जब फांसी के फंदे पर लटका दिये गए शेर अली अफ़रीदी!

शेर अली अफ़रीदी यही नाम है उस महान देशभक्त का जिसे ब्रिटिश हुकूमत के वायसराय लार्ड मायो के क़त्ल के जुर्म में 11 मार्च 1872 को फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया गया था।

वायसराय लार्ड मायो का ये क़त्ल शेर अली अफ़रीदी ने 8 फ़रवरी 1872 को क्रन्तिकारी देशभक्तों के लिए बनवाई गई सेलुलर जेल जिसे आम तौर पर काला पानी भी कहते हैं; में खंजर से चीर कर अंजाम दिया था।

वायसराय लार्ड मायो 8 फ़रवरी 1872 को अंडमान में मौजूद जेल का मुआयना करने पहुंचा था। यहां 21 तोपों की सलामी के साथ उसका भव्य स्वागत किया गया। उसके साथ एक उच्च स्तरीय सरकारी दल भी साथ था। दिन भर की सरकारी औपचारिकता के बाद गहन सुरक्षा घेरे से घिरे लार्ड मायो ने ‘माउन्ट हैरियट’ से सूर्यास्त देखने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। उसे नहीं पता था की उसके जीवन का भी सूर्यास्त होने वाला है। अपने सचिव, अंगरक्षकों एवं मशालों की रौशनी से घिरा लार्ड मायो जब तक होप टाऊन ब्रिज तक पहुँचता और रात्रि-विश्राम रॉयल नेवी शिप पार करता, उससे पहले ही अँधेरे में छिपे इस शेर “शेर अली अफ़रीदी” ने उसको चीर डाला। ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा प्यादा ‘मुह के बल’ औंधा पड़ा था और 1857 के ज़ुल्म का बदला लिया जा चुका था।

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शेर अली को मौक़े से ही पकड़ लिया गया, पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में दहशत फैल गई। लंदन तक बात पहुंची तो हर कोई हक्का बक्का रह गया। जब वाईसराय के साथ ये हो सकता है तो कोई भी अंग्रेज हिंदुस्तान में खुद को महफ़ुज़ नहीं मान सकता था।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने भी इस ख़बर को बिलकुल हल्के अंदाज़ में कवर किया था, मानो लार्ड मायो हिन्दुस्तान का वाईसराय नही किसी गांव का मुखिया हो।

शेर अली अफ़रीदी से जमकर पूछताछ की गई, उसने मानो एक ही लाईन रट रखा था, ‘मुझे अल्लाह ने ऐसा करने का हुक्म दिया है, मैंने अल्लाह की मर्ज़ी पूरी की है बस’।

अंग्रेज़ों ने ये जानने की काफ़ी कोशिश की के क्या कोई संगठन इसके पीछे है या फिर कोई ऐसा राजा जिसका राज उन्होंने छीना हो या फिर ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ किसी बाहरी ताक़त का हाथ हो।

उनसे जब पूछा गया कि अपने ने लॉर्ड मायो को क्यो मारा ? देश के इस बहादुर ने युं जवाब दिया ‘मुझे अल्लाह ने ऐसा करने का हुक्म दिया है, मैंने अल्लाह की मर्ज़ी पूरी की है बस’। और जब उससे पुछा गया के इस साज़िश में तुम्हारे साथ कौन कौन शरीक था ? तब उसने कहा ‘हां, ख़ुदा हमारे साथ था

जेल में उसकी सेल के साथियों से भी पूछताछ की गई, एक क़ैदी ने बताया कि शेर अली अफ़रीदी कहता था कि अंग्रेज़ देश से तभी भागेंगे जब उनके सबसे बड़े अफ़सर को मारा जाएगा और वाईसराय ही सबसे बड़ा अफ़सर था। उसके क़त्ल के बाद वाकई अंग्रेज़ खौफ़ में आ गए। इसीलिए ना सिर्फ़ इस ख़बर तो ज़्यादा तवज्जो देने से बचा गया बल्कि शेर अली को भी चुपचाप फांसी पर लटका दिया गया।

एक संक्षिप्त सुनवाई के बाद 18 फ़रवरी 1872 को अदालत ने शेर अली अफ़रीदी सज़ाए मौत दी, इस सज़ा ए मौत को कलकत्ता हाई कोर्ट ने भी 20 फ़रवरी 1872 को सुनवाई के बाद बरक़रार रखा। लंदन टाइम्स के जिस रिपोर्टर ने उस फांसी को कवर किया था, वो लिखता है कि जेल ऑफिसर ने आख़री ख़्वाहिश जैसी कोई बात उससे पूछी थी तो शेर अली ने मुस्करा कर जवाब दिया था, ‘नहीं साहिब’। लेकिन फांसी से पहले उसने मक्का की तरफ़ मुंह करके नमाज़ ज़रूर अदा की थी।

इस अज़ीम शख़्स ने जब 11 मार्च 1872 को सूली को हंसते हंसते चूमा तो भारतीय जेल कर्मी को मुख़ातिब करते हुए उनके ज़ुबान पर ये शब्द मौजूद थे : “भाईयों मैने आपके दुश्मन को मारा, मेरा फर्ज़ पूरा हुआ और तुम गवाह रहना के मै एक मुसलमान हुं” और उसनें कलमा पढ़ कर आख़री सांस ली।

अंग्रेज़ी इतिहासकारों ने ये ठान लिया था के किसी भी क़ीमत पर शेर अली अफ़रीदी के का़रनामे को हिन्दुस्तानी तारीख़ मे जगह नही दी जाएगी और इस पर William Hunter ने लिखा है : ”Neither his name, nor that of his village or tribe will find record in the book”

उल्लेखनीय है की पहले शेर अली अफ़रीदी ‘मौनटेंड पुलिस’ के सिपाही थे किन्तु ब्रितानी हुकूमत के जानी दुश्मन बन गए और “काला पानी” की सज़ा के हक़दार हुए। उनकी देश के लिए दी गई क़ुर्बानी आज हमारे लिए बाऊस ए फ़ख्र है।


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Md Umar Ashraf

Md. Umar Ashraf is a Delhi based historian, who after pursuing a B.Tech (Civil Engineering) started heritagetimes.in to explore, and bring to the world, the less known historical accounts. Mr. Ashraf has been associated with the museums at Red Fort & National Library as a researcher. With a keen interest in Bihar and Muslim politics, Mr. Ashraf has brought out legacies of people like Hakim Kabeeruddin (in whose honour the government recently issued a stamp). Presently, he is pursuing a Masters from AJK Mass Communication Research Centre, JMI & manages heritagetimes.in.

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