रानी चेनम्मा कर्नाटक में बेलगाम के पास एक गांव ककती में 23 अक्टूबर 1778 को पैदा हुई थी. प्रकृति ने कई बार उनसे क्रूर मजाक किया। पहले पति का निधन हो गया। कुछ साल बाद एकलौते पुत्र का भी निधन हो गया और वह अपनी मां को अंग्रेजों से लड़ने के लिए अकेला छोड़ गया। बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारवाजी, तीरंदाजी में विशेष रुचि रखने वाली रानी चेनम्मा की शादी बेलगाम में कित्तूर राजघराने में हुई। राजा मल्लासरता की रानी चेनम्मा ने पुत्र की मौत के बाद शिवलिंगप्पा को अपना उत्ताराधिकारी बनाया। अंग्रेजों ने रानी के इस कदम को स्वीकार नहीं किया और शिवलिंगप्पा को पद से हटाने का का आदेश दिया। यहीं से उनका अंग्रेजों से टकराव शुरू हुआ और उन्होंने अंग्रेजों का आदेश स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

अंग्रेजों की नीति ‘डाक्ट्रिन आफ लैप्स’ के तहत दत्तक पुत्रों को राज करने का अधिकार नहीं था। ऐसी स्थिति आने पर अंग्रेज उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लेते थे। कुमार के अनुसार रानी चेनम्मा और अंग्रेजों के बीच हुए युद्ध में इस नीति की अहम भूमिका थी। 1857 के आंदोलन में भी इस नीति की प्रमुख भूमिका थी और अंग्रेजों की इस नीति सहित विभिन्न नीतियों का विरोध करते हुए कई रजवाड़ों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। डाक्ट्रिन आफ लैप्स के अलावा रानी चेनम्मा का अंग्रेजों की कर नीति को लेकर भी विरोध था और उन्होंने उसे मुखर आवाज दी। रानी चेनम्मा पहली महिलाओं में से थीं जिन्होंने अनावश्यक हस्तक्षेप और कर संग्रह प्रणाली को लेकर अंग्रेजों का विरोध किया। रानी अंग्रेजो से युद्ध की तैयारियां पारंभ कर दी थीं. उसने अपने समस्त प्रजा का आव्हान किया की वह अंग्रेजो के साथ युद्ध के लिए तैयार रहे. कित्तूर की प्रजा जी- जान से अपनी रानी के साथ थीं.

मल्लप्पा शेट्टी और वेकंटराव जैसे देशद्रोही यदि उसके विरुद्ध थे तो गुरु सिद्दप्पा जैसे योग्य दीवान और वीर योद्धा उसके पक्ष में थे. सारा राज्य युद्ध की तैयारियों में लग गया. सभी लोग अपनी अपनी बंदूके और तलवारे तैयार करने लगे. हिन्दू और मुसलमान दोनों ही रानी का साथ दे रहे थे. युद्ध की तैयारियां रानी स्वयं कर रही थीं. कित्तूर के देशभक्तों का मनोबल भी ऊँचा था. उन्होंने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए और पराजित करके भगा दिया. अंग्रेजो को अपनी हार बुरी तरह खटक रही थीं | उन्होंने पुनः कित्तूर पर आक्रमण किया. अपने राज्य की बची – खुची शक्ति एकत्रित कर रानी ने फिर अंग्रेजी सेना का सामना किया. इस बार अंग्रेजो ने अपनी भेद नीति का जाल बिछाया और कित्तूर के कुछ लोगो को अपने वश में कर लिया.

इन सभी कारणों से रानी की पराजय हुई और उन्हें कैद कर लिया गया उसने भारतीय नारी एवं रानी दोनों की ही गरिमा का परिचय दिया और अंग्रेजो की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया. उधर बैगलहोल की कैद में बन्द रानी को अपने वीरों के फांसी पर चढ़ने के समाचार मिले तो वह इस आघात को बर्दाश्त न कर सकी. धन्य हैं वह वीर रानी , जिसने आज़ादी के लिए शक्तिशाली अंग्रेजो से युद्ध किया , जेल की यातनाएँ सही और हालांकि उन्हें युद्ध में कामयाबी नहीं मिली और उन्हें कैद कर लिया गया। अंग्रेजों के कैद में ही रानी चेनम्मा का निधन 2 फ़रवरी 1829 को 50 साल के उम्र में हो गया। रानी चेनम्मा के साहस एवं उनकी वीरता के कारण देश के विभिन्न हिस्सों खासकर कर्नाटक में उन्हें विशेष सम्मान हासिल है और उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष के पहले ही रानी चेनम्मा ने युद्ध में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। वाया : ‘क्रन्तिकारी कोष’