अरूण सिंह

1857 में स्वाधीनता संग्राम की पहली लड़ाई या सिपाही विद्रोह के वक्त पटना के तत्कालीन कमिश्नर विलियम टेलर ने पर्याप्त सबूतों के बिना ही कई लोगों को सूली पर चढ़ा दिया था। उसे इसके लिए नौकरी से निलंबित कर दिया गया। बाद में उसने पद छोड़ दिया।

इसके बाद भी टेलर पटना में काफ़ी दिनों तक रहा। उसने लोगों को कानूनी सहायता देने के लिए एक कार्यालय भी खोला। हथुआ महाराज भी उसके मुवक्किलों में थे।

टेलर ने हथुआ महाराज का एक मुकदमा लड़ा था और उन्हें छपरा की अदालत में जीत भी दिलवाई थी। विरोधी पार्टी के वकीलों ने यह कह कर विरोध किया था कि उन्हें टेलर की अंग्रेजी समझ में नहीं आएगी इसलिए उन्हें मुकदमा लड़ने की अनुमति नहीं दी जाय।

तब टेलर ने अदालत में न केवल हिंदी में बहस कर सबको चमत्कृत किया बल्कि हथुआ महाराज को मुक़दमे में जीत भी दिलवाई। इसके कुछ अरसे बाद हथुआ महाराज के विरोधियों ने इस फैसले के ख़िलाफ़ कलकत्ता हाईकोर्ट अपील की।

विलियम टेलर अपनी पुस्तक ‘थर्टी एट इयर्स इन इंडिया’ में लिखता है, ‘किसी ने मुझे बताया कि हथुआ महाराज के सलाहकारों ने उन्हें कलकत्ता में मुक़दमे की पैरवी के लिए मुझे रखने से उन्हें मना किया है। उनका कहना था कि छपरा की अदालत तक तो विलियम ठीक थे, क्योंकि वहां स्थानीय देशी वकीलों से उनका मुकाबला था। लेकिन कलकत्ता की बात और होगी। वहां एक से एक मशहूर, विद्वान, तेजतर्रार और बेहतर वकीलों से उनका मुकाबला होगा। ऐसे में टेलर को वकील बनाये रखना बेवकूफी होगी।’

‘मैंने कुछ नहीं कहा।’ टेलर ने आगे लिखा है, ‘ क्योंकि मेरी रूचि उस मुक़दमे में थी, मैं उसकी कार्यवाही देखने कलकत्ता चला गया। दोनों ओर से विशिष्ट बैरिस्टर मुक़दमे की पैरवी कर रहे थे। बहस पूरे दिन चली। जब अदालत उठा उस वक्त तक मुकदमा का रुख हथुआ महाराज के इतने विपरीत हो चला था कि आम धारणा बन रही थी कि महाराजा मुकदमा हार रहे हैं।’

‘मैं एकबारगी समझ गया था कि राजा के वकील के द्वारा फ़ारसी के एक शब्द की गलत व्याख्या के कारण हार की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी।’ टेलर ने लिखा है, ‘उस शाम मैं अपने पुराने दोस्त जॉन कोक्रेन के साथ खाना खाने के बाद कपडे बदलने की तैयारी कर ही रहा था कि नौकर ने आकर सूचना दी कि हथुआ के राजा दरवाजे पर खड़े हैं। वे मिस्टर टेलर से बात करना चाहते हैं। उन्हें एक अलग कमरे में बिठाया गया।

मैंने जैसे ही उस कमरे में प्रवेश किया वे मेरी ओर लपके। उन्होंने अपनी पगड़ी उतारी, उसे जमीन पर रखा और घुटनों के बल बैठ मेरे पांव जकड़, चिंघाड़ पड़े, ‘मैं मूर्ख हूं, मैं पागल हूं! मैं क्या कहूं ? ओह, मैंने आपको क्यों नहीं रखा ! मुझे माफ़ करें! यह लीजिये दस हजार- बीस हजार, जितने भी पैसे आपको चाहिए !’ वह तब तक सुबकते रहे जब तक मैंने उन्हें अपनी सहमति नहीं दे दी।’

विलियम ने आगे लिखा है, ‘यह दृश्य कुछ अटपटा लग रहा था। हथुआ के युवा राजा का व्यक्तित्व भव्य और आलीशान था। वे असामान्य रूप से लंबे चौड़े थे। फिर भी वे बच्चों की तरह सुबक रहे थे। जब उनका सुबकना रुका तो मैंने कहा कि मुझे बेहद दुख है लेकिन अब उनके आग्रह को पूरा कर पाना मुमकिन नहीं होगा क्योंकि उनके वकील ने तो अपनी बात रख दी है और अब अदालत इसमें हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगा।’

राजा मानने के लिए तैयार नहीं थे। किसी तरह से टेलर ने उन्हें यह समझा कर विदा किया कि अगले दिन वे अदालत में जज से अनुमति के लिए प्रार्थना करेंगे और अगर अनुमति मिल गयी तो सफल होने पर वे फीस भी ले लेंगे।

अगले दिन अदालत में मुक़दमे की कार्रवाई शुरू होने के पहले विलियम टेलर ने जज से माफ़ी मांगते हुए आग्रह किया कि राजा के आग्रह पर उन्हें इस मुक़दमे में कुछ कहने की अनुमति चाहिए।

टेलर लिखता है, ‘मैंने जज से आग्रह किया कि मुझे इस मुक़दमे में चंद शब्द कहने की इजाजत दी जाय। मैं इस मुक़दमे से भली भांति परिचित हूं। मैंने जिले की अदालत में इस मुक़दमे की पैरवी की है। मुझे महसूस हुआ है कि यहां एक शब्द की गलत व्याख्या हो रही है। मुझे अनुमति दी जाय कि मैं उस शब्द के द्वारा उत्पन्न हुई ग़लतफ़हमी को दूर करुं।’

जजों ने विलियम टेलर को अनुमति दे दी। तब टेलर ने चंद वाक्यों में जिरह में प्रयुक्त दो शब्दों ‘कुर्क’ और ‘ज़ब्त’ में फ़र्क से अदालत को अवगत करवाया। कहना न होगा कि टेलर ने यह मुकदमा जीत लिया था।