18वीं सदी की शुरुआत में मुल्क कंधार से असम तक तो नेपाल से मालाबार तक फैला हुआ था, लेकिन औरंगज़ेब के वफ़ात के बाद मुल्क किसी किताब के पन्ने की तरह अलग होने लगा। जिस अंग्रेज़ को दरबार में झुकना पड़ता था उसी अंग्रेज़ के वज़ीफ़ा पर दिल्ली की हुकूमत टिक गयी थी, 18वीं सदी के शुरुआत में जहाँ औरंगज़ेब के वफ़ात ने अंग्रेज़ो को ताक़त दी और आख़िर में टीपु सुल्तान की शहादत ने अंग्रेज़ों को इस मुल्क का हुक्मरान ही बना दिया. ये तमाम ख़ूनी ड्रामे और खेल शाह वलीउल्लाह के आँखों के सामने हो रहे थे, दिल इन हालात पर रंज कर रहा था तो ज़हन इन हालात से निकलने की उधेड़बुन में था। इसी उधेड़बुन में शाह वली उल्लाह ने 1728 हिजरी में अरब की ज़मीन का सफ़र किया, वहाँ मुख़्तलिफ़ मुल्क के लोगों से मुख़्तलिफ़ मुल्क के हालात मालूम करते रहे, मुख़्तलिफ़ ख़्यालात ने आपको ये अहसास करने के लिए मजबूर कर दिया कि इस वक़्त जो बर्बादी और तबाही समाज की हो रही है, इसकी बड़ी वजह शहनशाहीयत है इसलिए निज़ाम हुकूमत की इस्लाह की ज़रूरत है।

शाह साहब फ़ौजी इंक़लाब के हामिल थे, लेकिन इस्लाह फ़ौज के ज़रिए नही होती उसकी लिए रज़ाकार की ज़रूरत थी, इसलिए शाह साहब ने दिल्ली की ज़मीन पर एक तँज़ीम की बुनियाद रखी। हिन्दुस्तान को शाहवली उल्लाह की ज़ात पर फ़ख़्र करना चाहिए के शाहवली उल्लाह ने एक इंक़लाब की बुनियाद तब रखी जब फ़्रांस में क्रांति नही हुई थी, अभी दुनिया को रूस की तहरीक देखना बाक़ी था। अफ़सोस का मुक़ाम ये रहा कि शाहवली उल्लाह को याद भी किया जाता है तो सिर्फ़ मज़हबी ख़िदमात के लिए लेकिन वो मज़हबी आदमी से ज़्यादा एक इंक़लाबी शख़्सयत के मालिक थे।

शाह वलीउल्लाह मुहद्दिस देहलवी, एक एैसे क्रान्तिकारी विचारक जिन्हें भुला दिया गया।

शाहवली उल्लाह के नज़रियात कुछ इस तरह हैं :- दौलत की असल बुनियाद मेहनत है, जब तक कोई शख़्श मुल्क के लिए काम ना करे मुल्क की दौलत में उसका कोई हिस्सा नही। जुआ और अय्याशी के अड्डे ख़त्म किए जाएं, इससे पैसा एक जगह जमा होता है। मज़दूर किसान और जो लोग मुल्क व क़ौम के लिए अपने दिमाग़ का इस्तेमाल करे, दौलत के मुस्तहक़ वही है, उनकी तरक़्क़ी ही मुल्क की तरक़्क़ी है। मज़दूर की मज़दूरी काम के हिसाब से होनी चाहिए नाकी ज़रूरत के हिसाब से। काम के वक़्त तय किए जाने चाहिए, मज़दूरों को इतना वक़्त मिलना चाहिए कि वो अपनी ज़िन्दगी की बाक़ी ज़रूरत पूरा कर सके। ज़मीन का मालिक अल्लाह है, और बसने वाले लोग मुसाफ़िर, किसी को इख़तियार नही के वो लोगों को ज़मीन की ख़ातिर इधर से उधर करें। स्टेट के सरबराह की हैसियत मैनेजर जितनी है, उसे उतनी ही तनख़्वाह मिलनी चाहिए जितनी की एक आम आदमी की ज़रूरत है। रोटी कपड़ा मकान और इतनी इस्ततात होनी चाहिए कि आदमी निकाह कर सके और अपने बच्चे की परवरिश कर सके, ये स्टेट में बसने वाले हर इंसान का बुनियादी हक़ है। हर मज़हब और हर नस्ल के लोग की इज़्ज़त जान माल तहज़ीब ज़बान की हिफ़ाज़त की जाए, और ये इंसान का बुनियादी हक़ है।

इन सभी चीज़ों को हासिल करने के लिए अलग अलग यूनिट बनाई जाए और हर यूनिट के पास इतनी ताक़त हो कि वो अपने इकदाम को हासिल कर सके, सभी यूनिट एक ब्लाक से जुड़े होने चाहिए। और जो फ़ौजी ताक़त और इक़तदार का मालिक हो उसे इस बात का अख़्तियार नही कि किसी यूनिट में किसी ख़ास मज़हब को लाद सके, उसे इस बात का अख़्तियार होना चाहिए कि कोई यूनिट या कोई मज़हब एक दूसरे के हक़ को ना मार सके।

जब अंग्रेज़ मुल्क में पूरी तरह से हाकिम नही बने थे, मुग़ल अभी भी अवाम के बादशाह थे, उस वक़्त इस मुल्क का सबसे बड़ा स्कॉलर सियासत का एक नज़रिया दे रहा था, जिस नज़रिये के साए तले हिन्द के हर अवाम सकूँ हासिल कर सके, एक एैसा समाज बन सके जहाँ हिंदू मुस्लिम दोनो अमन के साथ ज़िंदगी गुज़ार सके। आज कम ओ बेश हम इसी सियासी नज़रिये के साथ चल रहे हैं, आप चाहे तो शाह वली उल्लाह को भी मसलहत पसंद कह कर कोस सकते हैं, आप यहाँ के सियासी नज़रिए को मग़रिब से जोड़ते हैं और मैं शाह वली उल्लाह से जोड़ता हूँ। शाह वली उल्लाह के वफ़ात के बाद फ़्रांस और रूस का इंक़लाब हुआ था।

अब्दुर रशीद इब्राहीमी