अब्दुर रशीद इब्राहिमी

मौलाना अहमद शाह शहीद एक ऐसा नाम है, जिसके जौहर का चिना पत्तम, देहली, आगरा, अवध, रोहिल खण्ड की सर ज़मीन गवाह है।

अगर मौलाना को 1857 के शहीदों का सरदार कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा।

शहीद टीपू सुल्तान के अज़ीज़ों में से थे नवाब अली, मौलाना अहमद शाह उनके फ़रज़ंद थे, जब छोटे थे तो ज़ियाउद्दीन के नाम से जाने जाते फिर जवानी में दिलावर जंग और 60 साल के बाद दुनिया उन्हें मौलाना अहमद उल्लाह शाह के नाम से जानने लगी।

सुल्तान टीपू के शाहदत के क़िस्से सुन सुन कर जवान हुए थे, इसलिए माल व दौलत से कोई लगाव नही था। घुम्मकड़ क़िस्म के इंसान थे, हैदराबाद से सफ़र चालू किया इंग्लैंड होते हुए मक्का गये फिर हज करके ईरान और फिर वापस हिन्दुस्तान आ गये।

मौलाना अहमद शाह गवालियार में एक बुज़ुर्ग मेहराब शाह कलंदर से मिले और उनके क़रीब हो गये। जज़्बा जिहाद और अंग्रेज़ो से आज़ादी हासिल करने का हौसला दिल में समाता गया, इस जज़्बे ने आपको देल्ही पहुंचा दिया मगर देल्ही के हालात ठीक नही थे, पंजाब टुकडो में बंट रहा था, ऐसे माहौल में मौलाना को अपना तहरीक चलाना मुश्किल लगा इसलिए मौलाना आगरा चले गये।

लोगों को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उभारते और जो लोग मौलाना के साथ हो जाते उन्हें असर की नमाज़ के बाद तलवार चलाने की ट्रेनिंग दी जाती।धीरे धीरे एक बड़ी जमात आपकी बन गयी। अंग्रेज़ों ने शुरूआती दौर में शाह साहब पर हाथ डालना मुनासिब नहीं समझा तो उनके साथियों को परेशान करना शुरू कर दिया, मौलवी ग़ुलाम अली और दिगर साथी को क़ैद कर लिया गया, उन पर तरह तरह के आरोप लगाये जाते रहे लेकिन मौलाना अपने रस्ते से पीछे नही हटे।

मौलाना आगरा में थे कि मौलाना अमीर अली की शाहदत की ख़बर पहुंची, सब्र पैमाना छलक उठा, मौलाना ने अपनी जमात की क़यादत संभाली, और फ़ैज़ाबाद में ज़बरदस्त जंग हुई, मौलाना के सर पर चोट लगी मौलाना गिरफ़्तार हो गये लेकिन अंग्रेज़ों को शदीद नुक़सान उठाना पड़ा, मौलाना सिकन्दर शाह ने जेल पर हमला कर आपको छुड़ा लिया लेकिन वो खुद गिरफ़्तार हो गये, लेकिन ये बड़ी कामयाबी थी की जमात का सरदार बाहर आ चुका था।

मौलाना ने एक बार फिर कमान संभाली और लोगों को अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ उकसाते रहे, मौलाना फज़ले हक़ ख़ैराबादी जो शुरू में अंग्रेज़ो के ख़ैरख़ाह थे लेकिन मौलाना अहमद शाह की बात ने ऐसा दिल फेरा की अंग्रेज़ों के सबसे बड़े दुश्मन बन गये।

बाग़ी सिपाही ने जिस तरह दिल्ली में क़यादत बहादुर शाह ज़फर को सौंप राखी थी, ठीक ऐसी ही क़यादत इलाहाबाद और फ़ैज़ाबाद में मौलाना के पास थी, मौलाना ने अंग्रेज़ी फ़ौज के कई सिपाही और अहलकार को कैदख़ाने में बंद कर दिया, मौलना ने फ़िरोज़ शाह, जनरल बख़्त, तहम्मुल हुसैन, नाना साहेब को अपने साथ कर लिया और शाहजहाँपुर में अंग्रेज़ों से जम कर मुक़ाबला किया, शाहजहाँपुर में अंग्रेज़ी फ़ौज जदीद हथियारों के साथ थी, मौलाना की जमात को बड़ा नुक़सान हुआ लेकिन तलवार ने जो मुक़ाबला तोप का किया, दुनिया उसकी नज़ीर है।

मौलाना अपने बचे खुचे साथी के साथ क़स्बा मोहम्मदी पहुंचे वहां अपनी हुकूमत बनाई, जनरल बख़्त वज़ीर जंग बनाये गये, मौलाना सरफ़राज़ चीफ जस्टिस और नाना साहेब वजीर मलियात … अभी कुछ ही दिन गुज़रे थे के अंग्रेज़ी फ़ौज कैम्बल के सरदारी में मौलाना की जमात पर टूट पड़ी, मौलाना के बचे खुचे साथी बिखर गये, नाना साहेब, अज़िमुल्लाह ख़ान और जनरल बख़्त नेपाल की तरफ निकल गये लेकिन मौलाना ने अभी हिम्मत नही छोड़ी थी।

मौलाना बड़ी उम्मीद के साथ राजा बलदेव सिंह के पास पहुंचे, उसने अंग्रेज़ो से पहले ही मौलाना के सर का सौदा कर रखा था, मौलना जब उसके पास पहुंचे तो उसने गोलीयों की बौछार करवा दी, मौलाना शहीद हो गये, बलदेव सिंह ने मौलाना के सर को काट कर कलेक्टर के हवाले कर दिया उनका सर एक अरसे तक कोतवाली के सामने टांग कर रखा गया था, उनके बाकी जिस्म को जला दिया गया, ठीक वैसे ही जैसे हिंदुस्तान की तारीख़ लिखने वालों ने उनका नाम तारीख़ की किताबों से जला दिया।

जनरल टॉमसन मौलाना के बारे में लिखता है :- मौलवी अहमद शाह एक ऐसा बहदुर था की उसके पास जाने पर खौफ़ महसूस होता था, बाग़ीयों में उससे बेहतर कोई सिपाही नही था, उसने कभी तलवार सियासी रंजिश के लिए इस्तेमाल नही किया वो तो जंग के मैदान का मर्द था … उसकी हिम्मत और बहादुरी को दुनिया की सारी क़ौम याद रखेगी।

मुझे पूरी दुनिया का तो नही पता, लेकिन हिन्द की ताअसुब से आलुदाह क़लम ने मौलाना की तारीख़ को दफ़न कर दिया।