राजपूतों को महात्मा गांधी की सलाह

 

जाति-आधारित विमर्श से यथासंभव बचना ही चाहिए। क्योंकि एक ही जाति में सभी तरह के लोग पाए जाते हैं। लेकिन क्या कीजिए, जब जातिगत अस्मिता के नाम पर ही कुछ भी करने की छूट लेंगे, तो जाति का नाम लेकर ही संवाद करना पड़ेगा न!

जौहर-वौहर तो पुरानी बातें हो गईं। मूँछ वाले राजपूत पुरुषों ने आधुनिक समय में भी अपनी महिलाओं पर कम से कम दो उपकार किए हैं। पहला, घूंघट रूपी परदा प्रथा को कायम रखना और दूसरा, कन्या भ्रूण-हत्या।

महात्मा गांधी ने इन दोनों ही प्रश्नों पर ऐसे ‘राजपूतों’ को मनुष्यता का पाठ पढ़ाया था।

जून, 1924 में काठियावाड़ के राजपूतों ने आज के ‘ब्राह्मण महासभा’ और ‘तेली महासम्मेलन’ की तर्ज पर एक ‘राजपूत परिषद्’ का आयोजन किया था। इस महापरिषद् का आँखों देखा हाल किसी ने महात्मा गांधी को इस तरह बताया था-

“लगभग पन्द्रह हज़ार राजपूत इकट्ठा हुए होंगे। स्त्रियों की संख्या भी अनुमान से बहुत ज्यादा थी। वहाँ कम से कम एक हज़ार स्त्रियाँ आई होंगी। लेकिन परदे का इंतजाम इतना सख्त किया गया था कि अनजान लोगों तो मालूम भी नहीं हो सकता था कि परिषद् के पण्डाल में स्त्रियाँ भी बैठी हुई हैं। ठहरने के मुकाम से मण्डप तक स्त्रियाँ इस खूबी से लाई जाती थीं कि किसी को मालूम तक नहीं हो पाता था कि स्त्रियाँ जा रही हैं।”

महात्मा गांधी ने इसपर लिखा था-

“परदे के अस्तित्व पर तो खेद ही प्रकट करना पड़ सकता है। …जिन लोगों में परदे का रिवाज नहीं है, वहाँ कोई यह नहीं कह सकता कि उनमें मर्यादा का खयाल कम है। जब हम औरतों को अपनी मिल्कियत समझते थे और उनका हरण किया जा सकता था, तब परदे की जरूरत भले ही रही हो।

…यदि पुरुषों का हरण होने लगे, तो उन्हें भी परदे में रहना पड़े। जहाँ ऐसी हालत है कि पुरुष देखते ही बेगार में पकड़ लिया जाता है, वहाँ आज भी पुरुष पर्दे में अर्थात् छिपकर रहते हैं।

…लेकिन पुरुष की कुदृष्टि से स्त्रियों को बचाने का इलाज परदा नहीं, बल्कि पुरुष की पवित्रता है। पहले ही चरण में परदा उठा देना कठिन काम था, लेकिन भविष्य के लिए कुछ राजपूतों को इसके लिए तत्पर हो जाना चाहिए।”

अब बात करते हैं ‘कन्या-वध’ की। उस समय गर्भावस्था या भ्रूण में ही लड़की की पहचान नहीं की जा सकती थी, इसलिए उन्हें जन्म लेने के बाद मारा जाता था।

खासतौर पर राजपूत ही ऐसा करते थे। 1936 में बिहार के भागलपुर जिले के अमरपुर नामक गाँव में ‘राजपूत कन्या-वध विरोधिनी सभा’ स्थापित हुई। इस सभा के सचिव ने महात्मा गांधी को चिट्ठी में लिखा-

“भगवान बुद्ध ने बकरों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। आज उन्हीं की संतान अपनी सद्यःप्रसूता कन्या को मारने में लगी हुई है। मनुष्यता को कलंकित करनेवाली यह प्रथा हम राजपूतों में ही है। ऐसे भी घर हैं जहाँ एक दारोगा, एक तहसीलदार तथा पढ़े-लिखे युवक हैं। लेकिन आज 50 वर्षों से उनके घर एक भी कन्या जिंदा नहीं रखी गई।

…जरा उस दृश्य की कल्पना करें, जब बच्ची पैदा होते ही माँ उनसे अलग हो जाती है। दूध नहीं दिया जाता है, बच्ची दम घुटकर मर जाती है। यों नहीं मरी तो नमक चटाकर अथवा तम्बाकू खिलाकर मार दी जाती है। सबसे सरल तरीका तो यह है कि उसके मुँह-नाक पर मांस का लोथा रख दिया जाता है। कैसा घृणित तरीका है।

…बकरे को तो हथियार से मारते हैं, लेकिन निःसहाय मुँह से भी आवाज नहीं निकालनेवाली बच्ची को दम घुटाकर मारना— कितना अनर्थ है। पंजाब के जाट राजपूतों और जाट सिखों में भी यह कुप्रथा थी। उसे रोकने के लिए पंजाब कौंसिल में खास कानून बनवाया गया। पर हमारे यहाँ लोग संकोच करते हैं।”

महात्मा गांधी ने बहुत ही अहिंसक भाषा में राजपूतों को इसके लिए समझाने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था-

“मुझे नहीं पता कि आज राजपूत कन्या-वध के लिए कोई बहाना बताया जाता है या नहीं। …लेकिन कोई भी बहाना इस राक्षसी प्रथा को कायम रखने में कभी मान्य नहीं हो सकता है।”

तो मेरे मूँछवाले भाइयों! महिलाओं की कथित ‘रक्षा’ के लिए अतीत में आपको जौहर करवाना पड़ा। बाद में आपको ‘कन्या-वध’ करना पड़ा। हाल में भ्रूण-हत्या के भी अधिकतर मामले आपके यहाँ पाए गए।

और आज आप अपनी अप्रासंगिक हो चुकी एक तथाकथित और खोखली राजपूती अस्मिता के नाम पर भीड़-हिंसा जैसी कायरता का सहारा ले रहे हैं।

1940 के दशक में भी जब आप अपनी राजपूत महिलाओं को किसी काल्पनिक शत्रु से बचाने के लिए और अपनी प्रतिष्ठा के नाम पर खुद ही मार रहे थे, उस समय सिंध के मुसलमान अपनी बेटियों को आत्मरक्षा के लिए लाठी चलाना सिखा रहे थे। कुछ और भारतीय लड़कियाँ फौजी प्रशिक्षण ले रही थीं।

तस्वीरें संलग्न कर दी हैं, देख लीजिएगा। एक तस्वीर में गांधी भी एक राजपूत महिला के साथ ही खड़े हैं। नाम था अमृत कौर। आज़ादी के आंदोलन में भाग लेनेवाली बहादुर और कर्मठ महिला थीं।

भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री थीं और चाहती थीं कि हमारी लड़कियाँ जिएँ। चाहती थीं कि उनसे सतीपूजा न कराके उन्हें शिक्षा और अवसर मुहैया कराके आत्मरक्षा के लिए तैयार किया जाए।

स्त्रियों की रक्षा सती-पूजा, परदा-प्रथा, हॉरर-किलिंग या भ्रूण-हत्या से नहीं होगी, ये समझने के लिए अब हमें और कितनी और किस तरह की शिक्षा की जरूरत है? बंद कीजिए यह सब। आपकी महिलाएँ, आपकी बेटियाँ भी अब आप पर थू-थू कर रही हैं।

उनकी थूक की छींटे आपकी मूँछों पर पड़ रही होंगी। उन्हें पोछिए। अपने घर जाइये। अपनी बेटियों और पत्नियों से माफी मांगिए। वे बड़ी उदारदिल होती हैं। बहुत संभावना है कि माफी मिल जाएगी आपको।

प्रायश्चित के लिए उनके सामने थोड़ा रो लीजिएगा। मन हल्का हो जाएगा। मेरी सच्ची और दिली शुभकामना रहेगी कि आपकी अक्ल पर पड़ी गर्द भी उन आँसुओं से धुल जाए।

अव्यक्त


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