12 मई 1972 की तारीख़ और जुमा का दिन था; मै अपने पत्रकार साथी ‘सैद तेरज़ियोगलु’ के साथ इस्राईली गाईड़ की मदद से पवित्र अल अक़्सा मस्जिद की ज़ियारत कर रहा था।

तब ही मैने मस्जिद ए अक़्सा के आहते के सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर एक शख़्स को देखा, वोह क़रीब 2 मीटर लंबे क़द का मालिक था, उसने एक सिपाही के हिसाब से कपड़े पहन रखे थे, वह बुढ़ा ज़ईफ़ था, पर वह बेहद सतर्क और हिम्मत से खड़ा था, मै उसके चेहरे को देख कर डर सा गया, उसके चेहरे पर कई तरह के निशानात थे।

मैने अपने बग़ल में मौजुद इस्राईली विदेश मांत्रालय में काम करने वाले ‘यूसुफ़’ जो के इस्तंबुल के रहने वाले थे; से पुछा के यह शख़्स कौन है ?

उन्होंने जवाब दिया : मुझे नहीं पता, होगा कोई पागल, यह शख़्स अकसर यहाँ खड़ा रहता है, ना तो किसी से कुछ बोलता है, ना ही किसी से कुछ मांगता है; यहां तक के किसी को देखता भी नही है।

मुझे नहीं पता कियुं, लेकिन मैं उसके पास गया और तुर्की ज़बान में पुछा :- अस्सलाम व अलैकुम बाबा ? यह सुन कर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई, जैसे ऐ़ैसे सवाल की उसे उम्मीद और अपेक्षा नहीं थी, उसने जवाब में कहा : वालैकुम अस्सलाम ओगुल (बेटा)

मैं हैरान था, मैने उनकी हाथों को चुमा, और पुछा :- आप कौन हैं ?

उसने कहा :- इससे पहले के मैं अपने बारे में कुछ बताऊँ, तुम्हें यह जानना चाहीए के सलतनत उस्मानिया ने 401 साल, 3 महीने, 6 दिन तक क़ुदुस (येरुशलम) पर हुकुमत की; और रविवार 9 दिसम्बर 1917 को उन्हें फ़लस्तीन छोड़ कर जाना पड़ा, वैसे भी सलतनत उस्मानिया ख़त्म होने के कगार पर था, पर उस वक़्त भी एक स्क्वाड्रन अल अक़सा मस्जिद में मौजूद था, जिसका काम मस्जिद को अंग्रेज़ी फ़ौज के हांथो लुटने से बचाना था; जो शहर में दाख़िल होने वाले थे और मैं कॉर्पोरल हसन, 20वीं कॉर्प, 36वीं बटालियन, 8वीं स्क्वाड्रन की हेवी मशीनगन टीम से हूँ; जिसे 9 दिसम्बर 1917 को मस्जिद ए अक़्सा की पासबानी के लिए तैनात किया गया था।

उनकी बात सुन कर मै दंग रह गया और मेरे मुह से निकाल :- या ख़ुदा! मैंने उनकी जानिब देखा, उनका सर किसी ऊंची इमारत की मानिंद था; जिस पर मानो गर्व से झंडा लहरा रहा हो, मैने उनके हाथ को वापस चुमा।

तब उन्होने मुझसे कहा :- क्या तुम मुझ पर एक एहसान करोगे बेटा ? मेरी एक ख़्वाहिश है, जिसे मैने कई सालों से इसे छिपा कर रखा है, क्या तुम उसे मेरे लिये पुरा कर सकते हो ?

मैने कहा : ज़रुर, हुक्म तो कीजिए ?

जब तुम अपने मुल्क(तुर्की) वापस जाओ और टोकट संजक(प्रांत है) से गुज़र हो तब वहां जाना और जा कर मेरे कमांडर को ढुंडना; जिसने मुझे यहां तैनात किया था। कैप्टन मूसा नाम है उनका! जब वोह मिले तो मेरी जानिब से उनके हाथों को चूमना और कहना तुर्की के इगदिर प्रांत का कॉर्पोरल हसन जो के 11वीं मशीनगन बटालियन में था; वह आज भी वहीं तैनात है जहाँ आपने उसे छोड़ा था, वह आज भी उसी पोस्ट पर अपनी सेवा दे रहा है।

ये सुनते ही मेरी धड़कन मानो रुक सी गई। मै थरथर कापने लगा। मुझे समझ मे ही नही आ रहा था के क्या जवाब दुं, मेरे गले ने मुझे धोखा दे दिया।

ये बात 57 साल से लगातार मोर्चे पर तैनात एक अज़ीम उस्मानी सिपाही ‘हसन’ तुर्की के मशहुर इतिहासकार ‘इल्हान बर्दाक्ची’ से कह रहा था।

इतिहासकार ‘इल्हान बर्दाक्ची’ ने इस हादसे का ज़िक्र तुर्की के राष्ट्रीय टीवी चैनल पर किया। कई वर्ष बाद तुर्की के सेना प्रमुख ने यह फ़ैसला किया है के वह ‘इल्हान बर्दाक्ची’ की मदद से ‘हसन’ नाम के उस अज़ीम सिपाही की खोज करेंगे।

बर्दाक्ची ने बाद में लिखा :- कॉर्पोरल हसन हम में से ही एक थे, उसकी क़िस्मत उसे भूल चुकी थी, यक़ीनन हु बा-हु कुछ ऐसा ही हुआ था, हम लोगों ने कभी भी उसे खोजने की कोशिश नहीं की, वह नायाब था, वह एक दरख़्त की तरह थे जो अपने अच्छे कर्म करते हुए अपने जीवन में ऊंचा उठते जा रहे थे, वह दरख़्त की तरह आसमान की तरफ़ बढ़ते जा रहे थे, और हम उनके सामने छोटे छोटे घांस के बराबर थे, हमें बस चीज़ें भूलनी आती हैं, और हमेशा की तरह हमने उस ‘कॉर्पोरल हसन’ को भुला दिया जो एक नायाब हीरे की तरह थे।

साल 2017 में ही ग़ाज़ा में एक मस्जिद खोली गई जिसका नाम बैतुल मुक़द्दस – मस्जिद ए अक़्सा के एक मुहाफ़िज़ के नाम पर “कॉर्पोरल हसन मस्जिद” रखी गई।

ज्ञात रहे के 12वीं सदी में सलीबयों (क्रुसेडर) के हमले के बाद येरुशलम (फ़लस्तीन) 9 दिसम्बर 1917 को पहली बार किसी गैर-मुस्लिम के हांथ मे गया था। प्रथम विश्व युद्ध मे इंगलैंड ने भारतीय मुस्लिम सिपाहीयों की मदद से उस्मानियों को फ़लस्तीन मे हरा दिया था। 11 दिसम्बर 1917 को पहली बार गैर मुस्लिम फ़ौज येरुशलम में दाख़िल हुई थी।

फ़ोटो :- Ottoman Imperial Archive

Md Umar Ashraf & Khurram Malick