1857 की जंग ए आजादी में लड़ने वाले शेख़ भिखारी का जन्म 1831 ई में रांची ज़िला के होक्टे गांव में एक बुनकर ख़ानदान में हुआ था. बचपन से वे अपना खानदानी पेशा मोटे कपड़े तैयार करते और हाट-बाजार में बेचकर अपने परिवार की परवरिश में सहयोग करते थे। जब उनकी उम्र 20 वर्ष की हुई तो उन्होंने छोटानागपुर के महाराज के यहां नौकरी कर ली. जल्द ही उन्होंने राजा के दरबार में एक अच्छी मुक़ाम हासिल कर लिया. बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उनको अपने यहां दीवान के पद पर रख लिया़ शेख भिखारी के जिम्मे में बड़कागढ़ की फौज का भार दे दिया गया.

1856 ई में जब अंग्रेज़ों ने राजा महाराजाओं पर चढ़ाई करने का मनसूबा बनाया तो इसका अंदाजा हिंदुस्तान के राजा-महाराजाओं को होने लगा था. जब इसकी भनक ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को मिली तो उन्होंने अपने वजीर पांडे गनपतराय दीवान शेख भिखारी, टिकैत उमरांव सिंह से मशवरा किया, इन सभी ने अंग्रेज़ों के खिलाफ़ मोर्चा लेने की ठान ली और जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से कई बार राब्ता किया. इसी बीच में शेख़ भिखारी ने बड़कागढ़ की फौज में रांची एवं चाईबासा के नौजवानों को भरती करना शुरू कर दिया.

अचानक अंग्रेज़ों ने 1857 में चढ़ाई कर दी.विरोध में रामगढ़ के हिंदुस्तानी रेजिमेंट ने अपने अंग्रेज़ अफ़सर को मार डाला. नादिर अली हवलदार और रामविजय सिपाही ने रामगढ़ रेजिमेंट छोड़ दिया और जगन्नाथपुर में शेख भिखारी की फ़ौज में शामिल हो गये. इस तरह जंग ए आज़ादी की आग छोटानागपुर में फैल गयी. रांची, चाईबासा, संथाल परगना के ज़िलों से अंग्रेज़ भाग खड़े हुए. इसी बीच अंग्रेज़ों की फ़ौज जनरल मैकडोना के नेतृत्व में रामगढ़ पहुंच गयी और चुट्टूपालू के पहाड़ के रास्ते से रांची के पलटुवार चढ़ने की कोशिश करने लगे.

उनको रोकने के लिए शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह अपनी फौज लेकर चुट्टूपालू पहाड़ी पहुंच गये और अंग्रेज़ों का रास्ता रोक दिया. शेख भिखारी ने चुट्टूपालू की घाटी पार करनेवाला पुल तोड़वा दिया और सड़क के पेड़ों को काटकर रास्ता जाम करवा दिया. शेख़ भिखारी की फ़ौज ने अंग्रेज़ों पर गोलियों की बौछार कर अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिये. यह लड़ाई कई दिनों तक चली. शेख़ भिखारी की फ़ौज के पास गोलियां ख़त्म होने लगी तो शेख़ भिखारी ने अपनी फ़ौज को पत्थर लुढ़काने का हुक्म दिया. इससे अंग्रेज़ फ़ौजी कुचलकर मरने लगे. यह देखकर जनरल मैकडोन ने मुकामी लोगों को मिलाकर चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ने के लिए दूसरे रास्ते की जानकारी ली. फिर उस खुफिया रास्ते से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ गये. इसकी खबर शेख़ भिखारी और उनकी फ़ौज को नहीं हो सकी. अंग्रेज़ों ने शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह को 6 जनवरी 1858 को घेर कर गिरफ़्तार कर लिया और 7 जनवरी 1858 को उसी जगह चुट्टूघाटी पर फ़ौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख़ भिखारी और उनके साथी टिकैत उमरांव को फांसी का फैसला सुनाया.

8 जनवरी 1858 को आजादी के आलमे बदर शेख़ भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को चुट्टूपहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गयी. वह पेड़ आज भी सलामत है. यह पेड़ आज भी हमें उनकी याद दिलाता है और हर साल कुछ सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के लोग यहां पहुंच कर उन्हें श्रधांजली अर्पित करते हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर उन्हें याद नहीं किया जाता है।शहीद शेख भिखारी रांची से लगभग 25 किलोमीटर दूर खद्या नामक गांव के रहने वाले थे। यह क़स्बा शहीद शेख भिखारी के वारिसों का है। इसके बावजूद यह कस्बा और उनके वारिस आज भी पिछड़ेपन के शिकार हैं। शहीद दिवस के अवसर पर इस कस्बे और रांची में विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा छोटे छोटे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि शहीद शेख भिखारी के नाम पर राज्य में ऐसी यादगार स्थापित की जाएगी, जिससे नई पीढ़ी लाभ उठा सके और देश की खातिर उनके दिए कुरबानी को याद रखा जा सके।