Md Umar Ashraf

जिस प्रकार भारतीय मिथकों के अनुसार आत्मा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है ठीक उसी प्रकार किसी भी नेता की राजनीति का लक्ष्य सांसद बन प्रधानमंत्री पद को पा जाना है। इसमें ये क़तई मायने नहीं रखता कि आप किस रास्ते से चल कर लक्ष्य तक पहुंच रहे हैं। बल्कि रीत तो यही है कि जिसको एक बार मोक्ष की प्राप्ति हो गयी सब उसके पीछे पीछे उसकी राह पकड़ लेते हैं, इस उम्मीद में कि यही से चल कर वे भी मोक्ष तक पहुंच ही जायेंगे।

भारतीय राजनीति के परिपेक्ष में देखा जाए तो आप देखेंगे कि किस प्रकार महात्मा गाँधी की सफलता से प्रभावित हो आजतक अनेकों नेता उनकी राह पर चलने की कोशिश करते हैं। हद तो ये है कि दुनियाभर में बंदूक से क्रांति लाने वाले लाल झंडाधारी जेएनयू तक आते आते भूख-हड़ताल करने लगते हैं। वर्तमान में देखा जाए तो प्रधानमंत्री मोदी भी राजनीति के चरम पर हैं तो ज़ाहिर है कि उनकी भी राह पर बहुत लोग चलेंगे।

ऐसे देखा जाए तो बहुत से युवा मोदीजी से प्रभावित हैं और उनके दिखाए रास्ते पर चलना चाहते हैं लेकिन अगर मेरी मानी जाए तो पिछले पांच वर्षों में अगर किसी युवा ने सही मायनों में नरेंद्र मोदी का सच्चा उत्तराधिकारी होने का दावा पेश किया है तो वो जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष और सीपीआई के नेता कन्हैय्या कुमार हैं।

आप लोगों को पहली नज़र में ये अजीब तो लगेगा परंतु सच यही है। कन्हैय्या जैसा मोदी का परम भक्त मिलना मुश्किल ही है। यदि मोदीजी द्रोणाचार्य होते तो कन्हैय्या ही उनके अर्जुन कहलाते। चलिए एक बार नज़र डालते हैं दोनों के बीच की समानताओं में :

मेरे पास माँ है

1970 के दशक की फ़िल्म दीवार में शशि कपूर द्वारा अमिताभ बच्चन को बोला गया ये डायलाग तो याद होगा ही। मोदीजी भारत के पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने ये समझा कि माँ की भारतीय समाज में महत्ता क्या है। जब माँ फ़िल्म हिट करा सकती है तो चुनाव भी जिता सकती है। मोदीजी को जब कोई मुश्किल पेश आती थी वे दुनिया के सामने अपनी माँ को ले आते। टीवी पर एंकर चिल्ला चिल्ला कर बताते कि मोदीजी की माँ आज भी कितनी ग़रीबी के दिन बिताती हैं। कोई भी मुसीबत आन पड़े माँ से मुलाक़ात करने जाते और ये टीवी पर लाइव दिखाया जाता।

कन्हैया समझ गए कि अगर भारतीय जनता में राजनीति की फ़िल्म हिट करनी है तो माँ का दामन पकड़ना ही पड़ेगा। अब देखिये आप ही कि किस प्रकार मीडिया पर हर कोई ये दिखा रहा है कि कन्हैया की माँ कितनी ग़रीब हैं और वो आपस में मिलते भी हैं। इस तरह मोदीजी के बाद कन्हैया देश के दूसरे ऐसे नेता हैं जिसकी माँ है और ग़रीब भी है। वरना कभी सुना था आपने कि लालू की, मुलायम की, नेहरू की, मायावती की या किसी और नेता की माँ हो और अगर हो तो ग़रीब भी हो।

धन्य है ऐसा मोदीजी का शिष्य।

कांग्रेस मुक्त भारत बनाम संघ से आज़ादी

याद कीजिये 2014 के आम चुनाव के पहले के मोदीजी के भाषण। उनका पूरा चुनाव प्रचार नकारात्मक था। उनकी राजनीति ये थी कि भारत को ‘कांग्रेस मुक्त’ बनाना है। आप उनसे कोई भी समस्या का समाधान मांगते थे तो जवाब मिलता था कि समस्या बस कांग्रेस है एक बार कांग्रेस गयी तो देश में सब ख़ुशहाल होंगे। इसके अलावा न तो उनके पास कोई हल था न जनता ने ही उनसे पूछा।

अब देखिये कन्हैया को। उन्होंने देश को नारा दिया संघवाद से आज़ादी। उनके किसी भी भाषण को ग़ौर से देखिये वे संघ परिवार से भारत को आज़ाद चाहते हैं। अच्छा है पर इसके अलावा क्या ? जब संघ बरबाद हो जायेगा तब क्या ? क्या देश खुशहाल हो जायेगा ? क्या लोगों को पेटभर रोटी मिलेगी ? क्या दंगे बंद होंगे ? पर ये सब सवाल कौन करे ?

ये नकारात्मक चुनाव प्रचार है। ये समाधान की बात नहीं करते क्योंकि ये जानते हैं कि समाधान देना ज़रूरी नहीं।

भाषण की दुनिया के बेताज बादशाह

चाहे आप मोदी समर्थक हों या आप मोदी विरोधी हों, इस बात से शायद ही आप को इंकार होगा कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने में सबसे अहम भूमिका उनकी भाषण देने की कला ने निभाई है। 2014 से पहले भी और आज भी जब वे बोलते हैं तो जनता मंत्रमुग्ध हो उठती है और बिना सवाल के भाजपा को वोट दे आती है। इसमें शायद ही किसी को शक हो कि आज भाजपा के अधिकतर वोट मोदी के नाम पर पड़ते हैं। लोग जो आमतौर पर भाजपा को वोट नहीं देते वे भी मोदी के भाषण सुन उनको वोट देते हैं।

कन्हैया क्या हैं ? उनके समर्थक भी आपसे यही कह रहे हैं कि देखो अच्छा बोलता है। कोई ये नहीं बताता कि काम क्या किया है। चलिए ये ही कोई बता दे कि जब वे जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष थे तो उन्होंने कौन कौन से वादे पूरे किये थे।

यहां ये जान लेना भी ज़रूरी है कि वे भी मोदीजी की तरह ही अच्छे भाषण और ऐसे वादे कर अध्यक्ष बने थे जो कभी पूरे नहीं किये गए। जैसे ही छात्रों ने पूछा वो वादा कि लिंगदोह हटवा देंगे क्या हुआ तो एकदम से याद आया कि संघ नाम के बाहरी दुश्मन ने जेएनयू पर हमला कर दिया है जिसकी मदद जेएनयू के अंदर से कुछ ग़द्दार कर रहे हैं। लोग वादा भूल नए लक्ष्य की ओर मुड़ गए। अगर आपको ये किस्सा भी मोदीजी से मिलता जुलता लगता है तो इसमें मेरी ग़लती नहीं है।