Shubhneet Kaushik

आज से चार साल पहले, 10 नवंबर, 2014 की शाम इतिहासकार एम.एस.एस. पांडियन का हृदयगति रुक जाने से निधन हो गया। अकादमिक दुनिया और सार्वजनिक विमर्श के बीच की कड़ी की भूमिका निभाने वाले एम.एस.एस. पांडियन, समसामयिक मुद्दों, राजनीति, अस्मितावादी आंदोलनों, जातिगत उत्पीड़न, राष्ट्रवाद आदि मुद्दों पर अपनी बेबाक राय अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में रखते थे।

जेएनयू में एम.फिल. के दौरान ‘हिस्टॉरिकल मेथड्स’ के पेपर में पांडियन से पढ़ने का मौका मिला। पांडियन ने पोस्ट-माडर्निज़्म की क्लास ली। क्लास में पांडियन बिलकुल अनोखे अंदाज़ से ‘पोस्ट-माडर्निज़्म’ सरीखे जटिल विषय को रोचक बना देते थे। गंभीर विषय पढ़ाते हुए भी ह्यूमर क्रिएट करना और क्लास को अंत तक रोचक बनाए रखना उनकी खासियत थी।
उत्तर-आधुनिकता के सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के बारे में और छवियों में बदलते यथार्थ के बारे में पांडियन ने बारीकी से बताया। कि कैसे आज के समय में छवि और यथार्थ के बीच अंतर समाप्त होता जा रहा है, और कैसे टीवी और इंटरनेट हमें तथाकथित ‘यथार्थ’ परोस रहे हैं, जिस पर हम सभी यकीन करते हैं।

पांडियन ने आधुनिकता के तीन ‘कार्डिनल सिंस’(रिडक्सनिज़्म, यूनिवर्सलिज़्म, और एसेंसियलिज़्म) और उसके मेटा-नेरेटिव के बारे में समझाया। मिशेल फूको के हवाले से कहा जाए तो आधुनिकता ‘उस तर्क-व्यवस्था पर आधारित है जो मानव-समाज के एक बड़े हिस्से को ‘अतार्किक’ बताकर उन्हें अलग और वंचित रखती है।’
स्थापत्य के उदाहरण देते हुए, पांडियन ने ला कार्बुजिए (माडर्निस्ट आर्किटेक्ट) और रॉबर्ट वेंतूरी (पोस्ट-माडर्निस्ट आर्किटेक्ट) के स्थापत्य में अंतर के बारे में समझाया। वाल्टर बेन्यामीन, रिचर्ड काब, मिशेल राल्फ ट्रूलो, डेविड स्कॉट, मिशेल दे शेर्तु आदि के कामों से मेरा पहला परिचय पांडियन की क्लास में ही हुआ।

स्मृति, संवेदना, विस्मृति के इतिहास से भी पांडियन ने हमें वाकिफ़ कराया। साक्ष्यों की वस्तुनिष्ठता और तटस्थता पर संदेह करना, उनसे जिरह करना, प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण को भी उनके अपने अतीत के अनुभवों, उनकी अपनी सोच-समझ और धारणाओं की रोशनी में देखने की ज़रूरत भी पांडियन ने हमें सिखाया।

अभिलेखागारों के निर्माण के पीछे सत्ता-संरचना किस जटिलता से काम करती है, और कौन से दस्तावेज़ ‘दस्तावेज़’ मानकर संग्रहित किए जाते हैं और कौन नहीं। इस चयन की प्रक्रिया में सत्ता-प्रतिष्ठान की वैचारिकी क्या भूमिका निभाती है, यह भी उनकी क्लास में ही स्पष्ट हुआ। अतीत के उन पक्षों की ओर, जहां ऐतिहासिक स्रोत चुप्पी साध लेते हैं या उन्हें बलात चुप करा दिया जाता है; उन अंधेरे कोनों और चुप्पियों के इतिहास की ओर हमारा ध्यान पहले-पहल पांडियन ने ही आकृष्ट कराया।

बाद में, मैं पांडियन द्वारा पढ़ाये गए एक अन्य कोर्स ‘कास्ट, कल्चर, एंड कम्यूनिटी: एन आल्टर्नेटिव इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न इंडिया’ में भी शामिल हुआ। जहाँ पांडियन ने आधुनिक भारत के चार प्रमुख विचारकों- जोतिबा फुले, बीआर आंबेडकर, ई.वी. रामास्वामी पेरियार और राममनोहर लोहिया के बारे में पढ़ाया। इस दौरान पांडियन ने इन चारों विचारकों के जाति, समुदाय और संस्कृति संबंधी विचारों पर और इनके द्वारा गैर-ब्राह्मण/ जाति-विरोधी परिप्रेक्ष्य में जाति, जेंडर, और भाषा सरीखे मुद्दों पर की गयी पहलों पर भी प्रकाश डाला।

अपने एक अन्य महत्त्वपूर्ण कोर्स “रीज़न, लैंगवेज़ एंड द पॉलिटिक्स ऑफ नेशन मेकिंग” में पांडियन क्षेत्रीय अस्मिताओं, भाषाई अस्मिता और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया की पड़ताल करते थे, और इस क्रम में क्षेत्र, भाषा और राष्ट्र से जुड़े हुए हमारे कई पूर्वाग्रहों और पूर्व-धारणाओं को तोड़ते भी थे।
पांडियन द्रविड़ आंदोलन के अधिकारी विद्वान माने जाते थे; उनकी किताब “ब्राह्मण एंड नॉन-ब्राह्मण: द जीनियालॉजीज ऑफ तमिल पॉलिटिकल प्रजेंट” द्रविड़ आंदोलन पर लिखा गया एक बेहद विचारोत्तेजक ग्रंथ है।

एम.जी. रामचंद्रन पर पांडियन ने एक पुस्तक लिखी “The Image Trap: MGR in Films and Politics”। इस किताब में पांडियन ने यह पड़ताल करने की कोशिश की कि कैसे प्रभुत्त्वशील वैचारिकी, संघर्षशील क्षेत्रों में भी सफल हो जाती है और सबाल्टर्न वर्गों के बीच सम्मति का भाव पैदा कर देती है। इस पूरी प्रक्रिया को दर्शाने के लिए पांडियन ने, एमजीआर की स्क्रीन-इमेज़ और तमिलनाडु के सबाल्टर्न वर्गों के भीतर पहले से विद्यमान ‘कामन-सेंस’ में इस छवि के प्रवेश का विश्लेषण किया। फिल्मों, विज्ञापनों और मास-मीडिया के ज़रिये लोक-संस्कृति के अध्ययन में भी पांडियन की गहरी रुचि थी।