अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के 65वीं दीक्षांत समारोह से ख़िताब करते हुए मेहमान ए ख़ुसुसी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खां को श्रद्धांजलि प्रस्तुत किया और कहा कि उन्होंने जिस शैक्षिक संस्था की बुनियाद डाली थी उससे महान नेता पैदा हुए।

जिसकी पहली लाइन में मौलाना हसरत मोहानी, राजा मेहन्द्र प्रताप, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान, डॉक्टर युसूफ़ और डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन जैसे महान सेनानी के नाम शामिल हैं।

उन्होंने महिला शिक्षा के मैदान में एएमयू की सराहना करते हुए कहा कि यहाँ से इस्मत चुगताई और मुमताज़ जहाँ जैसी महिलाओं समाज की तरक्की में अहम भूमिका अदा किया है। इसके साथ ही उन्होने अमरोहा से संबंध रखने वाले ख़ुशबू मिर्ज़ा का भी ख़ुसुसी तौर पर ज़िक्र किया जिसने इसरो के चंद्रयान मिशन में बेहतरीन भूमिका अदा किया था। उन्होने कहा था कि “ख़ुशबू जैसी बेटियों ने ‘चिलमन से चाँद’ तक के सफर को शानदार अंजाम दिया है”।

कौन हैं ख़ुशबु मिर्ज़ा ?

बात 2008 की है जब भारत ने सफ़ल पुर्वक चंद्रयान-1 का टेस्ट किया था तब पुरा भारत ख़ुशी के मारे झुम उठा था, ठीक उस समय उत्तर प्रदेश के अमरोहा का एक छोटा सा मुस्लिम बहुल मोहल्ला “चौगौरी” कुछ अधिक ख़ुशी मना रहा था और मनाए भी क्यो नही आख़िर वहां की बेटी “ख़ुशबु मिर्ज़ा” भारत के चंद्रयान मिशन की हिस्सा जो थी।

अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी से इंजिनियरिंग की पढ़ाई की हुई ख़ुशबु मिर्ज़ा उन इनजिनयर के टीम मे थी जिन्होने चंद्रयान-1 को आसमान मे भेजा था।

अमरोहा की खुशबू मिर्ज़ा ने उस समय इसरो के चंद्रयान मिशन का हिस्सा बनकर छोटे शहर और मुस्लिम महिलाओं से जुड़ी तमाम नकारात्मक छवियों को तोड़ा था।

उत्तर प्रदेश का अमरोहा जिला दिल्ली से करीब 200 किमी की दूरी पर है. यहां का चौगोरी मौहल्ला एक आम-सी मुस्लिम आबादी है जिसमें शायद ही कुछ ऐसा हो जो आपका ज़रा भी ध्यान आकर्षित कर पाए। इस मौहल्ले में प्रवेश का एकमात्र रास्ता मात्र छह फुट चौड़ा और घुमावदार है जो अक्सर कीचड़ और गंदगी से भरा रहता है और इसी रास्ते से होकर ही मिर्जा परिवार तक पहुंचा जा सकता है। खुशबू इसी मिर्ज़ा परिवार की तीन संतानों में से एक हैं जिनकी तारीफ़ भारत का राष्ट्रापति भी कर रहे हैं।

मुहल्ला चौगौरी निवासी स्व. सिकंदर मिर्ज़ा के परिवार में 30 जुलाई 1985 को जन्म लेने वाली खुशबू मिर्ज़ा ने शहर के ही कृष्णा बाल मंदिर स्कूल से इंटर तक की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। वह अपने बैच की गोल्ड मेडलिस्ट रहीं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) में इंजीनियर “ख़ुशबु मिर्ज़ा” भारत की महत्वाकांक्षी चंद्रयान परियोजना की ‘चेक आउट’ डिवीज़न के 12 सदस्यों में से एक थीं, ख़ास बात ये है कि वे इस टीम की सबसे छोटी सदस्य थीं। इस डिवीजन में उनका काम था कृत्रिम परिस्थितियों में उपग्रह के तमाम पुर्ज़ों पर तरह-तरह के परीक्षण करना था।

न्यूज़ वेबसाईट TwoCircles.net से बात करते हुए “खुशबू मिर्ज़ा” कहा था कि एक साल और दस महीने तक उन्होंने इस मिशन को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत की थी। ‘इसरो में काम करते हुए भी मैंने रमज़ान के रोज़े रखे, नमाज़ पढ़ी और परीक्षण केंद्र में ही ईद भी मनाई’।

इस बात से शायद ये भी साबित होता है कि इस्लाम की रवायतों का पालन करने के मामले में वो किसी अन्य आम मुस्लिम महिला से ज़रा भी अलग नहीं हैं। हालांकि वो ये भी स्वीकार करती हैं कि उनकी उदार पारिवारिक पृष्ठभूमि का उनकी सफ़लता में ख़ासा योगदान है।

खुशबू की दुनिया सिर्फ़ इंजीनियरिंग तक ही सीमित नहीं रही। अपने स्कूल के दिनों में वो ज़िला स्तर की वॉलीबॉल की खिलाड़ी थीं। दसवीं पास करने के बाद आगे पढ़ाई के लिए उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और फिर यहीं से बी टेक की पढ़ाई भी की।

खुशबू इस विश्वविद्यालय की पहली छात्रा भी रहीं जिसने यहां के छात्र संघ के चुनावों में हिस्सा लिया। हालांकि वे चुनाव तो नहीं जीतीं लेकिन उनकी इस कोशिश ने यहां और लड़कियों को चुनाव में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उनका मानना है के अब समय बदल चुका है इसलिए मुस्लिम लड़कियों के प्रति भी नज़रिया बदलना चाहिए। हमारे परिवारों को हमें जरूर पढ़ाना चाहिए।