Shubhneet Kaushik

दिवंगत मार्क्सवादी अर्थशास्त्री समीर अमीन (1931-2018) के लेखन से मेरा पहला परिचय उनका लेख ‘ऑन डिवेलपमेंट’ पढ़ते हुआ। जो एक अन्य प्रसिद्ध अर्थशास्त्री आंद्रे गुंदर फ्रैंक को समर्पित निबंधों के एक संकलन में छपा था। इस किताब का शीर्षक है : ‘द अंडरडिवेलपमेंट ऑफ डिवेलपमेंट’। पुस्तक का शीर्षक असल में आंद्रे गुंदर फ्रैंक के अत्यंत चर्चित लेख ‘डिवेलपमेंट ऑफ अंडरडिवेलपमेंट’ पर आधारित था। उल्लेखनीय है कि आंद्रे गुंदर फ्रैंक के इस लेख का प्रयोग दुनिया भर में पूंजीवाद के चरित्र और उपनिवेशों की अर्थव्यवस्था की प्रकृति को समझने में किया गया।

भारतीय संदर्भ में, बिपन चंद्र और सब्यसाची भट्टाचार्य सरीखे इतिहासकारों ने औपनिवेशिक भारत का आर्थिक इतिहास लिखते हुए आंद्रे गुंदर फ्रैंक की धारणाओं का उल्लेख किया है। इस किताब में ‘ऑन डिवेलपमेंट’ के अलावा समीर अमीन ने अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था पर भी एक लेख लिखा था।

समीर अमीन ने अपने लेख में आंद्रे गुंदर फ्रैंक द्वारा दिये गए निर्भरता के सिद्धान्त (डिपेंडेंसी थियरी) का विश्लेषण करते हुए बीसवीं सदी में खासकर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूंजीवाद व साम्राज्यवाद के चरित्र में आते बदलावों की विशद चर्चा की।
इस क्रम में उन्होंने वैश्विक संदर्भ में पूंजीवाद के द्वारा किए गए बँटवारे (ग्लोबल नॉर्थ व ग्लोबल साउथ), वैश्विक आर्थिक संगठनों के साम्राज्यवादी चरित्र का भी खुलासा किया। इसी लेख में 1955 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन द्वारा आयोजित बांडुंग कान्फ्रेंस को उन्होंने ग्लोबल साउथ के द्वारा ग्लोबल नॉर्थ को दो दी गई चुनौती के रूप में देखा।

मिस्र की राजधानी कैरो में जन्मे और पेरिस से शोध करने वाले समीर अमीन को पढ़ते हुए लगातार यह एहसास होता है कि आप एक ऐसे विरले मार्क्सवादी विद्वान को पढ़ रहे हैं, जिसके लिए मार्क्सवाद कोई डॉग्मा नहीं है। वह यथार्थ व तथ्यों के धरातल पर अपनी धारणाएँ निर्मित करते हैं, नकि किसी दिये हुए सिद्धान्त के खाँचे में बिठाने के लिए तथ्यों को तोड़ते-मरोड़ते हैं।

अकारण नहीं कि ‘मंथली रिव्यू’ में छपे एक लेख में समीर अमीन को याद करते हुए अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने दो बातों को खासतौर पर रेखांकित किया है। पहला कि समीर अमीन बुद्धिजीवी होने के साथ-साथ जीवन भर एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता भी रहे। दूसरे उन्होंने अपने मार्क्सवादी विश्लेषण में पूंजी के साम्राज्यवादी चरित्र के विश्लेषण को प्रमुखता दी।

पूंजीवाद पर लिखते हुए समीर अमीन ने पूंजीवाद के समर्थक अर्थशास्त्रियों द्वारा फैलाये जाने वाले ‘वैश्विक पूंजी’, ‘मुक्त व्यापार’ जैसे शाब्दिक छलावों की कलई खोली। उन्होंने यूरोकेंद्रिकता की आलोचना की और उन वैश्विक आर्थिक नीतियों की भी जो दुनिया के देशों के बीच सम्बन्धों को केंद्र व परिधि के बीच जैसे संबंध में तब्दील कर देती हैं।

इस संदर्भ में उनकी किताब ‘एकुमुलेशन ऑन ए वर्ल्ड स्केल’ भी उल्लेखनीय है, जिसमें उन्होंने पूंजीवाद के अतिसंचय की प्रवृत्ति और उससे उपजने वाली वैश्विक असमानता का विश्लेषण किया। समीर अमीन ने मूल्य के सिद्धान्त (लॉ ऑफ वैल्यू) और ऐतिहासिक भौतिकवाद पर भी बेहतरीन काम किया। समीर अमीन के अर्थशास्त्रीय चिंतन पर मार्क्स व लेनिन के अलावा पॉल बराँ, पॉल स्वीजी और हैरी मैगडाफ के लेखन का भी गहरा प्रभाव रहा।