बात 1901 की है जब ख़िलाफ़त-ए-उस्मानिया के ख़लीफ़ा सुल्तान अब्दुल हमीद II से यहूदी रियासत के क़याम के लिए कुछ क़द्दावर यहुदी नेता द्वरा मदद माँगी गई और इसके लिए उन्होने उस्मानी सुल्तनत को कुछ ऑफ़र दिए जिसमे कुछ है :-

1) उस्मानी सुल्तनत की तमाम क़र्ज़ की अदाएगी की जाएगी। साथ ही
2) उस्मानी सुल्तनत के लिए नौसेना बनाई जाएगी। इसके इलावा
3) 35 मीलियन सोने की अशरफ़ी बिना किसी सुद के उस्मानी सुल्तनत को ख़िलाफ़त की हिफ़ाज़त के लिए दी जाएगी।

जिसके बदले में उन्होने
1) यहुदीयों के लिए फ़लस्तीन में कभी भी दाख़िल होने के इजाज़त की मांग की; और साथ ही जितना दिन चाहें वो वहां क़्याम कर “मज़हबी जगहों” की ज़ियारत कर सकें। इसके इलावा उन्हे
2) यहुदीयों को धर्मशाला बनाने की इजाज़त दी जाए जहां वो रह सके और वो धर्मशाला क़ुदुस (येरुशलम) के नज़दीक हो।

पहले सुल्तान अब्दुल हमीद II ने तो उनसे मिलने से ही इंकार कर दिया और अपने वज़ीर तहसीन पाशा से ये कहलवा भेजा :- इन यहूदीयों से कह दो के उस्मानी सलतनत पर जो क़र्ज़ है वो किसी बेग़ैरती की अलामत नही है, क़र्ज़ तो फ़्रांस पर भी है, और इससे किसी को कोई फ़र्क़ नही पड़ने वाला है।

क़ुदुस (येरुशलम) ख़लीफ़ा हज़रत उमर फ़ारुक़ (र.अ.) के दौर में ही ख़िलाफ़त का हिस्सा बना था और मै इस पाक सरज़मीन का यहुदीयों के साथ सौदा कर कोई तरीख़ी ग़लती करने नही जा रहा जिससे मेरी और मेरे अवाम का सर नीचा हो। ये उम्मत दुशमन के पैसे से बने हुए क़िले मे नही छुपेगी। तुम अपनी दौलत अपने पास रखो और फिर कभी इस तरह के बकवास सोंच को लेकर वापस मत आना।

पर ये लोग कहां मानने वाले थे। इसी साला 1901 मे ज़ियोनिस्ट तहरीक का सरबराह Theodor Hertzl इस्तांबुल पहुंचा और सुल्तान से मिलना चाहा तो सुल्तान अब्दुल हमीद II ने फिर मिलने से इंकार कर दिया और उन्होने अपने मंत्रीमंडल से  ये कहके साफ़ इनकार कर दिया कि :- आप डॉ Hertzl को समझा दें के वो अपने प्रेजेक्ट को आगे ले जाने की ग़लती ना करें; “मै सरज़मीन ए फ़लस्तीन का एक इंच भी यहुदयों को नही दुंगा क्योंके फ़लस्तीन मेरा नही; बल्के उम्मत की अमानत है और उम्मत ने इस पाक सरज़मीन की हिफ़ाज़त के लिए अपना ख़ुन बहाया है” यहुदी अपनी दौलत अपने पास रखें; अगर कल उस्मानी सलतनत और ख़िलाफ़त ख़त्म हो जाए तब वो फ़लस्तीन बिना किसी ख़र्च के ले सकते हैं! पर जब तक मै ज़िन्दा हुं, मै इस सरज़मीन पर आंच नही आने दुंगा; मै इस पाक सरज़मीन फ़लस्तीन को इस्लामी ख़िलाफ़त से कटते हुए देखने से पहले अपने सीने में ख़ंजर उतारना पसंद करुंगा। भला कोई ज़िन्दा इंसान ख़ुद के बदन को काटता है ? इस लिए सरज़मीन ए फ़लस्तीन भी ख़िलाफ़त से नही कटेगा।

पर हुआ क्या ? पहली जंग ए अज़ीम में जहां शरीफ़ मक्का ने उस्मानी ख़िलाफ़त से छीन कर मक्का और मदीना जैसी मज़हबी जगह को इंगलैंड की झोली में डाल दिया; वहीं सरज़मीन ए फ़लस्तीन और ख़ास कर मस्जिद ए अक़्सा को हिन्दुस्तान के मुस्लिम सिपाहीयों ने इंगलैंड की झोली में डाल दिया जो मल्का विक्टोरिया की दफ़ा और विक्टोरिया क्रॉस के लिए लड़ रहे थे। बाक़ी इक़बाल ने कहा था :- एक हों मुस्लिम हरम की पासबानी के लिए… हो गए एक; कर दिया धुआं धुआं।

बैतुल मोक़द्दस मे वाक़ए मस्जिदे अक़्सा जो के क़िबले अौवल है और ये हरम शरीफ़(मक्का) और मस्जिद नबवी(मदीना) जैसी इज़्ज़त का हक़दार है; इस जगह की भी मुसलमानो को ज़ियारत करनी चाहीए ख़ास कर हिन्दुस्तान के मुसलमानो को क्योंके इस सरज़मीन से उनका हर तरह का लगाव रहा है. बाब फ़रीद गंजशकर (ऱ.अ.) हों या फिर मौलाना जौहर

वैसे हिन्दुस्तान की जंग ए आज़ादी के अज़ीम रहनुमा और तहरीक ए ख़िलाफ़त के अहम स्तुन, बी अम्मा के जांनशीं मौलाना मोहम्मद अली जौहर का क़बर मस्जिद ए अक़सा (बैतुल मुक़द्दस) के आहते मे है , मौलाना मोहम्मद अली जौहर एकलौते गैर-अरब हैं जिन्हे मस्जिद ए अक़सा के आहते मे दफ़नाया गया है. (जिसपर यहुदियों ने क़ब्ज़ा कर रखा है)

मौलाना मोहम्मद अली जौहर मस्जिद ए अक़सा (बैतुल मुक़द्दस) के आहते मे दफ़नाने का एक मक़सद था के किसी भी तरह हिन्दुस्तान के मुसलमान को बैतुल मुक़द्दस से जोड़ा जाए वो भी मज़हबी एतबार से , जिस तरह वो मक्का व मदीना से मुहब्बत करते हैं वैसा ही क़ुदुस (येरुशलम) से करने लगे.

मस्जिद ए अक़्सा जो के क़िबला ए अौव्वल है; मुसलमानों की शान है, इसकी हिफ़ाज़त तमाम मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है 🙂 ना करबो ता हिसाब देबो