Md Umar Ashraf

1947 से पहले जब पूरा हिन्दुस्तान अंग्रेज़ों के जु़ल्मों सितम से परेशान था और बग़वत के सिवा उनके पास कोई चारा नही बचा था, उसी वक़्त में एक ऐसा शख्श भी था जिसने अंग्रेज़ों के नाक में दम कर रखा था, दम भी इतना की अंग्रेज़ों ने उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ के लाने वाले को हज़ारो रुपैय इनाम के तौर पर देने तक का ऐलान कर दिया, फिर भी अंग्रेज़ी हुकुमत उन्हें कभी उनके असल नाम से नही पकड़ पाई। 1942 मे शाह उमैर साहब के नेतृत्व में बिहार के अरवल में बगावत का झंडा बुलंद कर अरवल थाना को लहकाने वाले “डॉ सैयद शाह वजिहउद्दीन मिनहाजी” जंग ए आज़ादी के पहली पंक्ति में खड़े होकर हिंदुस्तानी अवाम को अपनी बहादुरी और वफ़ादारी का पैग़ाम देते रहे।

ये लेख शाह वजीहउद्दीन मिन्हाजी साहब की डायरी ‘मेरी तमन्ना’ पर अधारित है, अधिकतर जानकारी वहीं से ली गई है।

आपकी पैदाइश 1907 में बिहार के गया ज़िला में हुई, आपकी इब्तदाई तालीम वहीं घर पर हुई, जहां आपने मौलवी मूसा रज़ा साहेब से फ़ारसी 1 और मदरसा सहसराम में फ़ारसी 2 की पढाई की, फिर 1920 में आपका दाख़ला गया के ही इस्लामिया हाई इंग्लिश स्कूल में करवा दिया गया। ख़िलाफ़त तहरीक और असहयोग आंदोलन के दौरान 1920 में कांग्रेस ने सरकारी स्कूल के बायकॉट का एलान कर दिया था, जिसका नतीजा ये हुआ के आपके वालिद साहेब ने आपको उस स्कूल से निकलवा दिया; फिर 1921 में “गांधी क़ौमी विद्यालय” नेशनल स्कूल की बुनियाद गया में डाली गई। उस स्कूल में आपने 3rd क्लास में दाख़िला लिया, इस स्कूल में चरखा कातना और कपड़े बुनना बिलकुल ज़रूरी था। यहाँ आपको बाबा ख़लील दास, क़ाज़ी अहमद साहेब, किशन प्रसाद साहेब जैसे अज़ीम इंक़लाबी उस्ताद मिले जिनसे आपने ग़ज़ल पढ़ना, तक़रीर करना वग़ैरा सीखा, जिसके बाद आपको हर छोटे बड़े प्रोग्राम में हिस्स लेने के लिए बुलाया जाने लगा।

बात 1922 की है जब आप गया के बार लाइब्रेरी में टेबल पर चढ़ कर तक़रीर दे रहे थे; तब वहां मौजूद पुलिस वाले को ये पसंद नही आया और उसने आपको गिरफ़्तार कर उसी बार(कोर्ट) के जज के सामने पेश कर दिया; उस वक़्त आपकी उम्र महज़ 15 साल थी, जज ने एक कम उम्र के लड़के को अपने सामने देख कर हैरतज़दा हुआ और उसने आपसे कुछ सवाल किया, जिसका जवाब आपने बहुत ही बेबाकी से दिया, आपकी हिम्मत को देख जज बहुत ख़ुश हुआ और उसने लोगो को ताकीद की के कोई आपको तंग न करे, फिर क्या था एडवोकेट मौलवी ख़लीलुर्रहमान साहेब ने आपको एक टेबल दी और कहा “अब इसपर चढ़ कर तक़रीर करना” और यही वो माहौल था जिसने आपको एक इंक़लाबी बनाना शुरू किया।

1923 में इंडियन नेशनल कांग्रेस, ख़िलाफ़त कमिटी, आकली दल और आल इंडिया जमीयत उल्मा का सालाना इजलास यानी राष्ट्रीय अधिवेषण गया शहर में धूम धाम से मनाया गया, इस इजलास में आपको आपके उमर के वॉलेंटियर का सुपरवाईज़र बना दिया गया। ये वही साल था जब कांग्रेस का ज़वाल शुरू हुआ, कांग्रेस अंदर ही अंदर गिरोहो में टने लगा एक तरफ “देश बंधु” तो दूसरी जानिब “महात्मा गांधी”। इसका असर “गांधी क़ौमी विद्यालय” पर पड़ा लोगो में ताअस्सुब आने लगा; बात बात पर “हिन्दू मुस्लिम” होने लगा, मुस्लिम शिक्षक और छात्रों ने स्कूल छोड़ दिया, “गांधी क़ौमी विद्यालय” अब “हिन्दू क़ौमी विद्यालय” हो चूका था पर ये भी ज़्यादा दिनों तक नही चल सका कुछ महीनो में ही स्कूल बंद हो गया, अब आप वापस सरकारी स्कूल की तरफ़ मुड़े , फिर आपके वालिद ने आपको 1924 में पढ़ने के लिए कलकत्ता भेज दिया वहां आपने बीमारी की वजह कर 1 साल में ही पढ़ाई को छोड़ वापस गया आ गए। गया में ही आपका इलाज हुआ जिसके बाद आपके वालिद की सारी जमा पूंजी ख़त्म हो गई और आपको अपनी पढ़ाई बीच में ही हमेशा के लिए छोड़ देनी पड़ी।

1930 में आपके अंदर पढ़ने का शौक़ फिर से जागा, 1931 में हुवे एग्ज़ाम में आप टॉप कर गए पर युनिवर्सिटी के एग्जाम में 6 नंबर की वजह कर नाकामयाब हो गए; पर आपकी हिकमत अमली को देख कर 1931 में आपको जमीयतुल तालबा गया के सदर यानी अध्यक्ष बना दिया गया।

1931 में ही आपने हाथ से लिखा हुआ “हिन्दुस्तान” नाम का पर्चा निकलना शुरू किया जिसे अंग्रेज़ी हुकुमत ने बाग़ीयना समझ कर ज़ब्त कर लिया। इसी साल रमज़ान के आख़री जुमे(जुमातुल वेदा) को आपने गया शहर की जामा मस्जिद के सेहन में अपनी नज़म “मुस्लिम से ख़िताब” पढ़ी, नज़म सुनने के बाद पूरा मजमा जोश में आ गया, अभी आप वहां से हटे भी नही थे; की सब इंस्पेक्टर ने आपको गिरफ़्तार कर लिया; पर आपको मुजरिम साबित नही कर सका और आप बाइज़्ज़त बरी हो गए इस वक़्त आपकी उम्र महज़ 24 साल थी।

इस हादसे के बाद आपके वालिद साहेब ने आपको “मुज़फ़्फ़रपुर” भेज दिया पर 3 माह में ही आप वहां से लौट आये। आपने कुछ दिन गया में गुज़ारे ही थे की वालिद ने आपको वापस मुज़फ़्फ़रपुर जाने का हुक्म सुना दिया, लेकिन आपका दिल वहां जाने को बिलकुल तैयार नही था। वालिद साहेब ने आपको मुज़फ़्फ़रपुर तक का किराया दे कर रुख़सत किया पर मुज़फ़्फ़रपुर न जा कर आप गया शहर से पटना आ गए, और इत्तेहाद कांफ़्रेंस वालों के साथ हो लिए और कलकत्ता पहुंच गए।

अब आपके पास बदन पर ओढ़े हुवे कपड़े के इलावा कुछ नही था, जैसे तैसे कर आपने एक फ़ोटो शूट करने वाली कंपनी में एजेंट का ओहदा संभाला, महीने भर मेहनत करने के बाद आपको 60 रुपया दिया गया जिससे आपने रेशमी कटपीस का गठ ख़रीदा और पुरे बंगाल का दौरा शुरू किया ढाका, मुर्शिदाबाद, मिदनापुर, परगना, रंगपुर होते हुवे आप असम के सरहद पर जा निकले, रास्ते में आने वाले सारे बाज़ार क़स्बे घूम लिया, बंगालियों के श्रृंगार के सामान भी आप ख़रीदो फ़रोख़्त करने लगे, इसी तरह 3 माह गुज़र गया और आपको 250 रूपये का मुनाफ़ा हुआ पर आपकी सेहत पर इसका बुरा असर पड़ा, आख़िर में आपने उन रूपये का मेज़, कुर्सी, टेबल, अलमारी वग़ैरा ख़रीदा और 14 रूपये हर महीना के हिसाब से एक कमरा किराये पर ले कर इसमें कंपनी { Sa-Min Publicity & Printing Beaure } का दफ़्तर खोला। उर्दू , हिंदी, इंग्लिश का कॉन्ट्रैक्ट भी मिल गया और कुछ ही दिन में काम अच्छा जम चूका था इस वजह कर 2 हेल्पर 20 रुपया हर महीने के हिसाब से रख लिया।

1932 में ही इत्तेहाद कॉन्फ़्रेंस कलकत्ता में में होने को हुई, हिंदुस्तान के तमाम सूबे से नुमाइंदे आ रहे थे और सूबे बिहार की तरफ़ से आपका नाम पेश कर दिया गया था। अब आपने सारे काम को हेल्पर के हवाले कर इस कॉन्फ़्रेंस को कामयाब बनाने में लग गए , इस कॉन्फ़्रेंस में मौलाना अहमद सिंधी, मौलाना गुलशन ख़ान, मौलाना इरफ़ान साहेब , मौलाना अबुल कलाम आज़ाद , पंडित मदन मोहन मालवीय वग़ैरा आये हुवे थे , सबसे काम उम्र वालों में हारिस साहेब, आप और एडिटर अजमल बम्बई वाले थे। पर किसी वजह कर इत्तेहाद कॉन्फ़्रेंस टूट गई और कोई कामयाबी हाथ न लगी।

इसी साल “ऑल इंडिया मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस” कलकत्ता में होने को था और आपके हिसाब से इसके पीछे पूरी तरह से युरोप की ताक़ते थीं; इस लिए आपने इसका मुख़ालफ़त किया, नौजवान मुसलमानो की एक कमिटी “बंगाल मुस्लिम नौजवान पार्टी” बना कर आपने “मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस” की मुख़ालफ़त शुरू की! लोगो ने आपको ही इस पार्टी का सदर बना दिया था।

“आल इंडिया मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस” के नुमााईंदों ने भी आप लोगो के ख़िलाफ़ साज़िश शुरू की; आप लोगों के बारे में तरह तरह के बेहूदा अलफ़ाज़ का इस्तेमाल किया; पर आप लोग टस से मस नही हुवे और उनकी मुख़ालफ़त जारी रखा, हर रोज़ कलकत्ता में सुबह और शाम “आल इंडिया मुस्लिम कॉन्फ्रेंस” के ख़िलाफ़ जलसे होने लगे; पर आप लोगों को कोई ख़़ास कामयाबी हासिल नही हुई। “आल इंडिया मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस” वालो ने जलसे की तारीख़ तय कर दी और इसमे शामिल होने के लिए लोग हर सूबे से आने लगे, अब कोई चारा न देख कर आप लोगो ने जस्ले की जगह पर हुड़दंग करने को ठानी, जिसके बाद “मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस” के लोगो से आप लोगो का टकराव हो गया जिसमे आपके कई साथी ज़ख़्मी हो गए; आपको भी चोटें आई , पर आप लोग घबराये नही; वापस जलसे की जगह के तरफ मुड़े और पंडाल को उखाड़ना शुरू किया; जिससे पूरे मजमे में अफ़रा-तफ़री फैल गई।

“मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस” का कोई भी नुमाइंदा तजवीज़ ले कर स्टेज पर आता तब आप और आपके साथी हंगामा कर उसे बैठने पर मजबूर कर देते; जिसके नतीजे मे “मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस” की एक भी तजवीज़ अवाम के बीच में नही आ पाई। ये आपके लिए एक बड़ी कामयाबी थी, इस वजह कर पुरे कलकत्ता के लोग आपको पहचानने लगे और नौजवान तो आपके मुरीद हो गए थे। 1932 में ही आपको बंगाल मजलिसे अहरारुल इस्लाम का सेक्रेटरी बना दिया गया, पर तिजारत की वजह कर आपने इस्तीफ़़ा दे दिया, पर 2 माह के बाद आपको वापस सेक्रेटरी बना दिया गया और आप अवाम के दबाओ में आ कर इस पद से इंकार न कर सके।

15 जून 1932 को सुबह 4 बजे आपके घर पर छापे पड़े; CID ने आपके घर को चारो तरफ़ से घेर लिया था, तलाशी का वारंट दिखा कर पुलिस ने तलाशी शुरू की जिसमे उन्हें अंग्रेज़ मुख़ालिफ़ बाग़ीयाना पर्चे और बहुत से ग़ैर क़ानूनी सामान मिले, पुलिस ने सबको ज़ब्त कर लिया और आपको गिरफ़्तार कर लिया और साथ चलने को कहा; पर आपने पैदल जाने से साफ़ इंकार कर दिया फिर आपके लिए मोटर लाई गई तब तक आपने नहाया और नाश्ते किये फिर अपने दोस्तों को अलविदा कह उनके साथ चल दिया। अगले दिन कलकत्ता के सारे अख़बार ने इस वाक़ये को सफ़े अव्वल पर छापा गया। आपको 14 दिन कि पुलिस हिरासत में भेज दिया गया; जहां आप पर जल्लाद ने हर तरह के ज़ुल्म ढाये; पर आपने अपना मुंह नही खोले, 14 दिन बिना किसी इंसान के बीच पुलिस हिरासत में रहने की वजह कर आपका वज़न 18 पौंड घट चुका था। आख़िर में थक हार के आपको अलीपुर सेंट्रल जेल में भेज दिया गया जहाँ इंसानो की जमात देख कर आपके जान में जान आई।

मुक़दमा चीफ़ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट के पास पेश हुआ आपके उपर 5 दफ़ा लगाये गए थे जिसमे आपको 30 माह , 7 साल, 14 साल, 30 साल से लेकर फँसी तक हो सकती थी। आपकी तरफ़ से कांग्रेस के नेता गुप्ता साहेब जो उस वक़्त के कामयाब वकील गिने जाते थे; पैरवी केर रहे थे। और उनके साथ कंधे से कांधा मिला कर खड़े थे जनाब मौलवी एडवोकेट शम्सुद्दीन साहेब जो कोल्कता हाई कोर्ट मे वकालत करते थे। उनके इलावा बंशला कोर्ट के कोंसलर जी सी मुखर्जी और जनाब टी पी चटर्जी भी केस की पैरवी कर रहे थे।

इनलोगो की मेहनत और अवाम की दुवाएँ रंग लाई और आप पर लगे एक भी जुर्म को कोर्ट में साबित नही किया जा सका; लेकिन फिर भी मजिस्ट्रेट 18A प्रेस एक्ट के तहत 50 रूपये का जुर्माना लगा दिया और जुर्माना नही अदा करने पर 35 दिन की सज़ा मुक़र्रर कर दी।

आपके पास पैसे तो थे नही इस लिए आपके क़रीबी ‘भोले मियां’ और ‘बुज़ुर्ग शाह’ अपने तरफ़ से जज को 50 रुपया अदा कर आपको रिहा करवाना चाहा; पर आपको अंग्रेज़ो से इस क़दर नफ़रत थी के इन फ़िरंगियो को आप एक फूटी कौड़ी नही देना चाहते थे। इसलिए आपने इंकार कर दिया और 35 दिन जेल में रहना मुनासिब समझा।

इसके बाद आपको कोलकाता प्रेसिडेंशियल जेल भेज दिया गया; फिर वहां से अगले दिन आपको अलीपुर सेंट्रल जेल के लिए रवाना कर दिया गया, जेल में आपके उम्र के हज़ारो नौजवान थे; इसी वजह कर जेल में भी तक़रीर का दौर चलने लगा, धीरे धीरे वक़्त गुज़रता गया और आपकी सेहत में भी कुछ सुधार आया। आख़िर आपके रिहा होने का दिन आ ही गया, जेल की गेट पर सैकड़ों की तादाद में अवाम सजी हुई मोटर और फूल मालाओं के साथ आपका इस्तक़बाल करने के लिए खड़ी थी; इसमें आपके कई दोस्त भी थे। पूरा इलाक़ा नारा ए तकबीर “अल्लाह ओ अकबर” की सदाओं से गूंज उठा।

अगले दिन मुसलमान ए कलकत्ता की जानिब से “बंगाल मजलिसे अहररुल इस्लाम” के बैनर तले आपके इस्तक़बाल में एक अज़ीमुश्शान जलसा को अंजाम दिया गया जिसमे लोगों ने आपकी हौसला अफ़ज़ाई की, इन तमाम बातों की ख़बर आपके वालिद साहेब को लग चुकी थी, उन्होंने ख़त लिख कर आपको फ़ौरन ‘गया’ आने का हुक्म सुनाया, चूंकि आपकी कम्पनी बंद हो चुकी थी और सारा पैसा डूब चूका था इस लिए आपने भी सरे फ़र्नीचर बेच घर जाने को सोची और “गया” पहुंच गए। लोगो ने आपका वहां भी गर्मजोशी से इस्तक़बाल किया, आप वापस कलकत्ता जाना चाहते थे लेकिन घर वालो के दबाव में आप हिल नही सके, आख़िर में आपको ज़िम्मेदारी में बांधने के लिए 29 जून 1934 को आपकी शादी कर दी गई।

“मेरी तमन्ना ये है के मादर ए वतन की क़ुर्बान गाह पर मेरी जान क़ुर्बान हो जाए… बिस्तर ए र्मग पर पांव रगड़ रगड़ कर मरने के बजाय अल्लाह की राह में मैदान ए जंग में या फाँसी के तख़्त पर जान दुँ… आमीन , सुम्मा आमीन- फ़क़्त”

(शाह वजीहउद्दीन ‘गर्म’ मिनहाजी 1-फरवरी-1936)

चूंकि बदन में दौड़ता सारा लहू ईमान वाला था
इसलीए “गर्म” कहाँ खामोश रहने वाला था ..!!

आपने अंग्रेज़ो के मुख़ालफत के लिए अपने क़लम का सहारा लिया और फिर से हाथ से लिखे हुवे पत्रिका का दौर शुरू हुआ। आप क्रन्तिकारी पत्रिका लिखते थे जिसका नाम आपने “बाग़ी” रखा, जिसमे आप अंग्रेज़ों के ज़ुल्म की दास्तान लिखने के बाद अवाम से अंग्रेज़ों की मुख़ालफ़त करने के लिए दर्ख़ास्त करते थे। इस पत्रिका मे उन्होने अंग्रेज़ों से किसी भी तरह का सम्बन्ध रखने से मना किया और गुज़ारिश करते थे की कोई भी हिंदुस्तानी अंग्रेज़ो के पास नौकरी ना करे। और इस पत्रिका को खुद गाँव गाँव जाकर बांटते थे।

इस पत्रिका को निकालने वाले का नाम तो अंग्रेज़ों को आज तक नही पता चल सका पर उस पत्रिका के मौज़ू (विषय) और विवरण से अंग्रेज़ों ने ये अंदाज़ा लगा लिया की उसे “शाह वजीहउद्दीन मिनहाजी” जो बिहार मे “गर्म अज़ीमाबादी” के नाम से मशहूर थेे; ही लिखते थे। इस वजह कर आपको कई बार शक की बुनयाद पर गिरफ़्तार भी किया गया जिसका गवाह भागलपुर और गया कि जेलें हैं। पर कभी जुर्म साबित नही हो सका इस वजह कर आप हमेश जेल से बहार आ जाते थे। आपको शेरो शायरी का भी बहुत शौक़ था, आपने बहुत सारी ग़ज़लें तो जेल की सलाख़ों के पीछे ही लिखा था।

आपको जितना मुसलमान होने पर फ़ख़्र था, उतना ही आपको मुसलमान के नाम पर सियासत करने वालो से नफ़रत भी थी, आपने “मुस्लिम लीग” की खुल कर मुख़ालफ़त की। आपने जिन्ना की टू नेशन की थेओरी को बिलकुल ही ठुकरा दिया था जिसकी झालक आपको उनकी ग़ज़ल के इस मिसरे में दीखता है।

“चाहा तो था के क़ाएद ए आज़म को मान लुँ,
अल्लाह ने बचा लिया, एैसा ना हो सका..”

आप एक महान क्रन्तिकारी, लेखक, कवि और समाज सेवी थे, पर फ़िलहाल के लिए इतनी ही जानकारी इकठ्ठा कर पाया हुँ इसलिए आपकी एक ग़ज़ल के साथ आपको खिराजे अक़ीदत पेश करता हुआ ये मज़मून फ़िलहाल खत्म करता हूँ , आपका इंतकाल 15 नवम्बर 1984 को हो गया था।

मेरा क़सूर ये है के काबा को छोड़ कर,
लज़्ज़त शनास बज़्म ए कलीसा ना हो सका..

मै दे ना सका आलम ए इस्लाम को फ़रेब,
दर पर्दा मकरोनौद काबिना ना हो सका..

ले ले के नाम अहमद ए मुरसिल का बार बार,
ख़िदमत गुज़ार पीर ए कलीसा ना हो सका..

बाग़े नबी को दे ना सका दवाते ख़ेज़ां,
नासूर ए क़लब मिल्लते बैज़ा ना हो सका..

चाहा तो था के क़ाएदे आज़म को मान लुँ,
अल्लाह ने बचा लिया,ऐसा ना हो सका..