असहयोग और ख़िलाफ़त आंदोलन के दौरान मौलवी वजाहत हुसैन ‘वजाहत’ सिद्दीक़ी की एक नज़्म ‘लम्प और दिया’ जिस पर अंग्रेज़ों ने पाबंदी लगा दिया.

असल में इस नज़्म में स्वदेशी अपनाने और विदेशी सामान के बहिष्कार कि बात की गई है, जो सीधे अंग्रेज़ों पर हमला था. पेश है वो नज़्म जिसे आज़ाद भारत में संजो कर रखा गया है.

लम्प ने इक दिन दिये से यूँ कहा
सामने मेरे भला तू क्या है माल

इस ज़माने की नई है रौशनी
है तरक़्क़ी पर मेरा हुस्नो जमाल

पूछता कौन है तुझ को आज कल
क़द्रदाँ बाक़ी हैं तेरे ख़ाल ख़ाल

जितना तेरा तेल था सब जल चुका
ख़ुश्क बत्ती भी जली है कर ख़्याल

गैस और बिजली का जौहर मुझमें है
रोज़ बढ़ता जाता है मेरा कमाल

रख्खा जाता हूँ मै अक्सर मेज़ पर
मुझसे रौशन होते हैं कोठी के हॉल

जैसा तू वैसा ही डयूएट है तेरा
है तेरा सामान तेरे हस्बे हाल

अपनी इज़्ज़त की ख़बर ले ओ गंवार
सुर्ख़ पगड़ी तू ज़रा अपनी संभाल

लम्प की बातें दिये ने जब सुनीं
हो गया ग़ुस्से से फ़ौरन जल के लाल

लम्प से कहने लगा ओ बेशऊर
बढ़ न तू इतना ज़ुबाँ अपनी संभाल

हो मुबारक तुझको तेरी टीप टॉप
जनता हूँ मैं जो होगा उसका हाल

टूटती है आए दिन चिमनी तेरी
ढाई आने रोज़ का है यह बवाल

तुझसे रौशन हैं अमीरों के मकां
रौशनी से मेरी हैं मुफ़्लिस निहाल

मैं हूँ इक कम ख़र्च और बालानशीं
लोग कहते हैं मुझे दमड़ी का लाल

क़ब्र पर जलता हूँ मैं मरने के बाद
तुझमें पाई जाती है कब यह मिसाल

मैं सुदेशी तू बिदेसी याद रख
तुझ पे आया चाहता है अब ज़वाल