मौलवी ख़ुर्शीद हसनैन उन चुनिंदा लोगों में हैं जिन्होने अपने परिवार के विरुद्ध जा कर अंग्रेज़ों की मुख़ालफ़त की, मौलवी ख़ुर्शीद हसनैन की पैदाइश सन 1878 में उस समय के गया ज़िला और मौजूदा जहानाबाद के पाली गाँव के एक मुहज़्ज़ब ख़ानदान में हुआ था, ख़ुर्शीद हसनैन के वालिद का नाम मौलवी सय्यद यह्या हुसैन था, वकालत करते थे, ख़ानदान के लोग अच्छे ओहदे पर थे, सैयद ख़ैरात अहमद जैसे लोग आपके मामू थे, और सर सुल्तान अहमद रिश्ते में बहनोई.

शुरुआती तालीम घर पर ही हुई, 1908 में बी.ए. मुकम्मल किया, उसी साल अमरिका जा कर पढ़ाई करने के लिए वज़ीफ़ा भी मिला, पर वालिद के कहने पर वकालत में दाख़ला लिया, वकालत की पढ़ाई मुकम्मल करने के बाद दो साल भागलपुर में वकालत की, इसी दौरान अली इमाम ने राजेंद्र प्रसाद से मुलाक़ात करवाई, भागलपुर में अली इमाम की अध्यक्षता में हुवे पहले बिहार प्रांतीय सम्मलेन में हिस्सा लिया, जिसमे अलग बिहार राज्य की मांग की गई. उसके बाद 1911 में कलकत्ता हाई कोर्ट में वकालत शुरू की, और 1915 तक वहीं रहे, जब 1916 में बिहार को अपना हाई कोर्ट मिला तब वकालत करने पटना आ गए, और देखते ही देखते वकालत की दुनिया में छा गए.

Reminiscences of the Patna High Court के लेखक धयान चंद्र ने अपने निजी तजुर्बे का ज़िक्र करते हुवे लिखा है के ख़ुर्शीद हसनैन की ज़ुबान बहुत साफ़ थी, और वो अपनी बात बहुत की तार्किक रूप में रखते थे. अंग्रेज़ी ज़ुबान पर उन्हें उबूर हासिल था, अपने तर्क से वो सामने वाले को उस समय भी राज़ी कर लिया करते थे जब उनकी दलील कमज़ोर हुआ करती थी, इस मामले में उनका कोई सानी नहीं था.

Passport of Maulvi Khursheed Hasnain

वो आगे लिखते हैं ख़ुर्शीद हसनैन पूरी तरह से सिविल मामलों में ही वकालत करते थे, ख़ुर्शीद हसनैन की वकालत के जौहर का अंदाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं जब हसन इमाम, एनसी सिन्हा और एस एम मालिक जैसे वकील एक जानिब से केस लड़ रहे होते हैं, तब दूसरी जानिब से ख़ुर्शीद हसनैन ख़ुद होते हैं.

ख़ुर्शीद हसनैन के पोते नियाज़ काज़मी बताते हैं के उन्हें विलायती सामान और रहन सहन से बहुत नफ़रत थी. यहाँ तक के वो एलोपैथ दवा का इस्तेमाल भी नहीं किया करते थे. इस चीज़ का ज़िक्र धयान चंद्र ने अपनी किताब में भी की है, उनके अनुसार वो एक राष्ट्रवादी इंसान थे, जो गाँधीजी से बहुत मुतास्सिर थे. उन्होंने हाई कोर्ट बार कौंसिल के उस प्रस्ताव का जम कर विरोध किया जिसमे वकीलों को बैरिस्टर की तरह कॉलर, बैंड और गाउन पहनने की मांग की गई. इस बात का ज़िक्र करते हुवे ख़ुर्शीद हसनैन के पोते नियाज़ काज़मी कहते हैं के कॉलर, बैंड और गाउन का विरोध करने के लिए वो क़ुरान शरीफ़ को अपने गले में टांग कर कोर्ट जाया करते थे. यहाँ तक के उन्होंने पटना हाई कोर्ट के रिटायर हुवे आई.सी.एस जजों को मिलने वाली फ़ेयरवेल पार्टी और समारोह का विरोध किया. जिसको ले कर उनके काफ़ी लोगों से तकरार भी हुवे.

सन 1922 में बक्सर जेल से लिखी अपनी डायरी में ख़ुर्शीद हसनैन लिखते हैं के उनपर सबसे अधिक मौलाना मुहम्मद रज़ा की तक़रीर का असर हुआ जो उन्होंने मजलिस में दी थी, जिसके बाद उन्होंने हर विदेशी चीज़ से परहेज़ करना शुरू कर दिया, यहाँ तक के अपने बेटे आले हसन का नाम भी अंग्रेज़ी स्कूल से हटवा दिया.

Dairy of Maulvi Khursheed Hasnain

उनकी ख़ूबियों का ज़िक्र करते हुवे धयान चंद्र अपनी किताब में लिखते हैं, सामन्य क़द के ख़ुर्शीद हसनैन उस समय के आम वकीलों से हट, दाढ़ी रखा करते थे. वो काले रंग के खद्दर का कपड़ा और काली टोपी पहन कर ही कोर्ट आया करते थे.वो बहुत ही उसूल प्रस्त और मेहनती इंसान थे, उनमें सबर करने की भरपूर छमता थी. ख़ुर्शीद हसनैन की शख़्सयत एक इज़्ज़तदार बुज़ुर्ग की तरह थी. उनके साथ जूनियर वकीलों की एक बड़ी भीड़ हुआ करती थी, जो ख़ुर्शीद हसनैन के वकालत के काम में ना सिर्फ़ हाथ बटाते थे, साथ ही उनके तजुर्बे से फ़ैज़याब भी हुआ करते थे, जूनियर वकीलों में बड़ी संख्या में उनके रिश्तेदार भी थे.

के के दत्ता ने अपनी किताब History of the freedom movement in Bihar में लिखा है 6 अप्रैल 1919 को रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ पटना में हड़ताल होना था, जिसको लेकर 4 अप्रैल की शाम मज़हरुल हक़ की अध्यक्षता में पटना सिटी के क़िला में मीटिंग हुई, इस मीटिंग में ख़ुर्शीद हसनैन ख़ुद भी मौजूद थे, इस मीटिंग में हिन्दु मुस्लिम एकता पर ज़ोर दिया गया. अगले रोज़ 5 अप्रैल को पीएन सिन्हा की अध्यक्षता में मज़हरुल हक़ के आवास सिकंदर मंज़िल में एक मीटिंग और हुई, ख़ुर्शीद हसनैन यहाँ भी मौजूद थे.

6 अप्रैल 1919 को रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ पटना में ज़बरदस्त हड़ताल हुआ, हिंदु मुस्लिम एकता की बेहतरीन झलक थी, दुकानदार, से लेकर किसान तक ने हड़ताल में हिस्सा लिया, जानवरों को भी छुट्टी दे दी गई. बैल और घोड़े को सवारी के लिये उपयोग नहीं किया गया. क़िला मैदान में हसन इमाम की अध्यक्षता में एक बड़ा जुलुस जामा हुआ, यहाँ तमाम बड़े नेताओं ने ख़िताब किया, यहाँ ख़ुर्शीद हसनैन की कही बात ने लोगों का दिल जीत लिया.

Maulvi Khursheed Hasnain

रॉलेट एक्ट का विरोध करने पर पुरे भारत में हिंदुस्तानी अवाम को अंग्रेज़ी ज़ुल्म का सामना करना पड़ा, पर इसी ज़ुल्म ने उन्हें और हौसला दिया, ख़िलाफ़त और असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई. 24 नवंबर 1919 को गाँधीजी की अध्यक्षता में ख़िलाफ़त कमेटी की मीटिंग हुई. ख़ुर्शीद हसनैन की कोशिश की वजह कर 30 नवंबर 1919 को पटना के इतिहासिक अंजुमन इस्लामिया हॉल में एक मीटिंग हुई, जिसमे हिन्दु मुस्लिम एकता पर ज़ोर दिया गया, साथ ही लोगों को आंदोलन में जोड़ने पर ज़ोर दिया गया.

19 मार्च 1920 मोहम्मद समी के साथ मिल कर ख़ुर्शीद हसनैन पटना में ज़बरदस्त हड़ताल करवाया. 15-16 मई 1920 को पटना के फुलवारी में मौलाना आज़ाद सुब्हानी के साथ मिल कर ख़ुर्शीद हसनैन ने कई सफ़ल सम्मलेन करवाया. 5 जून 1920 को ख़्वाजा अब्दुल मजीद, सय्यद महमूद, मोहम्मद समी के साथ मिल कर ख़ुर्शीद हसनैन ने बांकीपुर मैदान में एक बड़ा ही शानदार जलसा करवाया, बाक़रगंज मस्जिद के 19 साल के पेश इमाम मौलवी इत्माद हुसैन ने जलसा की क़यादत की.

1 नवंबर 1921 को अली भाइयों को दो साल क़ैद ब मशक़्क़त की सज़ा सुनाई गई, अदालत के इस फ़ैसले ने आग में घी डालने का काम किया, 1921 में कांग्रेस का सालाना अधिवेशन हकीम अजमल ख़ान की अध्यक्षता में दिल्ली में हुआ, बिहार से ख़ुर्शीद हसनैन भी इसमें शामिल हुवे, कांग्रेस के इस अधिवेशन में हर राज्य के नुमाइंदे को अपने इलाक़े में सिविल नाफ़रमानी को बढ़ाने का प्रस्तवा पारित किया गया. ख़ुर्शीद हसनैन दिल्ली से लखनऊ होते हुवे लौटे, लखनऊ में कई बड़े उल्मा के साथ मीटिंग की, फिर पटना आ कर बिहार क़ौमी सेवक दल की बुनियाद डालने में अहम् रोल अदा किया और ख़ुद भी उसमें शामिल हो गए.

22 दिसंबर 1921 को ‘प्रिंस ऑफ़ वेल्स’ को पटना आना था, इस दिन पुरे बिहार में हड़ताल करने का प्रस्ताव 27 नवंबर 1921 को पटना में हुवे बिहार प्रांतीय कांग्रेस सम्मलेन में पास हुआ, इस सम्मलेन ख़ुर्शीद हसनैन भी मौजूद थे. ज्ञात रहे के 17 नवंबर 1921 को ‘प्रिंस ऑफ़ वेल्स’ का हिंदुस्तान आना हुआ, वो मुंबई में उतरे, इस दिन मुंबई से लेकर पटना तक सफ़ल हड़ताल का आयोजन किया गया. पटना में हड़ताल को सफ़ल बनाने में ख़ुर्शीद हसनैन का बड़ा हाथ था, उनकी कोशिश की वजह कर धोबी ने विलायती कपड़े धोने से इंकार कर दिया, टांगे वालो ने उन लोगों को बैठाने से मना कर दिया जिन्होंने विलायती सामान को अपने बदन पर डाल रखा था. सरकारी नौकरी करने वालों से नौकरी छोड़ने की गुज़ारिश की गई, देखते ही देखते नवंबर के महीने में ही दो दरोग़ा, चार जमादार, दस हवालदार ने नौकरी छोड़ दी, दर्जनों स्कूल के मास्टर और किरानी ने स्कूल छोड़ असहयोग आंदोलन में भाग लेना शुरू किया.

देखते ही देखते ‘प्रिंस ऑफ़ वेल्स’ के विरोध में पुरे बिहार में आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया, कांग्रेस सहित तमाम दल में कार्यकर्ता की संख्या बढ़ने लगी, तब सरकार के होश उड़ गए. आनन फ़ानन में बिहार व उड़ीसा सरकार के मुख्य सचिव इ.एल.एल. हम्माण्ड ने 9 दिसंबर 1921 को बिहार के सभी ज़िलें के कलेक्टर को सर्कुलर जारी कर मौजूदा हालात की समीक्षा कर रिपोर्ट पेश करने को कहा, रिपोर्ट पेश होता उससे पहले ही कार्रवाई शुरू हो गई.

19 दिसंबर 1921 को बिहार सरकार ने ख़िलाफ़त, कांग्रेस, सेवादल और असहयोग कमेटी से जुड़े स्वयंसेवकों और उनकी संस्था को भारतीय क़ानून संहिता के सेक्शन-16 के तहत ग़ैरक़ानूनी घोषित कर दिया. जिसके बाद बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारी शुरू हुई, लाला लाजपत राय, मौलाना आज़ाद के साथ पटना से ख़ुर्शीद हसनैन भी गिरफ़्तार कर लिये गए, उन्हें बांकीपुर सेंट्रल जेल में डाल दिया गया. जेल में पोलिटिकल क़ैदी होने के बाद भी ख़ुर्शीद हसनैन पर काफ़ी ज़ुल्म होता रहा, ज़ुल्म की दास्तां को ख़ुर्शीद हसनैन ने बांकीपुर सेंट्रल जेल से ख़त की शकल में लिखा, जो प्रेस के सामने 12 जनवरी 1922 को पेश हुआ.

ख़ुर्शीद हसनैन ने अपनी किताब में लिखा के 13 दिसंबर 1921 को उन्हें गिरफ़्तार कर बांकीपुर सेंट्रल जेल में डाल दिया गया, और उनसे कहा गया के अगर उन्होंने ख़ुद को क़ौमी सेवक दल से अलग कर लिया तो उन्हें रिहा कर दिया जाएगा, इस बात ज़िक्र करते हुवे ख़ुर्शीद हसनैन के पोते नियाज़ काज़मी कहते हैं 13 दिसम्बर 1921 को ख़ुर्शीद हसनैन देशद्रोह मामले में गिरफ़्तार कर जेल भेज दिये गए और उस समय उनके बहनोई सर सुल्तान अहमद कौनसिल के मेंबर, और एक आला दर्जे के वकील थे, इसी बीच 22 दिसम्बर 1921 को प्रिंस ऑफ़ वेल्स पटना आने वाले थे, ये सर सुल्तान की इज़्ज़त का सवाल था, के तरफ़ उनके साले ख़ुर्शीद हसनैन देशद्रोह मामले में जेल कि सलाख़ों के पीछे थे और दूसरी जानिब उन्हें ख़ुद प्रिंस ऑफ़ वेल्स का पटना में इस्तक़बाल करना था.

इसी पशोपेश में वो अपने साले ख़ुर्शीद हसनैन से मिलने बांकीपुर सेंट्रल जेल गए, पर ख़ुर्शीद हसनैन ने उनसे सिर्फ़ इसलिए मिलने से इंकार कर दिया; क्योंकि सर सुल्तान अहमद ने पतलून पहन रखा था. आनन फ़नन में दर्ज़ी बुला कर खद्दर के कुर्ते पाजामे सिलवाये गए, तब सर सुल्तान कि मुलाक़ात अपने साले ख़ुर्शीद हसनैन से हो पाई… पर ख़ुर्शीद हसनैन के तेवर कहाँ कम होने वाले थे, उन्होंने सरकार के सामने झुकने से इंकार कर दिया,

हद है पस्ती की, के पस्ती को बुलंदी जाना
अब भी एहसास हो इसका तो उभरना है यही.

ख़ुर्शीद हसनैन ने अपनी किताब में लिखते हैं के उन्हें मेजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, एक कामयाब वकील होने के बाद भी उन्होंने अपनी तरफ़ से कोई सफ़ाई नहीं दी, क्योंकि उन्हें नतीजा मालूम था, इसलिए उन्होंने जज के सामने एक शेर पढ़ा :-

क़रीब है यार रोज़ ए महशर,
छुपेगा कुश्तों का ख़ून क्यूँ कर
जो चुप रहेगी ज़ुबान खंजर,
लहू पुकारेगा आस्तीं का…

आख़िर 9 जनवरी 1922 को उन्हें 6 माह क़ैद बा मुशक़्क़त की सज़ा सुनाई गई, फिर बक्सर जेल भेज दिये गए. 11 मार्च 1922 को गाँधीजी के गिरफ़्तार होने की ख़बर पटना पहुंची, 14 मार्च पटना सहित पुरे बिहार में ज़बरदस्त हड़ताल का नज़ारा देखने को मिला, इसमें ख़ुर्शीद हसनैन सहित तमाम सियासी क़ैदी की रिहाई की मांग की गई. 28 मार्च को 1922 को ख़ुर्शीद हसनैन सहित तमाम सियासी क़ैदी के रिहाई की कोशिश को लेकर एक बड़ा सम्मलेन हुआ, जिसमे असम्ब्ली के कई मेम्बर भी शरीक हुए, जो आंदोलन की एक बड़ी कामयाबी थी. तीन माह जेल में रहने के बाद ख़ुर्शीद हसनैन को 29 मार्च 1922 को आज़ादी की सांस नसीब हुई, पर ये सिर्फ़ जेल से आज़ादी थी, मुल्क अभी ग़ुलाम था. बाहर आये, और मुल्क को आज़ाद कराने में सरगर्म हो गए, जलयांवाला बाग़ क़त्ल ए आम के 3 साल होने के मौक़े पर 13 अप्रैल 1922 को एक बार फिर से कामयाब हड़ताल का नज़ारा दिखा, इसे कामयाब बनाने में ख़ुर्शीद हसनैन ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.

15 अगस्त 1922 को ख़िलाफ़त और असहयोग कमेटी की टॉप लीडरशिप कोलकाता से पटना पहुंची, जिनके इस्तक़बाल के लिये बैरिस्टर मोहम्मद यूनुस और ख़ुर्शीद हसनैन सैंकड़ों लोगों के साथ पटना रेलवे स्टेशन पहुंचे. पटना आने वालों में विठ्ठलभाई पटेल, मोतीलाल नेहरू, हकीम अजमल ख़ान और मुख़्तार अहमद अंसारी का नाम प्रमुख है, इन्हे बैरिस्टर मोहम्मद यूनुस के आवास पर ठहराया गया, इनके इस्तक़बाल में पूरे पटना को दुल्हन की तरह सजा दिया गया था.

अक्तुबर 1923 में हुवे मुंसिपल चुनाव में ख़ुर्शीद हसनैन ने कांग्रेस की जानिब से हिस्सा लिया. 1 दिसंबर 1923 को पटना ज़िला कांग्रेस कमेटी का इजलास हुआ, जिसमे ख़ुर्शीद हसनैन को अध्यक्ष, और अनुग्रह नारायण सिन्हा को उपाध्यक्ष चूना गया. 1924 में बिहार राज्य कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष मज़हरुल हक़ को चुना गया, राजेंद्र प्रसाद सचिव तो ख़ुर्शीद हसनैन को ख़ज़ांची चुना गया.

5 फ़रवरी 1924 को गांधीजी जेल से रिहा कर दिये गए, जिस ख़ुशी में पटना में कई जगह आयोजन हुआ, 10 फ़रवरी को पटना में हुवे एक आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप ख़ुर्शीद हसनैन शामिल हुवे और उन्होने एक इंक़लाबी तक़रीर भी दी.

जारी…. (लेखक मौलवी ख़ुर्शीद हसनैन पर रिसर्च कर रहे हैं)