वोह मार्च 1924 की रात थी, इस्तांबुल के शाही महल कि लाईब्रेरी से रौशनी बाहर आ रही थी, वहां एक बुढ़ा शख़्स ख़ामोशी से बैठ अपने अवाम और क़ौम के बारे मे सोचते हुए क़ुरान पाक की तिलावत कर रहा था। उस शख़्स का नाम था अब्दुल मजीद था और वोह इस्लाम के 101वें ख़लीफ़ा थे।

नवम्बर 1922 में उस्मानी सुलतान मेहमत VI को मुल्क बदर कर इटली भेजने के बाद सलतनत उस्मानिया का ख़ात्मा कर दिया गया था और उसके 2 साल बाद 3 मार्च 1924 के रात को फ़ौज का एक जवान फ़रमान ले कर शाही लाईब्रेरी का दरवाज़ा खोलता है, पर ख़लिफ़ा अब्दुल मजीद इफ़्फ़ेंदी उसपर ध्यान ना देते हुए लगातार क़ुरान पाक की तिलावत किये जा रहे थे, ये देख कर वोह सिपाही वापस पीछे हुआ। पर उसने जाते जाते वोह फ़रमान पढ़ डाला जो वोह ग्रांड असेंबली तुर्की की जानिब से लाया था. फ़रमान मे ख़िलाफ़त के ख़ात्मे और मुल्क बदर का हुक्म था। फ़रमान सुनने के बाद ख़लिफ़ा अब्दुल मजीद इफ़्फ़ेंदी ने इस्तांबुल छोड़ने से इंकार कर दिया। पर उनके मुहाफ़िज़ों और वफ़ादारों को डर था कहीं फ़ौज ख़लीफ़ा और उनके ख़ानदान के लोगों का क़त्ल ना कर दे जिन्होने पुरे महल को बंदुक़ और तोप के निशाने पर ले रखा था।

उन्होने फ़ौरन ख़लीफ़ा अब्दुल मजीद इफ़्फ़ेंदी के कुछ कपड़े को एक बैग मे डाला और इसके बाद ख़लीफ़ा अपने ख़ानदान के लोगों के साथ शाही महल से निकल गए। फ़जर की नमाज़ से पहले ख़लीफ़ा अब्दुल मजीद इफ़्फ़ेंदी को कटल रेलवे स्टेशन ले जाया गया जहां ख़लीफ़ा और उनके अहलो आयाल का ओरियेंट एकसप्रेस पर बैठने का इंतज़ाम किया गया जिससे उन्हे Switzerland जाना था। इसके लिए ख़लीफ़ा अब्दुल मजीद इफ़्फ़ेंदी के हांथ मे £2000 का लिफ़ाफ़ दे दिया गया।

चुंके ठंड का मौसम था इस वजह कर स्टेशन मास्टर फ़ौरन ख़लीफ़ा अब्दुल मजीद इफ़्फ़ेंदी और उनके परिवार को अपने घर ले गया जो स्टेशन के बिलकुल ही नज़दीक था। वहां सभी लोगों ने चाय पी। मेहमाननवाज़ी के लिए ख़लीफ़ा ने स्टेशन मास्टर का शुक्रीया अदा किया। ये सुनते ही स्टेशन मास्टर जो के एक यहूदी था रोने लगा और उसने कहा :- आप मेरा शुक्रीया कैसे अदा कर सकते हैं ? ये तो मेरे लिए फ़ख़्र की बात है के मै ख़लिफ़ातुल मुस्लिमीन के काम आ सका और उन्होने मुझे इस क़ाबिल समझा।

सुबह को जैसे ही अवाम को ख़बर मिली के ख़िलाफ़त का ख़ात्मा कर दिया गया है और ख़लीफ़ा अब्दुल मजीद इफ़्फ़ेंदी को उनके परिवार के साथ मुल्क बदर कर दिया है, अवाम मे रंज ओ ग़म फैल जाता है। मुल्क भर मे हिंसा और तशद्दुद का दौर शुरु होता है पर पहले से इसके लिए तैयार फ़ौज इन तमाम तरह के तशद्दुद पर क़ाबु पा लेती है।

ख़लीफ़ा अपनी ज़िंदगी के आख़री दिन पेरिस फ़्रांस मे गुज़ारते हैं, वहीं उनकी बेटी शहज़ादी निलोफ़र की शादी निज़ाम हैदराबाद के बेटे से 1931 मे होती है।

ज्ञात रहे के 1920 में खलीफ़ा को मजबूर करके नेशनल असेम्बली क़ायम की गई फिर 1922 में सुल्तानी ख़त्म की गई फिर 1923 में तुर्की रिपब्लिक वजूद में आया और अतातुर्क कमाल पाशा सिपहसालार से तुर्की के राष्ट्रपति बना, फिर आख़िरकार 1924 में कमाल पाशा ने खिलाफ़त का ख़ातमा कर दिया, उस ख़िलाफ़त का ख़ात्मा किया जिसके दफ़ा के लिए हिन्दुस्तान में तहरीक चली।

आख़िर ख़लीफ़ातुल मुस्लिमीन अब्दुल मजीद बिन अब्दुल अज़ीज़ ख़ान का इंतक़ाल 23 अगस्त 1944 को पेरिस फ़्रांस मे हुआ था, चुंके आज तक मुसलमानो के किसी भी ख़लीफ़ा को ग़ैर मुसलिम के ज़मीन पर नही दफ़नाया था इस वजह कर इन्हे जन्नतुल बक़ी मदीना मुनव्वरा साऊदी अरब मे दफ़न कर दिया गया और ..

बक़ौल इक़बाल :-

अगर उस्मानीयो पर कोहे ग़म टुटा तो क्या ग़म है,
के ख़ुने सद हज़ार अंजुम से होती है सेहर पैदा.
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

ध्यान रहे हिन्दुस्तान मे 13 साल लगातार तहरीक ए ख़िलाफ़त चला, हिन्दु और मुसलमानो ने मिल कर इस तहरीक में हिस्सा लिया, कभी बी अम्मा ने अपने बेटे मुहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली से कहा था, जान बेटा ख़िलाफ़त पर दे दो :-

सब्र से जेलख़ाने मे रहना,
जो मुसीबत पड़े उसको सहना।
बूढ़ी अम्मा का कुछ ग़म न करना,
कलमा पढ़ के ख़िलाफ़त पे मरना।

पर नतीजा ?

Md Umar Ashraf