका गया और उनके साथ बदतमीज़ी की जाने लगी और जब रहमत अली शाह ने उनका विरोध करते हुए सवाल किया तो उन्हे पुलिल वालों ने थप्पड़ जड़ दिया। इतना देखना था के जगत सिंह और कचरभाल गंधा सिंह ने पुलिस वाले पर हमला कर ज़ैलदार और थानेदार को वहीं पर क़त्ल कर दिया और बाक़ी पुलिस वाले एका एक हुए हमले से घबरा कर भाग गए। तमाम ग़दरी जंगल मे जा छुपे पर पुलिस ने तब तक पुरे इलाक़े को घेर लिया और आग लगा दी। धियान सिंह और चंदा सिंह वही पर शहीद हो गए। और बाक़ी सात लोग पक़ड़ लिए गए।

फ़िरोज़पुर सेशन जज ने इन सभों को अंग्रेज़ी सरकार से बग़ावत और क़त्ल के जुर्म में सज़ाए मौत दी और 25 मार्च 1915 को वतन ए अज़ीज़ हिन्दुस्तान की आज़ादी की ख़ातिर मुजाहिदे आज़ादी रहमत अली शाह, लाल सिंह , जगत सिंह और जीवन सिंह को मांटगेमरी सेंट्रल जेल जो अब पकिस्तान में है, में फांसी के फ़ंदे पर चढ़ जाते हैं।

 


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Md Umar Ashraf

Md. Umar Ashraf is a Delhi based historian, who after pursuing a B.Tech (Civil Engineering) started heritagetimes.in to explore, and bring to the world, the less known historical accounts. Mr. Ashraf has been associated with the museums at Red Fort & National Library as a researcher. With a keen interest in Bihar and Muslim politics, Mr. Ashraf has brought out legacies of people like Hakim Kabeeruddin (in whose honour the government recently issued a stamp). Presently, he is pursuing a Masters from AJK Mass Communication Research Centre, JMI & manages heritagetimes.in.

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