Shubhneet Kaushik

फरवरी 1916 में महात्मा गांधी बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के स्थापना समारोह में भाग लेने हेतु बनारस आए। इस अवसर पर अपना ऐतिहासिक भाषण देने से ठीक एक दिन पहले 5 फरवरी 1916 को महात्मा गांधी काशी नागरी प्रचारिणी सभा के बाइसवें वार्षिकोत्सव में शामिल हुए। कश्मीर के महाराजा इस समारोह के सभापति थे। अपने भाषण के आरंभ में ही गांधी ने अच्छी हिंदी न बोल सकने के लिए माफ़ी मांगते हुए कहा कि ‘आप जानते हैं कि मैं दक्षिण अफ्रीका में रहता था। वहीं अपने हिंदी भाइयों के साथ काम करते-करते थोड़ी-बहुत हिंदी सीख सका हूँ, इसलिए आप लोग मेरी भूलों को क्षमा करेंगे।’

महात्मा गांधी ने सभा के पदाधिकारियों में जो वकील थे, उनसे पूछा कि ‘आप अदालत में अपना काम अँग्रेजी में चलाते हैं या हिंदी में। यदि अँग्रेजी में चलाते हैं तो मैं कहूँगा कि हिंदी में चलाएं।’ गांधी ने यह भी बताया कि उनके तीस-पैंतीस सहयोगियों ने प्रतिज्ञा की है कि वे बराबर हिंदी का अभ्यास करेंगे। उन्होंने युवकों से कहा कि वे इतनी प्रतिज्ञा करें कि ‘हम आपस का पत्र-व्यवहार हिंदी में करेंगे।’

उच्च विचारों और नए खयाल को अपनी भाषा में लाने के विचार पर ज़ोर देते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि ‘साहित्य-विहीन जाति को स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती।’ भाषा की उन्नति पर बल देते हुए गांधी ने कहा कि सच्चा गौरव उसी भाषा को प्राप्त होगा जिसमें अच्छे-अच्छे विद्वान जन्म लेंगे और उसी का सारे देश में प्रचार भी होगा।

नागरी प्रचारिणी सभा में अगले दिन वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु का व्याख्यान होना था। इसी संदर्भ में गांधी ने सुझाव दिया कि सभा को जगदीशचंद्र बसु की कृतियों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित करना चाहिए। गांधी हिंदी के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने के भी हामी थे। इसीलिए उन्होंने कहा : ‘हमारा मुख्य काम हिंदी सीखना है; पर तो भी हम अन्य भाषाएँ भी सीखेंगे। अगर हम तमिल सीख लेंगे तो तमिल बोलने वालों को भी हिंदी सिखा सकेंगे।’

वर्ष 1929 में काशी की कला परिषद ने अपना ऐतिहासिक संग्रह नागरी प्रचारिणी सभा को सौंप दिया था और उसी वर्ष कला परिषद का नया नाम ‘भारत कला भवन’ रखा गया था। नागरी प्रचारिणी सभा ने इस संग्रहालय हेतु अपनी इमारत की दूसरी मंजिल दे दी थी। सभा ने इसी समय एक विज्ञप्ति जारी कर कला, साहित्य, इतिहास, पुरातत्व आदि विषयों में रुचि रखने वाले लोगों से भारत कला भवन को ऐतिहासिक वस्तुएँ प्रदान करने का आग्रह किया।

विज्ञप्ति में कहा गया कि ‘सभा प्रार्थना करती है कि उक्त संग्रहालय के लिए कलापूर्ण या ऐतिहासिक वस्तुएँ देकर सभा की सहायता करें।’ यह पूरी विज्ञप्ति महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ के 3 अक्तूबर 1929 के अंक में प्रकाशित की। साथ में, उन्होंने यह टिप्पणी भी लिखी : ‘मैंने संग्रहालय में रखी हुई वस्तुएँ भी देखी हैं और वे दर्शनीय हैं। आशा है सभा की अपील के उत्तर में कलाप्रेमी जनता की ओर से सभा को समुचित एवं उदार आश्रय मिलेगा।’