नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर दक्षिण भारत के सबसे धनी मुसलमानों में से एक मीर हुमायूं बहादुर के पुत्र थे। हुमायूं बहादुर गंभीर राष्ट्रवादी विचारधारा वाले मुसलमान थे जिन्होंने अपनी प्रारंभिक अवस्था में वित्तीय और बौद्धिक दोनों तरह से समर्थन देकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मदद की।

1887 में आयोजित तीसरे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में हुमायूं बहादुर ने कांग्रेस नेताओं को आर्थिक तौर पर मदद दी। उनकी मां की तरफ़ से नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर मैसूर के मशहूर टीपू सुल्तान के वंशज थे।

वे टीपू सुल्तान के चौथे बेटे सुल्तान यासीन की पुत्री शहज़ादी शाहरुख़ बेगम के पोते थे। उनके जन्म की तारीख़ किसी विश्वसनीय स्रोत से पता नहीं चल पाई; पर कई सुत्रों के हिसाब से नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर का इंतक़ाल 12 फ़रवरी 1919 को हुआ था।

नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर का सक्रिय राजनीतिक जीवन मद्रास और दिल्ली जैसे दो बड़े शहरों के बीच केंद्रित रहा।

नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर के विचार सामान्य और तकनीकी दोनों तरह की शिक्षा पर बहुत उदार थे। वे बीसवीं सदी की शुरुआत में भारतीयों में भारी अशिक्षा को देखकर बहुत दुखी हो गये थे। उनका मानना था कि राज्यों का मुख्य कर्तव्य मुफ़्त प्राथमिक स्कूलों की स्थापना के ज़रिये अपने लोगों को शिक्षित करना है।

उनका मानना था कि राज्य की स्थिरता और राज्य के प्रति उसके नागरिकों की वफ़ादारी, सामाजिक संतुलन के दो खंभे हैं जिन्हें शिक्षित सामाजिक आधार पर बनाया जाना चाहिए। लेकिन उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सरकार को तकनीकी शिक्षा पर अधिक ध्यान देना चाहिए जिससे औद्योगिक विकास और लोगों के आर्थिक कल्याण को बढ़ावा मिले।

नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर 1894 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और संगठन के सक्रिय सदस्य बने। अपने सभी भाषणों और संबोधनों में सैयद मुहम्मद ने इस बात पर ज्यादा जोर दिया कि मुसलमानों और हिंदुओं को आपस में भाइयों की तरह जीना चाहिए और उनके अलग-अलग धर्म उन्हें एक दूसरे से अलग नहीं करते हैं बल्कि उन्हें एक साथ जोड़कर रखते हैं।

वे इस बात पर गंभीरता से विश्वास करते थे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य मज़बूत राष्ट्र के लिये भारत के लोगों को एकजुट करने का है। महान नेता गोपाल कृष्ण गोखले के बाद, राजनीति में सैयद मुहम्मद को एक उदारवादी नेता के रूप में माना जा सकता है। वे क्रांतिकारी गतिविधियों में विश्वास नहीं करते थे और उनका राजनीतिक स्वतंत्रता का लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य से अलग होना नहीं था।

वे न्याय और स्पष्टता की ब्रिटिश भावना के प्रशंसक थे। इसलिए, ब्रिटिश साम्राज्य का स्वशासन प्रारंभिक भारतीय नेताओं का परम लक्ष्य था और सैयद मुहम्मद उनमें से एक थे। वे दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों से नस्लीय भेदभाव और समानता से इनकार के कारण ज़्यादा उत्तेजित थे।

उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की साम्राज्य के बहिष्कार के लिए ब्रिटिश सरकार की गंभीर आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि सभी भारतीय मुसलमानों को एक साथ शामिल होकर तुर्की साम्राज्य को बचाना चाहिए और विघटन की ख़िलाफ़त करनी चाहिए।

जनता के सामाजिक उत्थान को मानने वाले यह नेता 1903 से मद्रास महाजन सभा के अध्यक्ष रहे, और अपने राष्ट्रवादी विचारों के वजह कर 1913 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में चुने गए। नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर मद्रास के पहले मुस्लिम शेरिफ़ भी थे जिन्हे 1896 में इस पद पर नियुक्त किया गया था।

नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर को 1900 में मद्रास विधान परिषद के लिए और 1905 में इंपीरियल विधान परिषद के लिए नामित किया गया था। 1897 में जब नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर ने महारानी विक्टोरिया के हीरक जयंती समारोह में भाग लिया, उस समय सैयद मुहम्मद को ब्रिटिश सरकार ने नवाब के ख़िताब से सम्मानित किया।

नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर ने 1913 में कांग्रेस के कराची सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा – ‘‘भारत में सभी श्रेणियों के प्रशासनिक अधिकारियों के बीच पुराने गांव संगठन को पुनर्जीवित करने और ग्राम पंचायतों की स्थापना के लिए अनिच्छा विशेष रूप से कुछ प्रांतों में स्पष्ट है, जबकि स्थानीय और नगरपालिका प्रशासन के विस्तार के लिए विचारों के प्रस्तावों में शिथिलता कुछ हद तक देखी जा सकती है इसमें अधिक सतर्कता और खुद को बचाने की प्रवृत्ति भी शामिल है।’’