ध्रुव गुप्त

हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसे कई फ़नकार हुए हैं जो सिनेमा में थोड़ा ही योगदान देने के बावज़ूद अपने पीछे बड़ी-बड़ी यादें छोड़ गए। गीतकार मरहूम राजा मेहंदी अली खान सिने संगीत के सुनहरे दौर के ऐसे ही एक गीतकार थे। उन्हें कम गीत लिखने के मौक़े मिले, लेकिन उनके गीतों के उल्लेख के बगैर हिंदी के फिल्म संगीत का इतिहास लिखा जाना भी मुमकिन नहीं।

पाकिस्तान के झेलम में 1928 में जन्मे और पले इस शायर ने देश के विभाजन के बाद तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत में ही बसना और जीना-मरना स्वीकार किया। उन्हें सबसे पहले फिल्मकार एस. मुखर्जी ने अपनी फिल्म ‘दो भाई’ में गीत लिखने का मौका दिया। इस फिल्म का एक गीत ‘मेरा सुन्दर सपना बीत गया’ बहुत मकबूल हुआ। दिलीप कुमार अभिनीत ‘शहीद’ के उनके गीत ‘वतन की राह पे वतन के नौज़वां शहीद हो’ ने शकील, साहिर, हसरत जयपुरी, शैलेन्द्र, राजेन्द्र कृष्ण, मज़रूह और कैफ़ी आज़मी के उस दौर में भी राजा साहब को हिंदी सिनेमा में स्थापित कर दिया।

1950 की फिल्म ‘मदहोश’ में संगीतकार मदन मोहन के साथ उनकी लाज़वाब जोड़ी बनी जिसने देश को कई अनमोल संगीतमय फ़िल्में दीं हैं। जिन कुछ फिल्मों में राजा साहब ने गीत लिखे, उनमें प्रमुख हैं – दो भाई, शहीद, पापी, आंखें, मदहोश, अनपढ़, मेरा साया, रेशमी रूमाल, कल्पना, भाई बहन, वो कौन थी, नीला आकाश, दुल्हन एक रात की, एक मुसाफिर एक हसीना, अनीता, आपकी परछाईयां,जब याद किसी की आती है और जाल।

उनके लिखे कुछ अमर गीत हैं – मेरी याद में तुम न आंसू बहाना, मेरा सुन्दर सपना बीत गया, बदनाम ना हो जाए मुहब्बत का फ़साना, मैं प्यार का राही हूं, आप यूं ही अगर हमसे मिलते रहे, जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम, मैं निगाहें तेरे चेहरे से हटाऊं कैसे, है इसी में प्यार की आबरू वो ज़फा करे मैं वफ़ा करूं, जिया ले गयो जी मोरा सांवरिया, जो हमने दास्तां अपनी सुनाई आप क्यों रोए, लग जा गले कि फिर ये हंसी रात हो न हो, नैना बरसे रिम झिम रिमझिम, तू जहां जहां चलेगा मेरा साया साथ होगा, नैनों में बदरा छाए बिजली सी चमके हाय, आपके पहलू में आकर रो दिए, झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में, तुम बिन जीवन कैसे बीता पूछो मेरे दिल से, एक हसीं शाम को दिल मेरा खो गया, अगर मुझसे मुहब्बत है मुझे सब अपने गम दे दो, आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे, वो देखो जला घर किसी का, सपनों में अगर मेरे तुम आओ, आखिरी गीत मुहब्बत का सुना लूं तो चलूं, अरी ओ शोख़ कलियों मुस्कुरा देना वो जब आए और गर्दिश में हैं तारें ना घबड़ाना प्यारे।

दुर्भाग्य से राजा साहब को फिल्मों में वह यश और उतने अवसर नहीं मिले जिनके वे वाक़ई हकदार थे।1966 में उन्होंने दुनिया को तब अलविदा कह दिया जब लोकप्रियता का शिखर उनसे बहुत दूर नहीं था।

राजा मेहंदी अली खान की स्मृतियों को सलाम !

ध्रुव गुप्त :- लेखक पुर्व आईपीएस हैं।