Md Umar Ashraf

बाबु कुंवर सिंह अपने सबसे ख़ास सिपहसालार काको (जहानाबाद) के शहीद काज़ी ज़ुल्फ़िक़ार अली ख़ां को कैथी लिपी मे ख़त भेजते हैं; जिसे जसवंत सिंह ने लिख था को तशरीह (ट्रांसलेट – एलाब्रेट) करने के बाद मै इस नतीजे पर पहुंचता हुं :-

प्रिये ज़ुल्फ़िक़ार,

अब समय आ चुका है, मेरठ की जानिब कूच करो, जहां तुम्हारा इंतज़ार हो रहा है, सारे काम मुकम्मल कर लिए गए हैं. तुम होशियार भी हो और तुम्हे अपने काम में महारत भी हासिल है. हमारी फ़ौज भी तैयार है, और हमलोग यहीं से शुरुआत करेंगे और तुम वहां (मेरठ) से.. अंग्रेज़ी फ़ौज की तादाद कम है.. और आख़िर में तुम्हारे जवाब का मुंतज़िर ….

कुंवर सिंह

ख़त मिलते ही ज़ुल्फ़िक़ार अली ख़ां ने अपने कमांडर (कुंवर सिंह) के क़ौल पर लब्बैक कहा और मैदान ए जंग मे कूद पड़े.. इन्होने नगवां गाँव में राजपूत रेजिमेंट का गठन किया.. जहानाबाद ज़िले के इस रेजिमेंट ने मेरठ, गाज़ीपुर, बलिया जैसी जगहों पर छापामार युद्ध (गोरिल्ला वार) कर के अंग्रेज़ों को ख़ूब छकाया; और आख़िर आजमगढ़ में अंग्रेज़ी फ़ौज के साथ हुए आमने सामने के जंग में ज़ुल्फ़िक़ार अली ख़ां अपने कई बहादुर साथीयों के साथ शहीद हुए।