Shubhneet Kaushik

समाजशास्त्री शर्मिला रेगे (1964-2013) के बहुआयामी जीवन के दो प्रमुख सरोकार रहे : सामाजिक न्याय की पक्षधरता और भारतीय समाज में हाशिये के समुदायों के बीच परस्पर संवाद संभव बनाना। यह शर्मिला की प्रतिबद्धता ही थी, जिसके चलते कैंसर की असाध्य बीमारी दे जूझते हुए भी शर्मिला ने महिलाओं के मुद्दों से सरोकार रखने वाले डॉ. बीआर अंबेडकर के लेखों को संपादित करने का काम कर दिखाया।

यह किताब ‘अगेन्स्ट द मैडनेस ऑफ मनु’ शीर्षक से ‘नवयान’ द्वारा प्रकाशित की गई। संपादक के रूप में शर्मिला ने विचारोत्तेजक भूमिका भी लिखी। जिसमें शर्मिला ने जाति-व्यवस्था की संरचना के निर्माण में और उसके बने रहने में जेंडर की भूमिका पर डॉ. अंबेडकर के चिंतन की व्याख्या की।

शर्मिला रेगे ने जाति-विरोधी राजनीतिक आंदोलनों और नारीवाद, दोनों के ही संदर्भ में दलित नारीवाद के महत्त्व पर ज़ोर दिया। अपनी चर्चित किताब ‘राइटिंग कास्ट/राइटिंग जेंडर’ में शर्मिला ने दलित महिलाओं के लिखित विवरणों का विश्लेषण करते हुए यह दिखाया कि कैसे राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवेश से बहिष्कृत होने के बावजूद भी दलित महिलाओं के आंदोलनों ने आज़ाद भारत में दलित और नारीवादी राजनीति को सार्थक ढंग से बदलने में सक्रिय भूमिका निभाई।

दलित महिलाओं के आंदोलनों ने समकालीन भारत में जाति व जेंडर की परंपरागत समझ को भी चुनौती दी । शर्मिला ने अपनी इस किताब में कुमुद पावडे, उर्मिला पवार, शांताबाई कांबले, शांताबाई दाणी, मुक्ता सर्वगोड, विमल मोरे और जनाबाई गिरहे की रचनाओं का प्रयोग दलित महिला आंदोलनों के सरोकारों को समझने के लिए किया। उन्होंने इन बुद्धिजीवियों की ‘साक्षी/बयान’ (टेस्टीमनी) को इतिहास के एक महत्त्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा।

चेरी मोरागा और ग्लोरिया अंजलदुआ से, जिन्होंने अमेरिका के संदर्भ में नारीवादी आंदोलन को नस्लभेद और रंगभेद विरोधी आंदोलनों से जुड़ने की वकालत की थी, सीख लेते हुए शर्मिला ने भारत में नारीवादी आंदोलनों और हाशिये के समुदायों के संघर्षों के बीच जुड़ाव की हिमायत की। शर्मिला इस जरूरी संवाद को संभव बनाने हेतु लगातार सक्रिय भी रहीं।

दलित नारीवादियों के मुक्तिकामी संघर्ष के बारे में लिखते हुए शर्मिला ने यह समझने पर ज़ोर दिया कि कैसे जेंडर, नस्ल, जाति, वर्ग और सेक्सुअलिटी एक-दूसरे की रचते-गढ़ते हैं और इसमें सामाजिक सोपान (हाईरार्की) व सत्ता सम्बन्धों की क्या भूमिका होती है।

संस्कृति के स्तर पर घटित होने वाली राजनीति को उसकी समग्रता में समझने के लिए शर्मिला ने लोक-संस्कृति (पॉपुलर कल्चर) के विभिन्न आयामों पर भी काम किया। इसी क्रम में शर्मिला ने महाराष्ट्र में लावणी व तमाशा की परंपरा को एक समाजशास्त्री की दृष्टि से विश्लेषित किया।

क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले वीमन्स स्टडीज़ सेंटर (पुणे विवि) में पढ़ाते हुए शर्मिला ने भाषा और शिक्षण-पद्धति पर गहराई से सोचना और शिक्षा संबंधी फुले-अंबेडकर के और नारीवादियों के विचारों को अमल में लाने की कोशिश शुरू की। अँग्रेजी और मराठी में उच्च शिक्षा को संभव बनाने और समता व गुणवत्ता दोनों ही सुनिश्चित करने का काम भी शर्मिला ने बखूबी किया। इसी दौरान शर्मिला ने फुले-अंबेडकर-नारीवादी विचारों से प्रेरित एक शिक्षण-पद्धति का मैनुअल भी तैयार किया, जिसका शीर्षक था : ‘बिल्डिंग ब्रिजेज़’।