भारत छोड़ो आंदोलन : जिसमें 1857 की क्रांति के बाद सबसे अधिक क्रांतिकारियों का ख़ून बहा…

1857 की क्रांति के बाद अगर भारत में आज़ादी की ख़ातिर किसी आंदोलन में सबसे अधिक क्रांतिकारियों का ख़ून बहा है, तो वो है 1942 का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन जिसे आम तौर पर अगस्त की क्रांति के नाम से जाना जाता है! ये एक एैसा आंदोलन था जो देखते ही देखते मुम्बई के गवालिया टैंक मैदान से निकल कर भारत के सदूर गांव के खेतों तक पहुंच गया।
जिस तरह से 1857 की क्रांति की शुरुआत कई घटनाक्रम की देन थी; ठीक वैसा ही भारत छोड़ो आंदोलन के समय भी हुआ; और उसमे सबसे बड़ी घटना थी द्वितीय विश्वयुद्ध; जिसमें ज़बर्दस्ती भारत को भी शामिल कर दिया गया।
पोलैंड को फ़ासिस्ट ताक़तों से बचाने लिए 1 सितम्बर 1939 को प्रजातंत्र की दुहाई देते हुए इंग्लैंड ने जर्मनी ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान किया और देखते ही देखते इस युद्ध ने द्वितीय विश्वयुद्ध का रूप ले लिया। साथ ही भारत को भी युद्धलिप्त राष्ट्र घोषित कर दिया; भारत के शासन विधान में संशोधन कर दिया जिससे भारत की प्रांतीय सरकारों की शक्ति तथा कार्य की सीमा संकुचित हुई और अधिकार कम हो गया। कांग्रेस ने अपनी कार्यसमिति की बैठक मे 14 सितम्बर 1939  को प्रस्ताव पास करके इसका विरोध किया। अंग्रेज़ों कान में जूं तक नही रेंगी; आख़िर 22 अक्तुबर 1939 को कांग्रेस ने अपनी कार्यसमिति की बैठक मे एक प्रस्ताव पास करके अपने कांग्रेसी मंत्रिमंडलों को इस्तीफ़ा देने का आदेश दिया। इस तरह कांग्रस प्रांतीय सरकार से अलग हो गई। मार्च 1940 में रामगढ़ कांग्रेस ने फिर से भारत की मांग को दुहराया। 1941 में मामला अंग्रेज़ो के लिए उस समय और उलट गया जब सुभाष चंद्र बोस अंग्रेज़ों की नज़र से ओझल हो कर जर्मनी पहुंच कर भारत की आज़ादी के पक्ष में प्रचार करने लगे। इधर जापान ने सफ़लतापूर्वक सिंगापुर, मलाया और बर्मा पर क़ब्ज़ा कर भारत की ओर बढ़ने लगा।
इस कारण द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश सरकार द्वारा अपने लिए भारत का पूर्ण सहयोग प्राप्त करने के नियत से सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स के अध्यक्षता में क्रिप्स मिशन 23 मार्च 1942 को दिल्ली पहुंचा। उनके आगमन पर कांग्रेस के नेतागण ने स्वागत किया। उनके पुरे प्रस्ताव को सुना।
क्रिप्स की पुरी योजना असल स्वारज के नाम पर साम्राज्यवाद थी; जिसमें जो भी था वो आगे के लिए, लड़ाई के बाद, अभी के लिए कुछ भी नही था। गांधी ने इस योजना का विरोध सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स के सामने कुछ इस तरह किया : तुमने एैसे ख़रीते को लाने की नाहक़ तकलीफ़ उठायी और अपना अपमान किया; उल्टे पांव वास जाओ। गांधी ने हरिजन में लिखा – ‘ अभी तक हमारे शासक कहते आये हैं हमलोग ख़ुशी से विदा हो जाएं, अगर जान जायें किसको शासन का भार सौंपना है, उनको अब मेरा कहना है – भारत को भगवान पर छोड़ दो। अगर एैसा करना अखरता हो तो उसे अराजक अवस्था में ही छोड़ जाओ। ‘
भारतीयों के मन में यह बात बैठ गई थी कि क्रिप्स मिशन अंग्रेज़ों की एक चाल थी जो भारतीयों को धोखे में रखने के लिए चली गई थी। इस लिए गांधी ने नारा लगाया, ‘अंग्रेज़ों ! भारत छोड़ दो’,  जो क्रिप्स योजना को माक़ूल जवाब था।
दूसरी ओर युद्ध के कारण तमाम वस्तुओं के दाम बेतहाश बढ़ रहे थे, जिससे अंग्रेज़ सत्ता के ख़िलाफ़ भारतीय जनमानस में असन्तोष व्याप्त होने लगा था। इधर लगातार जापान के बढ़ते हुए प्रभुत्व को देखकर 5 जुलाई, 1942 को गाँधी जी ने हरिजन में लिखा “अंग्रेज़ों! भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ।”
देखते ही देखते ‘अंग्रेज़ों ! भारत छोड़ दो’, जनता का नारा बना गया। 23 जून 1942 को एक विधालय के दीक्षान्त भाषण में महात्मा गांधी ने कहा :- “हिन्दुस्तान में भयंकर ज्वालामुखी फूटेगी! तुम लोग उसके साक्षी रहना और जब वह समीप आ जाय तो उसमें कूद पड़ना”
7 जुलाई को 1942 बम्बई में कांग्रेस का सालाना अधिवेषण हुआ जो दो दिन चला और गाँधीजी ने देश में ‘भारत छोड़़ो आंदोलन’ चलाने की आवश्यकता पर बल दिया। 9 जुलाई को प्रात: काल गांधी सहीत कांग्रेस कार्यसमिति के सभी सदस्य गिरफ़्तार कर लिए गए और फिर गांधी ने नारा दिया ‘करेंगे या मरेंगे’ और देखते ही देखते ये चिंगारी पुरे भारत में फैल गई।
सामाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, जिससे अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया, सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। ज़िला, तहसील, गांव स्तर में नेतृत्व के लिये कोई नेता नहीं बचे; या तो गिरफ़्तार कर लिए गए या भुमिगत हो गए।
हालांकि गांधीजी की ओर से ये आंदोलन अंहिसक था लेकिन अंग्रेज़ों को भगाने के जोश में भारतीय कई जगह उग्र भी हो गए थे, जिसके कारण देश के कई स्थानों पर हिंसा हुई, सरकारी इमारतों को जला दिया गया, बिजली काट दी गई, कई जगहों पर हड़ताल हुई। इतिहासकारों ने लिखा है कि भारतीयों के इस उग्र रूप से अंग्रेज़ काफ़ी बौखला गए थे, जिसके चलते उन्होंने कई जगहों पर निर्दोंषों को गोली मारी तो पूरे देश से करीब एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ़्तार कर लिया। इसके बावजूद आंदोलन पूरे जोश के साथ चलता रहा।

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Md Umar Ashraf

Md. Umar Ashraf is a Delhi based historian, who after pursuing a B.Tech (Civil Engineering) started heritagetimes.in to explore, and bring to the world, the less known historical accounts. Mr. Ashraf has been associated with the museums at Red Fort & National Library as a researcher. With a keen interest in Bihar and Muslim politics, Mr. Ashraf has brought out legacies of people like Hakim Kabeeruddin (in whose honour the government recently issued a stamp). Presently, he is pursuing a Masters from AJK Mass Communication Research Centre, JMI & manages heritagetimes.in.

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