Majid Majaz

24 जुलाई 1947 को गांधी जी ने नेहरु को ख़त लिखकर उसमें बाकायदा कहा था कि अपने मंत्रिमंडल में मौलाना आज़ाद को शामिल मत करना। साथ ही साथ ये भी ज़िक्र किया था कि सरदार पटेल और राजकुमारी अमृत कौर भी मौलाना को मंत्रिमंडल में शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं।

गांधी जी ने नेहरु से कहा था कि मौलाना की जगह किसी और मुस्लिम को अपनी मंत्रिमंडल में शामिल कर लो।

सोचने की बात है कि जिस मौलाना आज़ाद का क़द कांग्रेस में सबसे ऊपर था, कांग्रेस की तमाम लीडरशिप में मौलाना सबसे अधिक विद्वान थे एवं राष्ट्र के लिए सबसे अधिक कुर्बानियाँ देने वाले शख़्स थे। पर उन्हीं को गांधी जी आज़ाद भारत की पहली कैबिनेट से बाहर रखना चाहते थे।

यही नहीं मौलाना बँटवारे को लेकर सबसे अधिक चिंतित थे। वे गांधी जी से बार बार मिलते, मौलाना को ये परेशानी खाई जा रही थी कि नेहरु और पटेल समेत कांग्रेस के लगभग सभी लीडर बँटवारे को लेकर राज़ी हो गए हैं। मौलाना, गांधी जी को आख़िरी सहारा मानते थे। मौलाना को ये उम्मीद थी कि गांधी जी बँटवारे को कभी स्वीकार न करेंगे।

मौलाना से गुफ़्तगू में गांधी जी हमेशा बँटवारे को लेकर अपना रूख स्पष्ट करते कि “अगर कांग्रेस बँटवारे पर सहमत है तो ये बँटवारा मेरी लाश पे से गुज़र कर होगा, जबतक मैं ज़िंदा हूँ मुल्क का बँटवारा नहीं होने दूँगा।”

लेकिन कुछ दिनों बाद जब मौलाना ने गांधी जी से मुलाक़ात की तो गांधी जी बिलकुल बदले बदले नज़र आ रहे थे। मौलाना के अनुसार इनकी ज़िंदगी में सबसे बड़ा धक्का उस वक़्त लगा था जब गांधी जी मुल्क के बँटवारे पर सहमत हो गए थे। गांधी जी भी सरदार पटेल की भाषा बोल रहे थे। मौलाना ने गांधी जी से लगभग दो घंटे से अधिक बहस की, मनाने की खूब कोशिश की पर उस बहस का कोई नतीजा नहीं निकला। मायूस होकर मौलाना ये कहते हुये चले आए कि ‘अब इस मुल्क को तबाही से कोई नहीं बचा सकता’।

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