इस बार महज़ जेल नही होगी; बल्के गोली चलेगी, संपत्ति ज़्बत होगी; अब ये सब संभव है!

बंबई से बिहार के प्रतिनिधियों के पहुंचने से पहले ही 9 अगस्त 1942 की सुबह ही सदाक़त आश्रम में कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों की गिरफ़्तारी की ख़बर पहुंच चुकी थी। बिहार में उस समय लोगों को चिंता थी राजेंद्र प्रासाद के स्वस्थ की जो दम्मे से बेदम और ज्वर से जर्जरित सदाक़त आश्रम की चारपाई पर पड़े थे। असल में 7 अगस्त 1942 को कांग्रेस कमिटी की बैठक बंबई में होने वाली थी; जिसमे गांधीजी के ‘भारत छोड़ो’ प्रेस्ताव पर विचार होने वाला था। राजेंद्र प्रासाद को भी इस बैठक में हिस्सा लेने बंबई जाना था। पर बिमारी के कारण नही जा सके और सदाक़त आश्रम में पड़े रहे।

इधर इशारे ही इशारे में राजेंद्र प्रासद ने आंदोलन की गतिविधि कार्यकर्ताओं का बतलाते रहे जिसकी झलक 31 अगस्त 1942 को सदाक़त आश्रम में हुई बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में देखने को मिलती है, जब राजेंद्र प्रासाद ने कहा – ‘इस बार महज़ जेल जाना नही है; इस बार आंदोलन भीषण है, सरकार घोर से घोर दमन करेगी, गोली मारेगी, संपत्ति ज़्बत करेगी; अब ये सब संभव है! इस लिए आंदोलन में शामिल होने वाले कांग्रेसी समझ लें के उनपर हर तरह के ज़ुल्म होने के ख़तरे हैं! और आख़िर अंत में उन्होने कहा – “आइए, हमलोग मिल लें, कौन जाने फिर कौन किससे मिल सकेगा”।

इधर राजेंद्र प्रसाद और कमज़ोर हो गए थे; वो अब सवाल का हां और न में ही जवाब दे रहे थे। उन्होने सदाक़त आश्रम को ही अपना ठेकाना बना लिया था; प्रांत भर से कार्यक्रता उनसे मिलने आते थे। 9 अगस्त, 1942 की सुबह डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट मिस्टर आर्चर सदाक़त अश्रम राजेंद्र प्रासाद को गिरफ़्तार करने पहुंचे। गिरफ़्तारी से पहले आर्चर ने उनसे उनके स्वास्थ का हाल चाल लिया और उनके कार्यक्रम के बारे में पूछा? राजेंद्र प्रसाद को बीमार देख कर मेजिस्ट्रेट आर्चर ने सरकार से पूछा कि एैसे हालत में क्या किया जाये ? हुकुम आया के सिविल सर्जन को दिखाया जाए और पूछो कि वहां से दूर ले जाने के योग्य हैं या नहीं। मेजिस्ट्रेट आर्चर ख़ुद सिविल सर्जन को लेकर आया। सिविल सर्जन ने कहा के राजेंद्र प्रसाद सफ़र करने के लायक़ नही हैं, इस लिए राजेंद्र प्रसाद को गिरफ़्तार कर के दिन के 11-12 बजे के बीच बांकीपुर जेल ले जाया गया। राजेंद्र प्रासद के जेल पहुंचने से पहले ही उनके गिरफ़्तारी की ख़बर सारे शहर में फैल गयी। इस गिरफ़्तारी के विरोध में कुछ विद्यार्थी अशोकराज पथ पर “हिन्दुस्तान आज़ाद करो” और “दुकानें बंद करो” आदि नारों के साथ, पटना कॉलेज, सांयस कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज में जमा हुए। धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी और थोड़ी ही देर में पटना विश्वविधालय, पुस्तकालय के आहते में लगभग 1000 लोग जमा हो गए।

सुरजदेव की अध्यक्षता में एक सभा हुई, जिसमें छात्रों से पढ़ाई छोड़ कर आंदोलन में हिस्सा लेने की अपील की गई। वकीलों से वकालत छोड़ कांग्रेस के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने; सरकारी कर्मचारीयों/पुलिस से नौकरी छोड़ आंदोलन में भाग लेने की अपील की गई। साथ ही दुकानदारों से अगले दिन दुकान बंद रखने की अपील की गई। इसी रोज़ हज़ारो की संख्या में शाम 6 बजे विद्यार्थियों का दूसरा जुलूस बांकीपुर जेल नारा लगाते हुए पहुंचा। फिर जुलूस ने हार्डिंग रोड की तरफ़ कूच किया; जहां उन्हे रोकने के लिए पुलिस उपाधीक्षक एवं दंडाधिकारी के साथ सश्स्त्र गोरखा पुलिस दल तैनात किया गया।


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Md Umar Ashraf

Md. Umar Ashraf is a Delhi based historian, who after pursuing a B.Tech (Civil Engineering) started heritagetimes.in to explore, and bring to the world, the less known historical accounts. Mr. Ashraf has been associated with the museums at Red Fort & National Library as a researcher. With a keen interest in Bihar and Muslim politics, Mr. Ashraf has brought out legacies of people like Hakim Kabeeruddin (in whose honour the government recently issued a stamp). Presently, he is pursuing a Masters from AJK Mass Communication Research Centre, JMI & manages heritagetimes.in.

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