ध्रुव गुप्त

शहीद सुखदेव थापर भारत के उन कुछ क्रांतिकारियों में एक थे जिन्होंने अल्पायु में ही देश के लिए अपनी शहादत दी। चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह के निकट सहयोगी सुखदेव थापर का व्यक्तित्व भगत सिंह की तरह प्रचंड भावुकता और गहरी वैचारिकता का अद्भुत समन्वय था। चेहरे-मोहरे से जितने सरल, व्यवहार में जितने कोमल, विचारों के प्रति उतने ही दृढ़ और अनुशासित। उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दो मुख्य क्रांतिकारी संगठनों – नौजवान भारत सभा और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के संस्थापक सदस्यों में एक होने का गौरव हासिल है। देश में उस दौरान ज़ारी क्रांतिकारी गतिविधियों के वे कुशल रणनीतिकार थे।

उन्होंने लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिये सांडर्स के वध में भगत सिंह तथा राजगुरु का साथ दिया था। 1929 में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार के विरोध में राजनीतिक कैदियों की व्यापक हड़ताल के वे हिस्सा थे। उनका गांधी की अहिंसक नीति पर भरोसा नहीं था। गान्धी-इर्विन समझौते के सन्दर्भ में जेल से गांधी जी को लिखा उनका पत्र ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसने उस दौर की सियासत में सनसनी मचा दी थी। यह पत्र न केवल देश की तत्कालीन स्थिति की पड़ताल है, बल्कि कांग्रेस की क्रांति-विरोधी मानसिकता का भी पर्दाफ़ाश करता है।

उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च,1931 को सुखदेव को भगत सिंह और राजगुरु के साथ लाहौर सेंट्रल जेल में मात्र तेईस साल की उम्र में फांसी पर लटका दिया था। शहीद सुखदेव थापर की जयंती (15 मई) पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि, महात्मा गांधी को लिखे गए उनके ऐतिहासिक पत्र के एक अंश के साथ जिसे गांधी जी ने उनके बलिदान के एक महीने बाद ‘यंग इंडिया’ में छापा था !

‘आपने समझौते के बाद अपना सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस ले लिया है और फलस्वरूप आपके सभी बंदियों को रिहा कर दिया गया है। पर क्रांतिकारी बंदियों का क्या हुआ ? 1915 से जेलों में बंद गदर पार्टी के दर्जनों क्रांतिकारी अब तक वहीं सड़ रहे हैं। बावजूद इसके कि वे सभी अपनी सजा पूरी कर चुके हैं। मार्शल लॉ के तहत बन्दी बनाए गए अनेक लोग अब तक जीवित दफनाए गए से पड़े हैं। बब्बर अकालियों का भी यही हाल है। देवगढ़, काकोरी, महुआ बाज़ार और लाहौर षड्यंत्र केस के बंदी भी अन्य बंदियों के साथ जेलों में बंद है। एक दर्जन से अधिक बन्दी सचमुच फांसी के फंदों के इन्तजार में हैं। इन सबके बारे में क्या हुआ ?… भावुकता के आधार पर ऐसी अपीलें करना, जिनसे उनमें पस्तहिम्मती फैले, नितांत अविवेकपूर्ण और क्रांति विरोधी काम है। यह तो क्रांतिकारियों को कुचलने में सीधे सरकार की सहायता करना होगा।’

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।