जिस वक़्त मंगोलों ने मग़रिब से लेकर मशरिक़ तक, सेंट्रल एशिया से ले कर अफ़ग़ानिस्तान तक, युरोप की सरहद से लेकर चीन तक को अपने पाओं तले रौंदते फिर रहे थे; लेकिन जिन मंगोलो ने हार का मुंह नही देखा था वो आख़िर हिन्दुस्तान की ज़मीन पर बुरी तरह पिट गए…? उसका जवाब है भारतीय इतिहास के सबसे ताक़तवर शासकों में से एक अलाउद्दीन ख़िलजी जो ख़ुद को सिकंदर-ए- सानी कहते थे. जब मंगोलो की ख़ौफ़ से थर थर कांप रही थी दुनिया की बड़ी बड़ी सलतनत तब उस वक़्त हिन्दुस्तान में एक एैसा बहादुर और दिलेर शहंशाह हुकुमत कर रहा था जिनसे मंगोलो को एक बार नही बल्के पांच बार शिकस्त दिया।

जालंधर मे 1297 को हुई मंगोलो से पहली जंग मे सुल्तान खिलजी की सेना ने ज़फ़र ख़ान के नेतृत्व में ना सिर्फ़ मंगोलो को हराया बल्के बीस हज़ार से अधिक मंगोल सिपाहीयों को मार डाला और बाक़ी को पकड़ देल्ही मे अलाउद्दीन ख़िलजी के पास भेज दिया जिनमे से अधिकतर के सर को धड़े से अलग कर दिया गए या जिनकी तादाद तीन हज़ार से अधिक थी और इनके सर को देल्ही मे दफ़ना दिया गया और फिर बाद मे उस जगह पर अलाउद्दीन ख़िलजी ने एक क़िला तामीर करवाया जिसे “सीरी क़िला” के नाम से जाना गया और ये नाम ‘सर’ से ही आया है।

1298 मे खिलजी की सेना का ज़फ़र ख़ान के नेतृत्व में एक बार फिर मंगोल फ़ौज से मुक़ाबला सिंध मे हुआ जहां मंगोलो ने कई जगह पर क़ब्ज़ा रखा था और इस जंग मे एक बार फिर मंगोलो को हार सामना करना पड़ा और दो हजार से अधिक सिपाहीयों के साथ उनके जनरलों को क़ब्ज़े में ले लिया गया। अगले साल 1299 को मंगोलो ने पिछले दो हार का बदला लेने की नियत से देल्ही सलतनत के दारुलहुकुमत पर ही हमला करने की नियत से कुच किया।

अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने वज़ीरों से मशवरा किया सबने समझौते करने की ही बात की पर अलाउद्दीन ने इन सबकी बात काटते हुए कहा :- ” के अगर मै तुम्हारी बात को मान लेता हुं तो कल किसी को मुंह दिखामे के लाएक़ नही रहुंगा, मुझे मैदान ए जंग मे जाना ही होगा “… इसके बाद अलाउद्दीन ख़िलजी ने इस जंग की कमान एक बार फिर से ज़फ़र ख़ान को सौंप दी और मंगोलो को फिर से हार का सामना करना पड़ा … पर इस जंग मे दुशमानो का छक्का छुड़ाते छुड़ाते ज़फ़र ख़ान ख़ुद शहीद हो गए… पर ख़िलजी की सेना जंग जीत गई।

अली बेग़ (चंगेज़ ख़ान के वंशज) और तारताक़ के नेतृत्व में 50 हज़ार मंगोल सैनिक का मुक़ाबला मलिक काफुर के नेतृत्व में सुल्तान खिलजी की सेना से उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ. गंगा के मैदानी इलाक़े में 1305 में हुए भीषण युद्ध में खिलजी की सेना ने मंगोलों को बुरी तरह हराया. क़ब्ज़े में लिए गए दोनों मंगोल जनरलों को दिल्ली में सूली चढ़ा दिया गया।

बुरी तरह हार का सामना कर रहे मंगोलो मे अलाउद्दीन ख़िलजी के नाम का ख़ौफ़ तारी हो गया था, अलाउद्दीन ख़िलजी दुनिया के ऐसे चंद शासकों में भी शामिल थे जिन्होंने मंगोल आक्रमणों को नाकाम किया और अपने राज्य की रक्षा की. उन्होंने न सिर्फ़ बड़ी मंगोल सेनाओं को हराया बल्कि मध्य एशिया में मंगोलों के ख़िलाफ़ अभियान भी चलाया। एक बार तो उन्हे अफ़्गानिस्तान में घुस कर भगाया; उनके ख़ौफ़ का ये आलम था के हिन्दुस्तान पल हमला करने वाले हलाकु ख़ां के भतीजे और मंगोल फ़ौज के सदर ने अपने चार हज़ार सिपाहीयों के साथ इस्लाम क़बुल कर लिया; जिन्हे आजके निज़ामुद्दीन में मुग़लपुरा बना कर बसाया गया था।

इस अज़ीम फ़ातेह ने 1301 मे रंणथम्बोर फ़तह किया, 1303 में चित्तौड़, 1304 में गुजरात, 1305 में मालवा, 1308 में सवाना को फ़तह किया।विधांचल कोहिसार पर करके 1308 में देवगिरी तो 1310 में वारंगल, 1311 में द्वार समंदर फ़तह किया; 1311 में ही जालोर और परमार ख़ानदान की ताक़त को तोड़ा और पांडिया ख़ानदान को बाजगुज़र बनाया। और एक मज़बुत हिन्दुस्तान की बुनियाद डाली जिसकी दारुलहुकुमत दिल्ली के ज़ेर ए निगरानी दकन का इलाक़ा भी था। अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने साम्राज्य को दक्षिण की दिशा में बढ़ाया। उनका साम्राज्य कावेरी नदी के दक्षिण तक फैल गया था।