15 फ़रवरी 1915  को बड़ी तादाद में भारतीय सिपाही सिंगापुर में अंग्रेज़ों से बग़ावत कर जाते हैं, जिसके बाद उन्हे बग़ावत के जुर्म में मार्च 1915 को औटरम रोड सिंगापुर के किनारे खड़ा कर गोलीयों से भून दिया जाता है। शहीद होने वालों में हवालदार सुलैमान, नायक अब्दुल रज़्जाक, नायक ज़फ़र अली ख़ान सहीत 45 से अधिक सिपाहीयों थे। इनके साथ उस गुजराती करोबारी “क़ासिम मंसुर” को भी गोली मार दी जाती है जिसने सबसे पहले बग़ावत की पहल की थी।

कुल मिलाकर 36 विद्रोहियों को बाद मेे और मार डाला गया और 77 अधिकारियों को जिलावतन कर दिया गया जिसमे अधिकतर को 7 से 20 साल की कै़द की सज़ा दी गई। वहीं जिलावतन किये गए लोगो मे “नूर आलम शाह” भी थे, जिन्होने सिपाहीयों का ब्रेनवाश किया था, चुंके नूर आलम शाह एक धार्मिक व्यक्ति थे इस लिए इन्हे मार कर अंग्रेज़ मुसलमानो को और नही भड़काना चाहते थे जबके वो इस साज़िश के कर्ता धर्ता थे।

वैसे बग़ावत रुका नही क्युंके साल 1915 में ही 130 बलुच रेजीमेंट रंगून में बग़ावत कर देती है। मामले को छुपाया जाता है, कितने लोग मरे; ये मंज़र ए आम पर नही लाया जाता है।

साल 1917 में मांडालय कांसप्रेसी केस में 3 सिपाहीयों को बग़ावत के जुर्म में सज़ा ए मौत मिलती है। जिसमे जयपुर के रहने वाले मुस्तफ़ा हसन, लुधियाना के अमर सिंह और फ़ैज़ाबाद के अली अहमद का नाम शामिल था। इनके इलावा जिन और लोगों पर बग़ावत का शक था वो हैं मुकसुद्दीन अहमद, ग़यासउद्दीन अहमद, अब्दुल क़तार, नसरुद्दीन और उनकी बेटी रज़िया ख़ातून।