राजीव शर्मा

वह दौर 1947 का था जब भारत को आजादी की सौगात के साथ बंटवारे का जख्म भी मिला। पाकिस्तान से कई लोग अपनी जान बचाकर जल्द से जल्द भारत पहुंचना चाहते थे क्योंकि कल तक जो मुल्क उनका अपना था, आज वह किसी और का हो चुका था।

ऐसे लोगों में ज्यादातर हिंदू और सिक्ख थे। वहीं हिंदुस्तान से कई लोग इस उम्मीद के साथ पाकिस्तान जा रहे थे कि शायद उनकी किस्मत और अच्छी होगी, जिंदगी बहुत बेहतर होगी क्योंकि वह उनका मुल्क है। ऐसे लोगों में लाखों मुसलमान थे।

इसी मारकाट और देश छोड़ने की जद्दोजहद में एक परिवार पाकिस्तान से हिंदुस्तान आ गया। वह कोई हिंदू नहीं था। वह सिक्ख या जैन भी नहीं था। वह खुद को पहले हिंदुस्तानी मानता था, उसके लिए सभी धर्म और मजहब इसके बाद की बातें थीं।

उसका परिवार बहुत इज्जत और रुतबे वाला था लेकिन वतन से मुहब्बत के लिए उसने परिवार के कई लोगों को भी खुदा हाफिज कहकर अपने भारत की राह पकड़ी।

यह शख्स था आजाद हिंद फौज का एक वफादार सिपाही जिसने आजादी की जंग में अंग्रेजी सेना का बहादुरी से सामना किया था। फौज के सुप्रीम कमांडर नेताजी सुभाषचंद्र बोस को उस पर बहुत गर्व था। उस शख्स का नाम था- जनरल शाह नवाज खान।

भारत-पाक बंटवारे में जब लाखों मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे तब उन्होंने कहा कि मेरा मुल्क हिंदुस्तान था और वही रहेगा। इसलिए मैं मातृभूमि की सेवा के लिए भारत जा रहा हूं। उस समय कई लोगों ने उन्हें समझाया और भड़काया- क्या करोगो वहां जाकर? अब वह मुल्क पराया है। वहां कोई तुम्हें पानी के लिए भी नहीं पूछेगा और बहुत मुमकिन है कि कोई तुम्हारे नाम के साथ जुड़ा हुआ खान शब्द सुनकर तुम्हारा कत्ल ही कर दे

… लेकिन जनरल शाहनवाज को ये प्रलोभन और नसीयत डिगा नहीं सके। वे भारत आए और इसी जमीन की सेवा करते हुए उन्होंने आखिरी सांस ली।

जब वे आजाद हिंद फौज में थे तब उन्होंने अपने रणकौशल से अंग्रेजों की चिंता बढ़ा दी। उनके एक हुक्म पर आजाद हिंद के सिपाही जान कुर्बान करने के लिए तैयार हो जाते थे। युद्ध की बदली परिस्थितियों के कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कैद कर लिया और उन पर मुकदमा चलाया गया।

नेताजी सुभाष का सहयोगी होने के कारण अंग्रेज उन्हें मृत्युदंड देना चाहते थे लेकिन शाहनवाज को मौत का कोई खौफ नहीं था। वे अंग्रेज सरकार से न दबे, न झुके। आखिरकार वे बरी हुए और देश की आजादी के बाद सक्रिय राजनीति में शामिल हुए।

आजादी का यह सिपाही जानता था कि आजाद हुए इस देश में राजनेताओं की भी उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी सरहद पर तैनात एक सैनिक की। वे 1952 में मेरठ से एमपी चुने गए। इसके बाद भी उन्होंने 1957, 1962 और 1971 में यहां से जीत दर्ज की। वे केंद्र सरकार में मंत्री पद पर भी रहे।

उन्हें इस बात का तो मलाल था कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत को वैसा नहीं बना सके जिसका वे सपना लिया करते थे लेकिन उन्होंने नेताजी के नाम पर एक गांव जरूर बसाया था। उस गांव का नाम है- सुभाषगढ़। यह उत्तराखंड में है और हरिद्वार के नजदीक स्थित है।

जनरल शाहनवाज और नेताजी की जन्मतिथि में भी एक अद्भुत समानता थी। नेताजी का जन्मदिवस 23 जनवरी (1897) को आता है वहीं शाहनवाज का 24 जनवरी (1914) को। उनका जन्म रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) के गांव मटौर में हुआ था।

1940 में वे ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल हुए। जब नेताजी ने देश की आजादी के लिए आह्वान किया तो वे बोले – मैं हाजिर हूं और वे नेताजी के मजबूत तथा भरोसेमंद साथी बन गए। 9 दिसंबर 1983 को उनका देहांत हो गया।

आज देश में सांप्रदायिकता का जहर घुल रहा है, देशभक्ति और धर्म की नई-नई व्याख्या सामने आ रही हैं, इस शोर में रोज नई आवाजें उठती हैं और कई गुम हो जाती हैं। इन्हीं गुम हो चुकी आवाजों में एक आवाज जनरल शाह नवाज खान की भी है जिन्होंने हिंदुस्तान की सेवा के लिए पाकिस्तान को अलविदा कह दिया था। जो लड़ार्इ शाहनवाज आैर उनके साथियों ने अंग्रेजों से जीती थी, आजादी हमें सौंपकर शायद वे हम हिंदुस्तानियों से हार गए।