तहरीक ए ख़िलाफ़त युं तो 1912 मे शुरु हुआ पर पहली जंग ए अज़ीम (प्रथम विश्व युद्ध) के बाद 1919 में काफ़ी ज़ोर पकड़ 1922 तक जारी रहा … इसी दौरान स्वादेशी तहरीक भी अपने उरुज पर थी … फिर 1920 के बीच मे ख़िलाफ़त तहरीक का फैलाओ कर शुरु हुआ तहरीक अदम ताऊउन जिसे असहयोग आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है।

पर बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है.. जिस तरह तहरीक ए रेशमी रुमाल (1904 – 1915) को सेलेबस से निकाल कर बाहर कर दिया गया उसी तरह ख़िलाफ़त तहरीक को भी सेलेबस से या तो निकाल दिया गया है या फिर निकालने की कोशिश की जा रही है।

जबके हमें अकसर स्कुल में असहयोग आंदोलन के साथ ख़िलाफ़त तहरीक के बारे मे पढ़ाया जाता था कि इस तहरीक का मक़सद हिन्दु मुस्लिम एकता को बचाना था, जिसमे उस समय के तमाम बड़े से बड़े नेताओं ने हिस्सा लिया था, जिसमे सबसे बड़ा नाम महात्मा गांधी का है।

वैसे अब देखीये ? मै International Red Cross and Red Crescent Movement के बारे मे पढ़ रहा था. तभी एका एक ख़्याल आया इंटरनेशनल रेड क्रॉस व रेड क्रेसेन्ट मोवमेंट सिर्फ़ रेड क्रॉस मोवमेंट बन कर क्यों रह गया ..?? और ये Red Crescent आख़िर गया कहां ..? बुद्धी का बहुत इस्तमाल किया फिर भी समझ मे नही आया …! जबके डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी 1911-12 मे हुए बालकन युद्ध मे ख़िलाफ़त उस्मानिया के समर्थन मे Red Crescent के बैनर तले मेडिकल टीम की नुमाईंदगी की थी जिसमे उनके साथी थे मौलाना मोहम्मद अली जौहर और दीगर … इस काम के लिए डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी को “तमग़ा ए उस्मानिया” से नवाज़ा गया था जो उस समय वहां का एक बड़ा अवार्ड था जो फ़ौजी कारनामो के लिए दिया जाता था. Red Crescent के बैनर तले डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी के ज़रिये किए गए काम के लिए उन्हे ख़िलाफ़त के ज़वाल बाद भी याद किया गया जिसका ज़िक्र ख़ुद मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने महान भारतीय स्वातंत्रता सेनानी मुहम्मद इक़बाल शैदाई को इंटरवयु देते वक़्त किया था और उसने हिन्दुस्तान का शुक्र भी अदा किया था।

जहां तक बात Red Cross के Symbol की है वोह पुरी तरह सलीबयों यानी क्रुसेडर के झण्ड़े का रंग याद दिलाता है पर इस मिथक को तोड़ने के लिए इस Symbol को Swiss Flag से जोड़ दिया गया है, जिसे 1864 मे रिकागनाईज़ कर लिया गया था।

वैसे Red Crescent के Symbol की इबतिदा शुरुआत 1876 से 1878 के बीच हुए Russo-Turkish जंग मे हुई थी जिसे 1929 रिकागनाईज़ कर लिया गया।

बहरहाल अब लोग यह भी सवाल कर देंगे की नाम मे क्या रखा है…? ये तहज़ीब और विचारधारा की जंग है जो अपनी तहज़ीब और विचारधारा बचा लेगा वही टिक पाएगा वर्ना साम्राजवादी ताक़त ख़ुद ख़ुन बहाएंगी और फिर उसे पोछने के लिए भी आएंगी और ये International Red Cross and Red Crescent Movement इसी की एक कड़ी है।

जहां तक मामला हिन्दुस्तान का है यहां आज़ादी के बाद Red Wheel – Hindu Swastika के Symbol को युज़ करने की बात हुई थी पर लोगो ने Red Crescent के Symbol का ही सपोर्ट किया … वैसे बटवारे के बाद पाकिस्तान मे भी Red Cross के Symbol को ही सपोर्ट किया गया पर 1974 मे नाम बदल कर Red Crescent Societie कर दिया गया और Symbol के तौर पर Crescent (हेलाल) का युज़ किया गया और यही सब 1989 मे बंग्लादेश मे भी हुआ।

हिन्दुस्तान मे Red Cross Societie आज़ादी से पहले 1920 मे वजुद मे आई जबके हिन्दुस्तान के लोगो ने ख़िलाफ़त उस्मानीया के समर्थन मे 1912 मे ही Red Crescent Societie को अपनी सेवाएं देनी शुरी कर दी थी और इसकी बहुत सारी वजह थी, जिसमे एक थी मुहब्बत <3

हिन्दुस्तानी लोग उस्मानीयों क़िस क़दर मुहब्बत करते थे इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं की जब 1912 मे हिन्दुस्तान के लोग ख़ुद अंग्रेज़ो के ज़ुल्म का शिकार थे तब उन्होने बालकन युद्ध मे उस्मानी तुर्को की मेडिकल मदद के लिए रेड क्रिसेँट सोसाईटी को पहली क़िस्त मे मदद के तौर पर जो रक़म भेजी थी वो 185000 ओटमन लीरा थी, इस रक़म को जमा करने के लिए औरतो ने अपने गहने तक बेच डाले थे।

इन पैसों की मदद से Bulgaria के उजड़े हुए लोगों को Anatolia मे बसाने के लिए रिलीफ़ कैंप भी खोला गया था।

हिन्दुस्तान की तरफ़ से Red Crescent से जुड़े कई नौजवान काफ़ी रईस घरानो से तालुक रखते और इनमे अधिकतर इंगलैड मे ज़ेर ए तालीम थे, जो मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे, इन्होने उस्मानीयों की मदद के लिए ना सिर्फ़ अपने ख़र्चे को कम किया बल्की मैदान मे उतर मेडिकल कैंप लगाया… वैस इसमे सबसे नुमाया नाम है “ग़ाज़ी अब्दुर रहमान शहीद पेशावरी” का … जो अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सटी मे ज़ेर ए तालीम थे, वोह अपना पढ़ाई छोड़ कर 26 साल की उमर मे समुंद्री सफ़र का किराया देने के लिए अपनी किताबें और कपड़े बेच देता है और तुर्की पहुंच जाते हैं अपने ख़लिफ़ा की हिफ़ाज़त के लिए।

ये इत्तेफ़ाक़ देखिये पहली जंग ए अज़ीम के ख़ात्मे के बाद उस्मानीयों का साथ जब उनके ही हम वतन लोगों ने छोड़ दिया तब भी हिन्दुस्तानी लोग उनसे जुड़े रहे जिसका गवाह तहरीक ए ख़िलाफ़त यानी ख़िलाफ़त आंदोलन है।

हिन्दुस्तानी लोग उस्मानीयों की हर तरह से मदद करते रहते हैं और इसी बीच Turkish War of Independence भी होता है और इसके बाद उस्मानीयो का ज़वाल हो जाता है और ख़िलाफ़त का ख़ात्मा हो जाता है।

इक़बाल ने ख़ुब कहा है :-

अगर उस्मानीयों पर कोह ए ग़म टुटा तो क्या ग़म है,
के ख़ुन ए सद हज़ार अंजुम से होती है सहर पैदा..

ये नुकता सरगुज़शत ए मिल्लत ए बैज़ा से है पैदा,
के अक़वाम ए ज़मीन ए एशिया का पासबां तु है…

सबक़ फिर पढ़ सदाक़त का, अदालत का, शुजाअत का,
लिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत का…

यही मक़सुद ए फ़ितरत है, यही रम्ज़ ए मुसलमानी,
अख़ुवत की जहांगीरी, मुहब्बत की फ़रावानी…

Md Umar Ashraf