चौधरी साहब

सीकरी खुर्द गुर्जर बहुल गाँव है जो मोदीनगर से पूर्व दिशा में 1 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है । यहाँ के ग्रामीणों ने क्रांतिकारी सैनिकों की सहायता की तथा क्रांतिकारी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भाग लिया था ।

यहाँ देवी का एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक मन्दिर है । ग्रामीणों में मान्यता है कि यहाँ जो भी माँगा जाता है, वह पूरा हो जाता है । नवरात्रों में यहां विशाल मेले का आयोजन किया जाता है । श्रद्धालुओं की मान्यता है कि करीब 300 वर्ष पूर्व जालिमगिरि नाम के भक्त को देवी ने साक्षात् दर्शन दिये और यहाँ मन्दिर बनाने के लिए कहा था । इनके वंशज तब से यहाँ पूजा अर्चना करते आ रहे हैं ।

मन्दिर परिसर में वट का वृक्ष है । किंवदन्ती है कि इस वृक्ष पर 1857 में प्रतिक्रांति के समय लगभग 150 क्रांतिकारियों को फांसी दी गयी थी । मन्दिर में आने वाले श्रद्धालु इस वृक्ष के समक्ष नतमस्तक होकर शहीदों को श्रद्धाजंलि अर्पित करते हैं।

मेरठ के विप्लव की सूचना पाकर यहां के ग्रामीणों ने सरकार को मालगुजारी देनी बन्द कर दी । सीकरी के निकट बेगमाबाद कस्बा है । किंवदन्ती है कि क्रांति के समय सीकरी के ग्रामीणों के विरूद्ध यहां के लोगो ने ब्रितानियों के लिए मुखबरी की ।

परिणामतः सीकरी के गुर्जरों ने #_8_जुलाई_1857 को बेगमाबाद के अनेक ब्रिटिश समर्थकों की हत्या कर दी और लुटमार करके कस्बे में आग लगा दी । जब उस घटना की खबर मेरठ पहुँची तो क्रांतिकारियों के दमन के लिए ड़नलप के नेतृत्व में खाकी रिसाला सीकरी पहुँचा और उसने गाँव को चारों ओर से घेर लिया । 30 से अधिक व्यक्तियों को गाँव के बाहर ही मार दिया गया । कहां जाता है कि लगभग 130 व्यक्ति देवी के प्राचीन मन्दिर के भौरे (तहखाना) में छिप गये थे इनका पता लगने पर खाकी रिसाले ने इन्हे घेर लिया और भौरे से बाहर निकाला । इनमें से अधिकांश को फाँसी दे दी गयी और 30 लोगों को गोली मार दी गयी । इसके बाद गाँव में आग लगा दी गयी ।

इस घटना के सम्बन्ध में एक किवंदन्ती भी चली आ रही है कि 1857 के समय सीकरी, लालकुर्ती मेरठ बूचड़ वालों की जमींदारी में आता था । उस समय सीकरी के मुकद्दम सिब्बा सिहँ थे, जो गाँव से भू-राजस्व एकत्र कर मेरठ पहुंचाया करते थे । 1857 में यहाँ के ग्रामीणों ने जमींदार लालकुर्ती मेरठ को लगान देने से इन्कार कर दिया और क्रांतिकारियों की सहायता करने लगे ।

भू-राजस्व भेजने के लिए जमींदार ने सीकरी खबर भेजी लेकिन मुकद्दम सिब्बा सिहँ गुर्जर व अन्य ग्रामीणों ने कोई जवाब नहीं दिया। परिणामस्वरूप जमींदार लालकुर्ती ने स्वयं जाकर ग्रामीणों से बातचीत करनी चाही। उन्होंने अपने आदमी को भेजकर मुकद्दम सिब्बा सिहँ के पास खबर भेजी कि वह उनसे मिलने आ रहे है । वह आदमी यह समाचार लेकर सीकरी पहुँचा और मुकद्दम सिब्बा सिहँ को जमींदार के आने का समाचार सुनाया।

यह सुनकर सिब्बा ने उनसे कहा कि “उस ब्रितानियों के पिट्ठु साले सूअर से कह देना कि वह यहाँ न आये।” यह सुनकर वह व्यक्ति वापिस मेरठ चला आया तथा उसने जमींदार से सच्चाई बताई कि मुकद्दम सिब्बा और ग्रामीण लगान देने में आनाकानी कर रहे हैं । तत्कालीन अशान्त वातावरण को देखते हुए जमींदार ने अपने क्रोध पर काबू रखा तथा दूसरे दिन सीकरी पहुँच गए । सीकरी पहुँचने के पश्चात् जमींदार ने मुकददम सिब्बा को अपनी तरफ मिलाना चाहा । उन्होने उसे ब्रितानियों के पक्ष में करने के लिए और क्रांतिकारियों का साथ न देने के लिए कहा । परन्तु सिब्बा नहीं माने।

तब उन्होने उसे लालच देते हुए कहा कि-  “मुकद्दम जितने इलाके की ओर तुम उँगली उठाओंगे मैं वो तुम्हें दे दूँगा तथा जो जमींन तुम्हारे पास है उसका लगान भी माफ कर दिया जायेगा।”

लेकिन सिब्बा ने जमींदार की बात नहीं मानी । अन्त में क्रोधिक होकर जमींदार ने सिब्बा सहित गाँव के सभी ग्रामीणों को भूमि से बेदखल कर दिया । सिब्बा के पास उस समय 1400 बीघा भूमि थी, जिसमें 500 बीघा भूमि सीकरी में तथा बाकी 900 बीघा भूमि दूसरे स्थान पर थी।

अब सीकरी के गुर्जरों ने खुलेआम क्रांतिकारियों का साथ देना शुरू कर दिया । निकटवर्ती गाँव बेगमाबाद के ग्रामीण यहाँ की गुप्त सूचनायें ब्रिटिश अधिकारियों को दे रहे थे । इसलिए सीकरी के गुर्जरों ने बेगमाबाद पर आक्रमण कर दिया । जब इसकी सूचना मेरठ पहुँची तो ब्रितानियों ने खाकी रिसाला बेगमाबाद की रक्षार्थ भेजा । उसने सीकरी को चारों ओर से घेर लिया।

जब खाकी रिसाले की आने की सूचना ग्रामीणों को मिली तो अधिकांश ग्रामीण गाँव में ऐतिहासिक मन्दिर के भौरे (तहखाने) में छिप गये तथा कुछ ग्रामीण वृक्षों पर चढ़ कर उनकी पत्तियों में छिप गये । खाकी रिसाल ने सीकरी पहुँचने के पश्चात् नरसंहार शुरू कर दिया और वृक्षों पर छिपे अनेक ग्रामीणों को गोली मार दी परन्तु भौंरे में छिपे व्यक्तियों की जानकारी खाकी रिसाले को नहीं मिल सकी । जब खाकी रिसाला सीकरी से वापिस जाने वाला ही था, तभी गाँव का एक व्यक्ति, जो ब्राह्मण था, खाकी रिसाले के पास आया । इसके पुत्र पेड़ों पर छिपे थे और सभी गोली का निशाना बन चुके थे । उसने खाकी रिसाले को रोककर कहा कि – “मेरे वंश का निष्ठ हो गया और गाँव का कान तत्त भी नहीं हुआ ।” अर्थात् मेरा सम्पूर्ण परिवार मारा जा चुका है तथा गाँव के व्यक्ति सुरक्षित है ।

उस ब्राह्मण ने ही खाकमटी रिसाले को ग्रामीणों के भौरे में छिपे होने की सूचना दी, तब सूचना पाकर रिसाले ने भौरे को घेर लिया और उसमें छिपे ग्रामीणों पर हमला बोल दिया । ग्रामीणों ने भी सामना किया । इस संघर्ष में अनेक क्रांतिकारी ग्रामीण मारे गये । भौरे में बचने वाले ग्रामीणों की संख्या लगभग 19 रही । इन में ही जीवित बचने वाले 19 व्यक्तियों में मुकद्दम सिब्बा भी थे। जब सिब्बा के जीवित होने की सूचना ब्रितानियों को मिली तो उन्होंने पकड़ने की सोची । लेकिन वे कामयाब न हो सके । सिब्बा ने अन्य ग्रामीणों के कहने पर अपना नाम बदलकर हीरा रख लिया और सभी ग्रामीण उसे ‘हीरा’ कहकर पुकारने लगे । मुकद्दम सिब्बा सिहँ उर्फ हीरा सिहँ के वंशज आज भी गाँव में रह रहे हैं ।

जंगे आजादी में सिकरी खुर्द के गुमनाम बलिदानियों को उनके बलिदान दिवस पर शत शत नमन ।।
इंकलाब जिन्दाबाद ।।