ध्रुव गुप्त

दिल में उतर जाने वाली भावुक, थरथराती, रेशमी आवाज़ के मालिक मरहूम तलत महमूद अपने दौर के सबसे अलग पार्श्वगायक रहे हैं। अपनी एक अलग-सी मर्मस्पर्शी अदायगी के बूते उन्होंने अपने समकालीन मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, मन्ना डे और हेमंत कुमार के बरक्स अपनी एक ख़ास पहचान बनाई थी। पिछली सदी के तीसरे दशक में मात्र सोलह साल की उम्र में ही ग़ज़ल गायक के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाले तलत महमूद गायक और अभिनेता बनने की चाहत लिए कोलकाता चले गए। वहां उन्होंने शुरुआत में तपन कुमार के नाम से गाने गाए, जिनमें बंगाली गाने भी थे।

‘स्वयंसिद्धा’ में पहली बार उन्होंने पार्श्वगायन किया। अपनी सफलता से प्रेरित होकर वे मुंबई आए जहां पहली बार उन्हें अपार ख्याति मिली फिल्म ‘आरजू’ में दिलीप कुमार के लिए गाए गीत ‘ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल’ से। उसके बाद उनकी गायकी का सिलसिला चल निकला, लेकिन इस सफर में खुद उन्होंने कई बाधाएं खड़ी की। गायक के रूप में ख्य़ाति से उन्हें तसल्ली नहीं थी और वे खुद को एक सफल अभिनेता के रूप में देखना चाहते थे।

खूबसूरत चेहरे वाले तलत महमूद ने ‘वारिस’, ‘डाक बाबू’, ‘एक गांव की कहानी’ सहित तेरह फिल्मों में नायक की भूमिकाएं निभाई, लेकिन कई महान अभिनेताओं के उस दौर में उनकी कोई पहचान न बन सकी।

उनके गाए कुछ कालजयी गीत हैं – चल दिया कारवां, हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया, जाएं तो जाएं कहां, ऐ मेरे दिल कहीं और चल, सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या किया, तस्वीर बनाता हूं तस्वीर नहीं बनती, आसमां वाले तेरी दुनिया से जी घबड़ा गया, दिले नादां तुझे हुआ क्या है, ये हवा ये रात ये चांदनी, इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा, आंसू समझ के क्यों मुझे आंख से तूने गिरा दिया, जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीये, मेरी याद में तुम न आंसू बहाना, फिर वही शाम वही गम वही तन्हाई है, मैं तेरी नज़र का सरूर हूं, मैं दिल हूं एक अरमान भरा, अंधे ज़हान के अंधे रास्ते, अश्कों में जो पाया है वो गीतों में दिया है, रात ने क्या क्या ख्वाब दिखाए, ऐ गमे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं, प्यार पर बस तो नहीं है मेरा, तेरी आंख के आंसू पी जाऊं, होके मज़बूर मुझे उसने भुलाया होगा आदि। फ़िल्मों के लिए आख़िरी बार उन्होंने मदन मोहन के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘जहांआरा’ के लिए गाया।

इसके बाद हिंदी फिल्मों का संगीत कुछ ऐसा लाउड हुआ कि उसमें तलत जैसी रूहानी आवाज़ के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। हां, उनके ग़ैरफ़िल्मी गायन का सिलसिला लगातार चलता रहा। ग़ज़ल गायकी के तो वे पर्याय ही बन गए थे। इस महान गायक के यौम ए वफ़ात (9 मई) पर हार्दिक श्रधांजलि, उनके गाए फिल्म ‘सुजाता’ के एक गीत की पंक्तियों के साथ !

दिल में रख लेना इसे
हाथों से ये छूटे ना कही
गीत नाजुक है मेरा
शीशे से भी टूटे ना कही
गुनागुनाऊंगा यही गीत मैं तेरे लिए

जलते हैं जिसके लिए
तेरी आंखों के दीये
ढूंढ लाया हूं वही गीत मैं
तेरे लिए !

ध्रुव गुप्त :- लेखक पुर्व आईपीएस हैं, और विभिन्न मुद्दों पर लगातार बेबाकी से लिखते रहे हैं।