ध्रुव गुप्त

पिछली सदी के चौथे और पांचवे दशक की अभिनेत्री तथा गायिका सुरैया उर्फ़ सुरैया जमाल शेख़ उस दौर की भारतीय सिनेमा की पहली सुपर स्टार थी। उन्हें हिंदी सिनेमा की पहली ‘ग्लैमर गर्ल’ भी माना जाता है। वे अपने अभिनय-क्षमता के साथ अपने चुंबकीय व्यक्तित्व, शालीन सौंदर्य, दिलफ़रेब अदाओं और अभिनेता देव आनंद के साथ अपने विफल प्रेम के लिए भी चर्चा में रही। अपनी सीमित अभिनय प्रतिभा के बावज़ूद उस दौर की कई बेहतरीन अभिनेत्रियों – नूरजहां, नरगिस, कामिनी कौशल, निम्मी और मधुबाला के बीच भी उनकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ी। इसकी कई वजहों में से एक वज़ह यह भी थी कि वह एक लोकप्रिय अभिनेत्री के साथ हिंदी सिनेमा की कुछ बेहतरीन गायिकाओं में से एक रही है। आज उनके अभिनय का अंदाज़ भले पुराना पड़ गया हो, लेकिन दिलकश गायिकी का असर आने वाली कई सदियों तक संगीत प्रेमियों पर हावी रहेगा।

वर्तमान पाकिस्तान के गुजरांवाला में जन्मी और गुजरे जमाने के मशहूर खलनायक जहूर की भतीजी सुरैया का हिंदी सिनेमा में पदार्पण बाल कलाकार के तौर पर 1937 की फ़िल्म ‘उसने क्या सोचा’ में हुआ था। 1941 में सुरैया ने फिल्म ‘ताजमहल’ में मुमताज़ महल के बचपन के रोल में सबको प्रभावित किया था। नायिका के तौर पर उनकी पहली फिल्म ‘तदबीर’ 1945 में आई थी। हिन्दी फ़िल्मों का चौथा और पांचवा दशक सुरैया के नाम रहा था।उस दौर में उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी एक झलक पाने के लिए उनके प्रशंसक मुंबई में उनके घर और स्टूडियो के सामने घंटों खड़े रहते थे। सड़कों पर यातायात ठप्प हो जाता था। अपने दो दशक लंबे कैरियर में सुरैया की कुछ चर्चित फिल्मे थीं – उमर खैयाम, विद्या, परवाना, अफसर, प्यार की जीत, शमा, बड़ी बहन , दिल्लगी, वारिस, विल्बमंगल, रंगमहल, माशूका, मालिक, जीत, खूबसूरत, दीवाना, डाकबंगला, अनमोल घडी, मिर्ज़ा ग़ालिब और रुस्तम सोहराब। चौथे दशक के आखिर में सुरैया बॉलीवुड में सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्री थी। उन्हें अपनी प्रतिद्वंदी अभिनेत्री नरगिस पर तरज़ीह दी जाने लगी क्योंकि वे अभिनय के साथ-साथ अपनी फिल्मों के गाने भी ख़ुद गाती थी। पांचवे दशक के कुछ आरंभिक साल उनके कैरियर के लिए बुरा वक्त साबित हुआ, लेकिन वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ और ‘वारिस’ की सफलता ने उन्हें एक बार फिर शिखर पर पहुंचाया। एक अभिनेत्री के तौर पर सुरैया में नया और अलग कुछ भी नहीं था। सीधे-सादे अभिनय के बावजूद परदे पर उनकी शालीन उपस्थिति, ग्लैमर और मीडिया द्वारा बनाए गये उनके रहस्यमय आभामंडल की वज़ह से लोग उनकी फिल्मों तक खींचे चले आते थे। वर्ष 1963 मे प्रदर्शित फिल्म रूस्तम सोहराब के प्रदर्शन के बाद व्यक्तिगत कारणों से सुरैया ने फिल्मों को अलविदा कह दिया था।

सुरैया अभिनेत्री से बेहतर एक गायिका थी जिनकी खनकती, महीन, सुरीली आवाज़ के लाखों मुरीद आज भी हैं। उन्होंने हालांकि संगीत की कभी विधिवत शिक्षा नहीं ली, लेकिन उनका रूझान बचपन से ही संगीत की ओर था। वे पार्श्वगायिका ही बनना चाहती थी। आगे चलकर उनकी पहचान एक बेहतरीन अदाकारा के साथ एक अच्छी गायिका के रूप में भी बनी। उनकी आवाज़ की खनक, गहराई और भंगिमाएं सुनने वालों को एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती थी। लता के उत्कर्ष के पूर्व सुरैया ने ही हिंदी सिनेमा में गीत को गरिमा और ऊंचाई दी थी। संगीतकार नौशाद ने आकाशवाणी के एक कार्यक्रम में जब सुरैया को गाते सुना तो वे उनकी आवाज़ और अंदाज से बेहद प्रभावित हुए। पहली बार उन्हें फिल्म ‘शारदा’ में गाने का मौका नौशाद ने दिया था। उनके कुछ बेहद लोकप्रिय गीत हैं – तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी, जब तुम ही नहीं अपने दुनिया ही बेगानी है, तुम मुझको भूल जाओ, ओ दूर जानेवाले वादा न भूल जाना, धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम, नैन दीवाने एक नहीं माने, सोचा था क्या क्या हो गया, वो पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाए रहते हैं, मुरली वाले मुरली बजा, तेरे नैनो ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया, नुक्ताचीं है गमे दिल उसको सुनाए न बने, दिले नादां तुझे हुआ क्या है, ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाले यार होता, ये कैसी अज़ब दास्तां हो गई है, ऐ दिलरुबा नज़रे मिला आदि। ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ में गुलाम मोहम्मद के संगीत में ग़ालिब की कुछ ग़ज़लों को जिस बारीकी और ख़ूबसूरती से उन्होंने गाया है, उन्हें सुनना आज भी एक विलक्षण अनुभव है। राष्ट्रपति के स्वर्ण कमल पुरस्कार से सम्मानित फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ में सुरैया की गायिकी से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनसे कहा था – ‘तुमने मिर्जा गालिब की रूह को जिंदा कर दिया।’

सदाबहार अभिनेता देवानंद के साथ उनका असफल रिश्ता, उनका अविवाहित तथा एकाकी जीवन और उनकी गुमनाम मौत बॉलीवुड की सबसे दर्दनाक और त्रासद प्रेम कहानियों में एक रही है। दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया था। 1949 में पहली बार फिल्म ‘जीत’ के सेट पर देव आनंद ने सुरैया से अपने प्रेम का इजहार किया था। अगले कुछ सालों में उनके प्यार की कहानियां नर्गिस-राजकपूर और दिलीप कुमार-मधुबाला के प्यार की तरह देशभर में फैल गईं। दुर्भाग्य से उस दौर की चर्चित दो अन्य फ़िल्मी जोड़ियों की तरह उनकी फ़िल्मी जोड़ी भी वास्तविक जीवन में जोड़ी नहीं बन पाई। वजह थी सुरैया की दादी, जिन्हें खिलंदड और विधर्मी देव आनंद पसंद नहीं थे। देव आनंद के साथ ‘दो सितारे’ उनकी आख़िरी फ़िल्म थी। 1954 मे देवानंद ने उस जमाने की मशहूर अभिनेत्री कल्पना कार्तिक से शादी कर ली, मगर सुरैया ने अपने जीवन में देव साहब की जगह किसी और को नहीं दी। उन्होंने ताउम्र शादी नहीं की और मुंबई के मरीनलाइन में स्थित अपने फ्लैट में अकेली और गुमनाम मौत मरी। देव आनंद ने अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में सुरैया के साथ अपने रिश्ते के बारे में लिखा है – ‘सुरैया से मेरी पहली मुलाकात फिल्म ‘जीत’ के सेट पर हुई थी। वह सुरैया का वक़्त था और मैं फिल्म उद्योग में अपने पांव जमाने की कोशिश कर रहा था। हम दोनों चुंबक की तरह नजदीक आते चले गए। हमने एक-दूसरे को पसंद किया और फिर प्रेम करने लगे। मुझे याद है, मैं चर्च गेट स्टेशन पर उतरकर पैदल मैरिन ड्राइव में कृष्ण महल जाया करता था जहाँ सुरैया रहती थीं। हम लिविंग-रूम में बैठा करते थे। सुरैया की मां ने तो हमारी आशनाई को स्वीकार कर लिया था, पर उनकी बूढ़ी दादी मुझे गिद्ध की तरह देखती थीं। हम शादी करना चाहते थे, लेकिन सुरैया अपनी दादी की मर्जी के खिलाफ जाने को तैयार नहीं हुईं। निहित स्वार्थी तत्वों ने हिन्दू-मुसलमान की बात उठाकर हमारे लिए मुश्किलें पैदा कर दीं। एक दिन दादी के हुक्म का पालन करते हुए सुरैया ने मुझे ‘ना’ कह दिया। मेरा दिल टूट गया। उस रात घर जाकर भाई चेतन के कंधे पर सिर रखकर खूब रोया। मैंने उनसे बहुत प्यार किया था जिसे मैं अपने जीवन का पहला मासूम प्यार कहना चाहूंगा।’

ग्लैमरस लेकिन एकाकी सुरैया की पुण्यतिथि पर खिराज-ए-अक़ीदत, फिल्म ‘शमा’ के लिए कैफ़ी आज़मी की लिखी और उनकी गाई एक ग़ज़ल के साथ जो अपने जीवन-काल में सुरैया को बहुत प्रिय थी !

धड़कते दिल की तमन्ना हो मेरा प्यार हो तुम
मुझे क़रार नहीं जब से बेक़रार हो तुम

खिलाओ फूल कहीं भी किसी चमन में रहो
जो दिल की राह से गुज़री है वो बहार हो तुम

ज़हे नसीब अता की जो दर्द की सौगात
वो ग़म हसीन है जिस ग़म के ज़िम्मेदार हो तुम

चढाऊं फूल या आंसू तुम्हारे क़दमों में
मेरी वफ़ाओं के उल्फ़त की यादगार हो तुम।

ध्रुव गुप्त (लेखक पुर्व आई.पी.एस हैं)