आज गूगल ने अंग्रेज़ी और मलयालम भाषा की लेखिका कमला सुरय्या के सम्मान में अपना डूडल बनाया है, वे पंद्रह वर्ष की उम्र से ही कवितायेँ लिखने लगी थी लेकिन सबसे ज़्यादा उन्हें अपनी आत्मकथा ‘माई स्टोरी’ से प्रसिद्धि प्राप्त हुई, ये किताब अंग्रेज़ी भाषा में 1976 में प्रकाशित हुई और 1984 में नोबेल प्राइज के लिए नामांकित भी हुई. 11 दिसम्बर 1999 को कमला सुरय्या ने इस्लाम कबूल करने का एलान किया और अपना नाम कमला दास से बदल कर कमला सुरय्या रख लिया, जो एक चौंकाने वाली ख़बर थी क्योंकि कमला सुरय्या शायद पहली विश्वप्रसिद्ध भारतीय महिला साहित्यकार थी जिन्होंने इस्लाम कबूल करने का एलान किया था चूँकि कमला सुरय्या भारतीय सहित्य में स्त्री विमर्श पर लेखन करने वाली और नारीवाद की समर्थक एक बड़ा नाम रह चुकी थी इसलिए भी इस्लाम कबूल करने का उनका एलान चौंकाने वाला था.

उनका जन्म केरल के पुनयूरकुलम में 31 मार्च 1934 को हुआ था. 31 मई 2009 को उन्होंने आखिरी सांस ली. इस्लाम धर्म क़बूल करने से पहले उनका नाम कमला दास था. ख़ुद को कृष्ण की साधक बताने वाली कमला दास जब 65 साल की उम्र में कमला सुरैया बनी तो उनका कहना था, “मैंने कृष्ण को अल्लाह में परिवर्तित कर दिया है. इस बयान की और उनके धर्म बदलने की तीखी आलोचना” हुई थी. लेकिन अपने लेखन और जीवन में नारीवादी और आधुनिकतम मूल्यों के लिए सक्रिय रही कमला दास ने इन विवादों और आलोचनाओं की कभी परवाह नहीं की. हालांकि इस्लाम धर्म स्वीकार करने के पीछे उन्होंने अपना इरादा और फ़ैसला कभी वास्तविक तौर पर ज़ाहिर नहीं किया.

इस्लाम कबूल करने का एलान करने के कुछ दिनों बाद 15 दिसम्बर को एक अख़बार को इंटरव्यू देते हुए उन्होंने कहा के –

‘‘इस्लामी शिक्षाओं में बुरके़ ने मुझे बहुत प्रभावित किया अर्थात वह लिबास जो मुसलमान औरतें आमतौर पर पहनती हैं। हक़ीक़त यह है कि बुरक़ा बड़ा ही ज़बरदस्त (Wonderful) लिबास और असाधारण चीज़ है। यह औरत को मर्द की चुभती हुई नज़रों से सुरक्षित रखता है और एक ख़ास क़िस्म की सुरक्षा की भावना प्रदान करता है।’’ ‘‘आपको मेरी यह बात बड़ी अजीब लगेगी कि मैं नाम-निहाद आज़ादी से तंग आ गयी हूं। मुझे औरतों के नंगे मुंह, आज़ाद चलत-फिरत तनिक भी पसन्द नहीं। मैं चाहती हूं कि कोई मर्द मेरी ओर घूर कर न देखे। इसीलिए यह सुनकर आपको आश्चर्य होगा कि मैं पिछले चौबीस वर्षों से समय-समय पर बुरक़ा ओढ़़ रही हूं, शॉपिंग के लिए जाते हुए, सांस्कृतिक समारोहों में भाग लेते हुए, यहां तक कि विदेशों की यात्राओं में मैं अक्सर बुरक़ा पहन लिया करती थी और एक ख़ास क़िस्म की सुरक्षा की भावना से आनन्दित होती थी। मैंने देखा कि पर्देदार औरतों का आदर-सम्मान किया जाता है और कोई उन्हें अकारण परेशान नहीं करता।’’

एक नारीवादी पृष्ठभूमि रखने वाली कमला सुरय्या का परदे को लेकर दिया जाने वाला ये बयान भी बहुत आश्चर्यजनक था इसके इलावा उन्होंने कहा –

‘‘दुनिया सुन ले कि मैंने इस्लाम क़बूल कर लिया है, इस्लाम जो मुहब्बत, अमन और शान्ति का दीन है, इस्लाम जो सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था है, और मैंने यह फै़सला भावुकता या सामयिक आधारों पर नहीं किया है, इसके लिए मैंने एक अवधि तक बड़ी गंभीरता और ध्यानपूर्वक गहन अध्ययन किया है और मैं अंत में इस नतीजे पर पहुंची हूं कि अन्य असंख्य ख़ूबियों के अतिरिक्त इस्लाम औरत को सुरक्षा का एहसास प्रदान करता है और मैं इसकी बड़ी ही ज़रूरत महसूस करती थी… इसका एक अत्यंत उज्ज्वल पक्ष यह भी है कि अब मुझे अनगिनत ख़ुदाओं के बजाय एक और केवल एक ख़ुदा की उपासना करनी होगी। यह रमज़ान का महीना है। मुसलमानों का अत्यंत पवित्र महीना और मैं ख़ुश हूं कि इस अत्यंत पवित्र महीने में अपनी आस्थाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर रही हूं तथा समझ-बूझ और होश के साथ एलान करती हूं कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं और मुहम्मद (सल्ल॰) अल्लाह के रसूल (दूत) हैं। अतीत में मेरा कोई अक़ीदा नहीं था। मूर्ति पूजा से बददिल होकर मैंने नास्तिकता अपना ली थी, लेकिन अब मैं एलान करती हूं कि मैं एक अल्लाह की उपासक बनकर रहूंगी और धर्म और समुदाय के भेदभाव के बग़ैर उसके सभी बन्दों से मुहब्बत करती रहूंगी।’’

‘‘इस्लाम ने औरतों को विभिन्न पहलुओं से बहुत-सी आज़ादियां दे रखी हैं, बल्कि जहां तक बराबरी की बात है इतिहास के किसी युग में दुनिया के किसी समाज ने मर्द और औरत की बराबरी का वह एहतिमाम नहीं किया जो इस्लाम ने किया है । इसको मर्दों के बराबर अधिकारों से नवाज़ा गया है। मां, बहन, बीवी और बेटी अर्थात इसका हर रिश्ता गरिमापूर्ण और सम्मानीय है। इसको बाप, पति और बेटों की जायदाद में भागीदार बनाया गया है और घर में वह पति की प्र्रतिनिधि और कार्यवाहिका है।”

उन्होंन एक इंटरव्यू में कहा थाः “मुझे मृतों के दाह संस्कार की हिंदू प्रक्रिया पसंद नहीं है. मैं नहीं चाहती मेरे शरीर को जलाया जाए. यह एक छोटी वजह हो सकती है. लेकिन मेरा इस्लामिक जीवनशैली के प्रति खास लगाव रहा है. मैंने दो नाबीना मुस्लिम बच्चों इरशाद अहम और इम्तियाज अहमद को गोद लिया है. वे मुझे इस्लाम के करीब लाए हैं…”

उनका शुमार भारत के समकालीन सर्वश्रेष्ठ लेखकों में होता रहा है. माधवीकुट्टी नाम से मशहूर कमला दास ने बेधड़क रचनाएं की. उनकी सबसे चर्चित और विवादास्पद रचना उनकी आत्मकथा है जिसका नाम है माई स्टोरी. 1976 में प्रकाशित इस किताब में समाज और व्यक्ति की मानसिकताओं की पड़ताल करते हुए कमला दास ने स्त्री पुरूष संबधों, विवाह की संस्था और इसके दायरे से बाहर के रिश्तों की वस्तुपरकता की मानवीय छानबीन की है. ये किताब इतनी लोकप्रिय हुई की दुनिया की करीब 15 भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ. कमला दास ने अपना एक राजनैतिक दल भी बनाया. 1984 में उन्होंने संसदीय चुनाव भी लड़ा लेकिन हार गयीं.

बीबीसी में छपी एक खबर के मुताबिक उनका बेबाकपन इस बात से ही जाहिर होता है कि उन्होंने अपने 13 साल बेटे जयसूर्या दास को सिगरेट पिलाई. आज भी मां-बाप की इज्जत करने वाले बच्चे उनसे छिपकर सिगरेट पीते हैं लेकिन कमला दास ने खुद अपने बेटे की ये इच्छा पूरी की. उनके 13 साल के बेटे ने सिगरेट पीने की बात कही. उन्होंने मना नहीं किया बल्कि उसे पूरा पैकेट ला कर दिया और अपने सामने ही उसे 4 से 5 सिगरेट पिलाई. जयसूर्या ने बताया कि अगर उनकी मां कहती कि सिगरेट पीना बुरी बात है तो मुझमें उसे चोरी छिपे पीने की इच्छा जागती और हो सकता था कि मुझे उसकी लत लग जाती. लेकिन मैंने फिर कभी पूरी ज़िंदगी सिगरेट को कभी हाथ नहीं लगाया. इस घटना के बाद कमला दास ने ‘अपने बेटे से साफ शब्दों में कहा कि सिगरेट पीने का तुम भी अनुभव करो और अगर ठीक लगता है तो तुम इसे पीना जारी रखो.’

जाति धर्म और स्त्री पुरूष के भेद को ठुकराकर और रूढ़िवादी मानसिकताओं को हमेशा अपने लेखन और अपने कर्म से चुनौती देते रहने वाली माधवीकुट्टी यानी कमलादास यानी कमला सुरैया ने रेडिफ पर दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि “रचना में लेखक किसी न किसी रूप में हमेशा मौजद रहता है, वो अपनी सृष्टि यानी अपनी रचना के भीतर फंसा रहता है और ये एक जीवंत परिघटना है.” कमला दास अपनी रचना की वही परिघटना हैं. 31 मई 2009 को पुणे, महाराष्ट्र में उन्होंने आखिरी सांस ली और 75 वर्ष की आयु में उनका इन्तकाल हो गया.

ये लेख प्रिन्स ऑफ़ ढम्प यहाँ है के वाल से उठाया गया है जिसमे कुछ बदलाव किआ गया है (कमला सुरय्या के बयानों पर आधरित विस्तृत लेख पढने के लिए दिए गए “इस्लामधर्म.ओआरजी” के लिंक पर क्लिक करें)