सैयद फ़िदा हुसैन : एक गुमनाम स्वातंत्रता सेनानी जिसे आज भुला दिया गया है।

 

मगध के गांधी कहलाने वाले सैयद फ़िदा हुसैन हिन्दुस्तान की जंग ए आज़ादी के उन अज़ीम सिपाहसालारों में से हैं जिन्हेनो कभी अपने उसुलो से समझौता नही किया।

साल 1904 में बिहार के जहानाबाद ज़िला के पिंजौरा गांव मे पैदा हुए सैयद फ़िदा हुसैन के वालिद का नाम सैयद अहमद अब्दुल अज़ीज़ था।

शुरुआती तालीम घर पर हासिल करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए फ़िदा हुसैन कलकत्ता गए; जहां से उन्होने मैट्रिक और इंटर मीडिएट का एग्ज़ाम पास किया।

फ़िदा हुसैन छात्र जीवन से ही हिन्दुस्तान की तहरीक ए आज़ादी मे हिस्सा लेने लगे थे।

1917 मे हुए कामयाब चम्पारण सत्याग्रह ने उन्हे और प्रेरित किया। इसी बीच ख़िलाफ़त तहरीक भी शुरु हो चुकी थी। बी अम्मा अपने बेटे मौलाना मुहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली के साथ पुरे हिन्दुस्तान का दौरा कर रही थी।

1919 में आए रॉलेट ऐक्ट का पुरे हिन्दुस्तान मे विरोध हुआ; इस कानून के विरोध में सम्पूर्ण भारत में हड़तालें, जूलूस और प्रदर्शन होने लगे और ‍महात्मा गाँधी जी ने व्यापक सत्याग्रह का आह्वान किया। इसी तरह के विरोध मे जालीयां वाला बाग़ मे 13 अप्रील 1919 को निहत्थी भीड़ पर गोली बारी हुई जिसके बाद पुरे हिन्दुस्तान मे गुस्सा अपने चरम सीमा पर पहुंच गया। फ़िदा हुसैन जैसे 15 साल के नौजवान का भावपक और जज़्बाती होना भावुक था; इस लिए पुरी तरह कुद पड़े हिन्दुस्तान की जंग ए आज़ादी में हिस्सा लेने के लिए।

अप्रैल 1920 में गया शहर मे आयोजित हुए ख़िलाफ़त तहरीक के एक जलसे मे हिस्सा लिया। इसी साल 5 दिसम्बर 1920 को असहयोग तहरीक को कानयाब बनाने के लिए मौलाना शौकत अली, महात्मा गांधी, मौलाना आज़ाद, स्वामी सत्यदेव वग़ैरा के साथ गया और आस पास के इलाक़े का दौरा किया।

12 अगस्त 1921 को इद उल ज़ोहा के मौक़े पर महात्मा गांधी, मौलाना मुहम्मद अली जौहर, जमना लाल बाजाज आदी के साथ पुरे मगध के इलाक़े का दौरा किया; एक स्वंयसेवक और रज़ाकार की हैसियत से फ़िदा हुसैन भी इन लोगो के साथ पुरे मगध का दौरा किया और नौजवानो को तहरीक ए आज़ादी में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया।

1922 में देशबंधु चितरंजन दास की सदारत में गया में हुए कांग्रेस के 37वें अधिवेशन को कामयाब बनाने के लिए एक रज़ाकार और स्वंयसेवक के रुप में जी जान लगा दिया। उनकी दिन रात की हुई मेहनत की ख़ुब तारीफ़ हुई और मगध इलाक़े मे एक स्थापित कांग्रेसी नेता के रुप में उन्हे जनमानस में ख्याति मिली।

14 जनवरी 1927 को महात्मा गांधी खादी वस्त्र के प्रचार और जन जागरण के सिलसिले में धनबाद होते हुए मगध के इलाक़े में आए तब फ़िदा हुसैन ने उनका भरपुर साथ दिया। और उन्होने महात्मा गांधी के सामने ही खादी वस्त्र धारण किया और उसका आजीवन पालन भी किया।

1928 में फ़िदा हुसैन ने साईमन कमीशन का विरोध करते हुए अपने साथियों के साथ एक विशाल जुलुस निकाला। बिहार की राजधानी पटना मे सैयद हसन ईमाम की सदारत में हो रहे साईमन कमीशन विरोधी आयोजन मे खुल कर हिस्सा लिया और अपनी मज़बुत उपस्तिथी दर्ज करवाई।

19 दिसम्बर 1929 को जवाहर लाल नेहरु की सदारत में हुए लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में पुर्ण स्वाराज की मांग करते हुए 26 जनवरी को स्वातंत्रता दिवस मनाने का फ़ैसला किया गया। तब भला फ़िदा हुसैन कैसे ख़ामोश बैठने वाले थे ? 26 जनवरी 1930 को उन्होने बड़े ही धुमधाम से स्वातंत्रता दिवस का आयोजन किया।

इसी साल 1930 में गांधी की क़यादत में नमक सत्याग्रह छिड़ा और डाण्डी मार्च हुआ। फ़िदा हुसैन ने भी इसमे अपने तरीक़े से हिस्सा लिया और विदेशी सामानो की होली जलाई; साथ ही भांग, गांजा, ताड़ी और शराब की दुकान को शांतिपूर्ण ढंग से बंद करवा दिया। जिसके नतीजे में फ़िदा हुसैन अपने साथियों सहीत गिरफ़्तार कर लिए गए और छ: माह जेल की चक्की पीसने के बाद आज़ाद हुए।

23 मार्च 1931 को लाहौर सेन्ट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को दी गई फांसी की गर्माहट बिहार सहीत पुरे देश ने महसुस किया और इसका असर फ़िदा हुसैन पर भी पड़ा और वो उग्र राष्ट्रीयता की अग्रसर हुए। फांसी के विरोध मे फ़िदा हुसैन की क़यादत में पुरे मगध मे विरोध सभाओं का आयोजन हुआ। इसी क्रम में 30 और 31 मई 1931 को डा राजेंद्र प्रासाद की सदारत में जहानाबाद अनुमण्डल (अब ज़िला) में राजनीतिक सम्मेलन हुआ। इसमे फ़िदा हुसैन ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और उनकी सेवा भावना ने सभी का दिल जीत लिया। स्वंय राजेंद्र प्रासाद ने उनकी तारीफ़ की।

1934 में आए भुकंप ने पुरे बिहार में तबाही मचा दी; तब फ़िदा हुसैन भुकंप पीड़ित लोगों की सेवा में दिन रात जुटे रहे और उनकी मदद के लिए चंदा भी इकट्ठा किया।

अंग्रेज़ो के ज़ुल्म से भारत को आज़ाद कराने के लिए फ़िदा हुसैन ने ना सिर्फ़ आंदोलन किए बल्के क्रांतिकारी पत्रकारिता कर लोगो को जागरुक भी किया।

आप क्रन्तिकारी पत्रिका लिखते थे जिसका नाम आपने “चिंगारी” रखा, जिसमे आप अंग्रेजों के ज़ुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से अंग्रेज़ो का मुख़ालफ़त करने की अपील करते थे।जहानाबाद से निकलने वाले इस पत्रिका के प्रकाशन और वितरण की ज़िम्मेदारी फ़िदा हुसैन ने अपने हाथ मे ले रखी थी।

फ़िदा हुसैन किसान आंदोलन में भी आगे आगे रहे, सबसे पहले शाह मुहम्मद ज़ुबैर की क़यादत में किसान आंदोलन में हिस्सा लिया फिर उनके भाई के शाह मुहम्मद उमैर के साथ मिल कर इस तहरीक को मज़बुत किया। यदुनन्दन शर्मा, रामानन्द मिश्र, मोहनलाल गौतम जैसे किसान नेताओं के साथ मिल कर किसान हित में बहुत से काम अंजाम दिए।

इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना के स्वर्ण जयंती समारोह में डॉ राजेंद्र प्रासाद की सरप्रस्ती में 28-30 दिसम्बर 1935 को जहानाबाद में प्रभात फेरी, खादी प्रर्दशनी, कांग्रेस की उपलब्धियों पर व्याख्या, शहीदों की क़ुर्बानीयां जैसे कई मुद्दे पर अनेक कार्यक्रंमों के आयोजन मे अहम भुमिका निभाई।

स्वामी सहजानन्द सरस्वाती के साथ मिल कर किसानों की समस्या को 1937 में गठित कांग्रेस मंत्रिमण्डल का सामने रखा।

1938 में कांग्रेस के सदर नेता जी सुभाष चंद्रा बोस के मगध दौरे को कामयाब बनाने में फ़िदा हुसैन आगे आगे रहे।

1940 में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की सदारत में हुए कांग्रेस के 53वें अधिवेशन में फ़िदा हुसैन ने ना सिर्फ़ हिस्सा लिया बल्के कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए।

1940 में ही फ़िदा हुसैन व्यक्तिगत सत्याग्रह में हिस्सा ले कर जहानाबाद अनुमण्डल (अब ज़िला) के पहले सत्याग्रही बने।

अगस्त की क्रांति को कामयाब बनाने में कोई क़सर नही छोड़ी। 8 अगस्त 1942 को गांधी जी की क़यादत में जैसे ही युसुफ़ जाफ़र मेहर अली ने ‘अंग्रेज़ो भारत छोड़ो’ का नारा दिया पुरे भारत मे इंक़लाबी लहर दौर पड़ी; फ़िदा हुसैन ने भी अपने साथियों के साथ मिल कर पुरे मगध इलाक़े में इस आंदोलन जान डाल दी। सरकारी दफ़्तर पर क़ब्ज़ा कर लिया; हथियार लुट कर पुलिस स्टेशन को आग के हवाले कर दिया। इस दौरान फ़िदा हुसैन के कई क्रांतिकारी साथी पुलिस की गोली का शिकार भी हुए। फ़िदा हुसैन भी गिरफ़्तार कर लिए गए और भागलपुर सेंट्रल जेल भेज दिए गए।

अक्तुबर 1946 में कांग्रेस द्वारा बिहार में दंगा भड़काया गया; फ़िदा हुसैन ने इसे रोकने की बहुत कोशिश की, पर नाकामयाब हुए। 1947 में दंगा पीड़ित का हाल चाल लेने गांधी फिर मगध इलाक़े मे आए तब फ़िदा हुसैन उनके साथ पुरे इलाक़े का दौरा किया। स्थानीय नेता की हैसियत से जो भी हो सकता था फ़िदा हुसैन ने लोगों की मदद की; साथ ही बाहर से आए तमाम नेताओं को हालात से रुबरु करवाया। उस समय मगध पर पुरे भारत की नज़र थी और पुरे भारत से लोग यहां राहत कार्य के लिए आए थे। जवाहर लाल नेहरु, मौलाना आज़ाद, सैफ़ुद्दीन केचलु, सरदार पटेल, ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, जनरल शाहनवाजय सहीत सैंकड़ो चोटी के नेता ने इस इलाक़े मे अपना डेरा डाल रखा था।

स्वातंत्रता प्राप्ति के बाद फ़िदा हुसैन 1957 में कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ा और जहानाबाद सीट से विधायक बने और दुबारा उसी सीट से कांग्रेस के टिकट पर 1967 में विधायक चुने गए। बिहार विधानसभा के सदस्य के रुप में जनहित से जुड़े कई सवाल को मज़बुती से उठाया।

सन 1980 में सैयद फ़िदा हुसैन का इंतक़ाल जहानाबाद में हुआ और इसके साथ ही मगध में गांधी युग के मज़बुत स्तंभ का अंत हो गया।

‘मगध के गांधी’ के नाम से मशहुर सैयद फ़िदा हुसैन हमेशा अवसरवाद, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, पूंजीवाद से लड़ते रहे। अपनी ईमानदारी, सरलता आदर्शवादिता जैसे मानवीय गुणों की वजह कर सैयद फ़िदा हुसैन हमेशा याद किए जाएंगे।

 


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Md Umar Ashraf

Md. Umar Ashraf is a Delhi based historian, who after pursuing a B.Tech (Civil Engineering) started heritagetimes.in to explore, and bring to the world, the less known historical accounts. Mr. Ashraf has been associated with the museums at Red Fort & National Library as a researcher. With a keen interest in Bihar and Muslim politics, Mr. Ashraf has brought out legacies of people like Hakim Kabeeruddin (in whose honour the government recently issued a stamp). Presently, he is pursuing a Masters from AJK Mass Communication Research Centre, JMI & manages heritagetimes.in.

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