प्रोफ़ेसर जाबिर हुसैन

सोचता हूं, कब मिला था मुझे वो शख़्स, और कहां! दो चार तारीख़ें हों तो याद भी रहें। इतनी तारीखें हैं, और इतनी जगहें, कि उन्हें क़ायदे से, सिलसिलेवार, याद करना कठिन है। आगे की मुलाक़ात पीछे, और पीछे की आगे, शायद यही अनुक्रम बन जाए हमारे परिचय का।

पहली मुलाक़ात शायद मुझे सही-सही याद हो। जेपी आन्दोलन के दौरान, मीसा के तहत अपनी गिरफ्तारी के बाद, मुंगेर जेल से बाहर निकलते वक़्त एक शख़्स गरमजोशी से हाथ मिलाने को आतुर!

‘अपने साथियों की ओर से आपका स्वागत करने आया हूं।’
‘कौन साथी, क्या आंदोलनकारी?’

उस शख़्स ने आगे बढ़कर कान में आईआईटी खड़गपुर और जेजे कॉलेज ऑफ आर्ट्स मुम्बई से जुड़े दो युवा क्रांतिकारियों के नाम लिए। दोनों एक भूमिगत वाम संगठन के सदस्य। लम्बे समय तक दिलावरपुर (मुंगेर) स्थित मेरे आवास में रहे साथी। मेरी एक दर्जन गांवों की यात्राओं में शरीक। कई-कई शिविरों में अपनी पहचान छिपाकर भाग लेते और नवजवानों को अपनी वैचारिकी का स्पर्श कराते साथी।

मैंने रुककर उन साथियों का हाल पूछा। कुछ के बारे में सुनकर अच्छा लगा। कुछ के किसी मुठभेड़ में मारे जाने की ख़बर ने दुखी कर दिया।

जेल गेट पर मेरी उस शख़्स से पहली ये मुलाक़ात वहीं सिमट गई।

गांधी मैदान में मजदूरों-किसानों की एक बड़ी रैली हो रही थी। उन दिनों की शायद सब से बड़ी रैलियों में एक। कई प्रखर वाम नेताओं के रैली में भाग लेने की ख़बर थी। उस वक़्त विनोद मिश्रा सब से चर्चित नामों में एक। भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन करने में महारत। उनसे मुलाक़ात की इच्छा थी। सुना था, वो भी रैली में रहेंगे, लेकिन मंच पर नहीं, जनता के बीच।

अचानक मुझे गांधी मैदान के एक कोने में जेल गेट का वो मुलाकाती दिख गया। मैं भागता-भागता उसके पास पहुंचा। आरंभिक बातचीत के बाद मैंने कहा-‘मैं विनोद मिश्रा को नहीं पहचानता। आप मदद करेंगे।’ वो शख़्स बोला-‘कुछ देर पहले तो दिखा था, इधर ही, भीड़ के बीच। क्या पता, किधर चला गया। भूमिगत है। आइए ढूंढ़ते हैं।’

मैं उस शख़्स के साथ गांधी मैदान के चक्कर लगाता रहा। विनोद मिश्रा नहीं मिले। बरसों बाद, विधान परिषद के अपने कक्ष में उनका सामना हुआ। तब वो अज्ञातवास से बाहर थे। मैंने घर से अपनी दो किताबें मंगवाईं-‘आलोम लाजावा’ और ‘दो चेहरों वाली एक नदी’। एक की भूमिका श्रीपत राय और दूसरे की मधुकर सिंह ने लिखी थी।

विनोद मिश्रा उसी शाम दिल्ली निकल रहे थे। किताबें अपने साथ लेते गए। दूसरी सुबह, दिल्ली से उनका फ़ोन आया। दोनों किताबें वो रास्ते में ही पढ़ गए थे। उन्होंने मध्य बिहार की घटनाओं को लेकर मेरी कथा-डायरियों के बारे में जो शब्द कहे, उन्हें यहां दुहराना नहीं चाहता। इतना भर कि जन-प्रतिरोध की घटनाओं का मेरा वर्णन उन्हें प्रभावित कर गया था।

नवादा जिले का कसमारा गांव, जहां नक्सलियों से गांव की सुरक्षा के लिए तैनात पुलिसकर्मियों में से एक ने रतन साव की युवा स्त्री के प्रति अपमानजनक सलूक का विरोध करने के ‘जुर्म’ ने पति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मैं अपने कुछ साथियों के साथ कसमारा पहुंचा था। घटना का ब्योरा और रतन साव की पत्नी के अंगूठे का निशान लेकर ढिबरी की रोशनी में एक दालान पर बैठा गांव के लोगों से बात कर रहा था कि अचानक वो शख़्स किसी ओर से प्रकट हो गया।

‘पुलिसवाले मुठभेड़ की एक और योजना बना रहे हैं। अब आप पगडंडी के रास्ते गांव से निकल जाएं।’

उसने इशारे से एक युवक को बड़ी टार्च लेकर हमें पगडंडी का रास्ता दिखाने को कहा। हम अपनी सांसें रोक कर दालान से उठे। बाहर वर्षा शुरू हो गई थी। हम भीगते-भागते पता नहीं कितनी दूरी तय करके शहर जाने वाली सड़क तक आए। (बाद में, उसी अर्जी की बुनियाद पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए पटना हाईकोर्ट को टीम बनाकर पूरी घटना की जांच का आदेश दिया, और सभी दोषी पुलिसकर्मियों को अदालत ने कठोर सज़ा सुनाई)।

तब के मुंगेर ज़िले के चकाई थाने में आधा दर्जन वरिष्ठ अधिकारियों ने एक युवा नर्स का वीभत्स सामूहिक बलात्कार किया। हमने दूसरे दिन ही इस घटना के विरोध में सभा की, पुलिस आतंक के माहौल में बाज़ार बंद कराया और सरकार पर कठोर कार्रवाई का दबाव डाला। कुछ अधिकारी सस्पेंड हुए, कुछ ट्रांसफर किए गए। ‘समाजवादी मूल’ के एक वरिष्ठ वकील, मुंगेर से पटना तक, बलात्कारियों के बचाव में लग गए। आगे चलकर, पूरी घटना पर आधारित एक विस्तृत रिपोर्ट ‘दिनमान’ में प्रकाशित हुई। लिखने वाले थे वरिष्ठ लेखक-पत्रकार सूर्यनारायण चौधरी।

उस दिन चकाई की जन-सभा में एक किनारे खड़ा वो शख़्स मुझे फिर दिखाई दिया। उसने बताया, पुलिस हमारी गिरफ्तारी की योजना बना रही थी, लेकिन राजधानी से एक संदेश आने पर गिरफ्तारी रुक गई!

संथालों के एक बड़े नेता फादर एन्थोनी मुर्मू की निर्मम हत्या के बाद आदिवासियों में भयानक आक्रोश फैला। पुलिस ने गोलियां चलाकर संथाल जनता का भारी दमन किया। कई संथाल मारे गए। फ़ादर मुर्मू थोड़े समय के लिए संसद के सदस्य भी रहे थे। वो आदिवासी उभार के एक प्रखर नेता थे।

एक दिन, वो शख़्स फादर मुमू की पत्नी बिवियाना बोस्की को लेकर मेरे निवास पर आया। उसने बताया, विवियाना काफ़ी तेज़ बुखार से पीड़ित थी। दवाएं आदि लेकर सारी रात उसकी देखभाल का ज़िम्मा उस शख़्स ने स्वयं उठाया। अगले दिन भी उसका इलाज चलता रहा। तीसरे दिन, हालत सुधरी तो वो अपने एक सहयोगी के साथ गांव गई। इस दौरान, मैंने उस शख़्स की सेवा-भावना देखी।

मेरे दिमाग़ में अक्सर एक सवाल उठता रहा, आखिर उसे हमारी गतिविधियों की पूरी जानकारी कैसे हो जाती है, कौन उसे हमारे कार्यक्रमों की सूचना देता है, कैसे वो गंभीर परिस्थितियों में हमारे बीच आ खड़ा होता है? दरअसल वो बिहार के तमाम अशांत क्षेत्रों की मुकम्मल जानकारी रखता था। वाम-समाजवादी नेताओं से उसके गहरे रिश्ते थे। बुनियादी तौर पर वो एक बाग़ी सोच का आदमी था। सामंती विचारों के प्रति उसके मन में गहरा क्षोभ था। उस निरीह-से दिखनेवाले शख़्स का चट्टानी संकल्प देखकर सभी हैरान रह जाते थे। वो बिहार के मानवाधिकार रक्षा आंदोलन का एक समर्पित योद्धा था।

उस शख़्स का नाम सुरेश भट्ट था! उसे गए कई बरस बीत गए। आज पता नहीं क्यों वो शख़्स बेहद याद आया। मैंने अपनी ज़िन्दगी में उस जैसा कोई दूसरा शख़्स नहीं देखा। वो अकेला था, अकेला रहा, और गया भी अकेला ही। उसे मेरा सलाम!

प्रोफ़ेसर जाबिर हुसैन : लेखक पुर्व सांसद हैं, और बिहार विधान परिषद के सभापति भी रह चुके हैं जो हिंदी, उर्दू तथा अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं में समान अधिकार के साथ लेखन करते रहे हैं। इन्हे साल 2005 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।