जब कभी मेल या एक्सप्रेस ट्रेन से फ़तुहा स्टेशन आने वाला होता, जहां से उस समय मार्टिन कंपनी की छोटी लाइन इस्लामपुर की जानिब जाती थी, तब कलीम अपने सर और आंख पर कपड़ा लपेट कर अपने सीट पर लेट जाते, और ज़ोर से बर्थ की लकड़ी को थाम लेते, क्यूँकी उन्हें डर था के अगर वो चलती हुई ट्रेन की खिड़की से फ़तुहा छोटी लाइन और ट्रैन को देख लेंगे; तो वो ट्रेन से कूद जाएंगे. 1947 से 1957 तक सफ़र करते हुवे उन्होंने इस तरफ़ कभी नहीं देखा. लेकिन 1957 में कलीम ने एक दिन इरादा कर लिया :

अब के इस बरसात में गंज ए शहीदां पर चलें
आसमां रोयेगा और अपनी ग़ज़ले गाएंगे हम।

उस दिन एक झोली टांगे कलीम फ़तुहा छोटी लाइन की ट्रेन पर सवार हो कर चल दिये. स्टेशन से बस्ती की तरफ़ जाने वाली सड़क पक्की हो चुकी थी, जो पहले कच्ची मिट्टी की थी, कोलतार की बन चुकी थी. ऐसा मालूम हो रहा था के भूखे के होंठ पर किसी ने घी लगा दिया हो. पर कलीम को ईंट, पत्थर, सीमेंट और कोलतार की जगह ख़ून, हड्डियां, आंसू और झांकती हुई आँखें नज़र आ रही थीं. कलीम सड़क से उतर कर किनारे किनारे कच्ची ज़मीन पर चलने लगे.

सितारे बन के मेरी ख़ाक के ज़र्रे चमकते हैं
ज़मीं उनकी गली की आसमां मालूम होती है.

कलीम बस्ती पहुँच चुके थे, पुरे 11 साल बाद, बस्ती के लोगों ने कमउम्र में देखा था, इसलिए किसी ने पहचाना नहीं. कलीम अपने घर के सामने थे, जिसका कुछ हिस्सा ढहने से बच गया था, अब उसमे पुलिस चौकी क़ायम कर दी गई थी, जिसे देख कर कलीम को ऐसा मालूम हो रहा था मानो जिस ज़ख़्म पर बरसों से अंगारा रखा हो; उस पर किसी ने मरहम रख दिया था. कलीम घर के सेहन में दाख़िल हुवे और अपनी छाती ज़मीन से लगा कर घास पर पड़ गए. उनकी आँखें बंद हो गई, उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था के मानो सारी दुनिया की सुकून, ठंडक और ख़ुशबू उनके सीने में दाख़िल हो रही हो. उन्हें ऐसा मालूम हुआ के उन्हें उनकी मां ने अपने आग़ोश में ले रखा हो. बरसों की जलन, तड़प और तपिश एका एक सुकून में तब्दील हो गई.

अब तक पुलिस चौकी के थानेदार, हवलदार और कांस्टेबल कलीम के क़रीब जमा हो चुके थे, कलीम ने उठ कर उन्हें अपना नाम बताया, और कहा के वो उनके ही किरायदार हैं. फिर ग्यारह साल पुरानी कहानी उन्हें मालूम हो गई. थाने का सारा स्टाफ़ उनसे बड़ी मुहब्बत और अक़ीदत से पेश आया. इधर आनन फ़ानन पुरी बस्ती में ये ख़बर दौड़ गई के ग्यारह साल बाद इस गाँव में एक मुसलमान आया है, वो इसी गाँव का है, और कोई दूसरा नहीं कलीम आया है. और देखते कलीम के नज़दीक बूढ़ों, जवानों, औरतों और बच्चों का हुजूम जमा हो गया. किसी की आँख डबडबाई हुई, किसी के होंठ पर हल्का सा तबस्सुम, किसी के चेहरे पर हैरत, और आवाज़ गूंजती है.

आयें? कलीम ऐलहन हैं? (कलीम आये हैं?)…… कलीम बाबू हथिन? (कलीम बाबू हैं?) कलीम…… कलीम…… किथन हैं कलीम? (कहाँ हैं कलीम?) सत्तर बरस की सुरजी तमोलन भीड़ को चीरते हुवे बढ़ रही है, किथन हैं कलीम?…. इधर हैं हम सुरजी!…. “ओह हो कलीम हो?…. हाय बेटा…. क्या हो गया बेटा? …. ये क्या हो गया बेटा? …. सुरजी तो तुमरी माँ के साथ ही मर गई बेटा….. अब बस्ती में तो कुछ न है बेटा…. बस्ती तो खत्तम हो गइली बेटा”….. बूढ़ी हो चुकी बत्थू पासी की जोरू झुकी झुकी आई, और दूर से ही कलीम की बलाएँ लेती हुई बोली “हाय उम्मत्तु जी… कोढियन के हाँथ न फूटल…. बेटा तो कहाँ है?… हम तो पटना में हैं मईया… और नसीम कहाँ है?…… वो भी मेरे साथ पटना में है……. दुख सुख गुजर गइली बेटा….. तू आजा बेटा, हिंये रह बेटा……. मेरा भी यही जी चाहे है. देखो……. इधर राम खेलावन की अधेड़ बीवी घूँघट में से मुस्कुराते हुवे बोली, हमरा चिन्हा हा कलीम?….. हाँ, तुमको पहचानते हैं भाभी….. कब अएबा कलीम?….. देखो क्या कहें….. और हमको पहचानते हो कलीम? मेल जोल की वजह कर इनकी ज़ुबान साफ़ थी. ये परशादी सुनार की जवान बेटियों की आवाज़ थी, जो कलीम की हम उमर थीं, घर में आना जाना था, घर के दीवार एक थे. कलीम बचपन में साथ खेला करते थे. सयानी हुई तो पर्दे में रहने लगीं थीं, कभी कभार सलाम प्रणाम हो जाया करता था, पर अब बिलकुल जवान थीं……. बस्ती से एक तहज़ीब के पुरी तरह से ख़तम हो जाने की वजह कर पर्दादारी अधिक न थी. घूंघट निकाले कई लड़कियां खड़ी थीं….. हमको पहचानते हो कलीम?….. नहीं, हम तो नहीं पहचान रहे हैं……. अरे कलीम! हम परशादी सुनार की बेटी हैं न ……… अच्छा हीरा रानी! सोना रानी !! रूपा रानी !!!….. हाँ… हाँ… हाँ… तीनो की आँखों में आंसू थे, होठों पर मुस्कुराहट, मानो ये ग़म और ख़ुशी का मेल था……

आँख में आंसू, तबस्सुम लब पे था अहबाब के
जब ख़ुशी के लिए मय ग़म की रागनी गाई गई

राम प्रसाद माली का जवान बेटा, जिसके साथ कभी कलीम पहलवानी का ज़ोर आज़माया करते थे, उसके बनाये हुवे गजरे को हाथ में और माले को गले में डाल कर कलीम इमामबाड़े के चबूतरे पर बड़े शान से बैठा करते थे, दौड़ा दौड़ा गया, और चंद मिनट में मिले जुले फूल का हार बना कर लाया, और बोला “आज हमरा हाथ से हार पहन ला कलीम बाबू”…. ज़रूर पहनेंगे राम किशन” लाओ गले में डाल दो… फिर उसने गले में हार डाल दिया… इधर हार गले में राम किशन ने डाला और उधर सुद्धू सुनार ने ज़ोर से नारा लगाया “कलीम भैया की जय”…….. सुद्धू सुनार को नाटक और ड्रामे का बहुत शौक़ था, बचपन में कलीम ने उसके तमाशे बहुत देखे थे, उसके जय के नारे पर तमाम बच्चों ने और जवां लड़के व लड़कीयों ने ज़ोर से ‘जय’ कहा……..

बड़ी देर से ख़ामोश खड़े थाने के सब इंस्पेक्टर कलीम के बग़ल में खड़े हो गए….. और बोले “कलीम साहब! और भाइयों और बहनो !! मैंने आज तक प्रेमभाव मुहब्बत का ये दृश्य नहीं देखा था…. आज ऐसा हो रहा है तो कल वैसा क्यूँ हुआ??…. कलीम ख़ामोश हो कर बैठ गए, उनकी आँखों से टप टप आंसू गिरने लगे….

मास्टर रमेश जो पास के हाई स्कूल में टीचर थे, बोल उठे, क्यूँ हुआ? ये न पूछिए दरोग़ा जी… वो तो होनी थी, हुई….. ये पूछिए, किसने किया?…? मै जानता हूँ दरोग़ा जी किसने किया, आप नहीं जानते……… आज भी वो आपके क़रीब हैं और हमारे क़रीब हैं, हम ही में हैं………. यहां पर नहीं हैं, लेकिन यहीं हैं……. उन्होने अपने जैसों को जमा किया, उनके जैसे बहुत मिल जाते हैं…. और बहुत मिल जाते हैं….. आज भी मिलते हैं और मिलते रहेंगे… लेकिन जैसे लोग यहां अभी जमा हैं, ऐसे बहुत कम हैं और बहुत कम मिलते हैं…… और आगे और भी बहुत कम होंगे…… और बहुत कम मिलेंगे….. और बडी मुश्किल से मिलेंगे…. और कम होते होते फिर बिल्कुल नहीं मिलेंगे…. और फिर….. इन चाँद सितारों को कोई देखने वाला नहीं रहेगा… और फिर ये चाँद सितारे भी नहीं होंगे…. बस रहे नाम भगवान का……….. ” और इसी के साथ सन्नाटा छा जाता है…

इधर कलीम को वापस पटना जाना था, उन्होंने 20-25 रूपये दरोग़ा जी को दिया के मिठाई मंगवा कर बच्चों में बंटवा दें.. मिठाई आई, बच्चों में बाँटी गई… कलीम अब वापस लौटने के लिए खड़े हुवे, तो राम खिलावन की बीवी और सोना रानी दो दो थाल लिए चली आई…… पानी पी लो कलीम जी! अरे ये क्या सोना रानी! ये पानी पिलाना है, या जान मारना है? ये थाल भर मिठाई? मैं तो बीमार हूँ सोना रानी! मुझसे तो नहीं खाया जाएगा.. ” तब राम खिलावन की बोली “न खाईवा तो जबरदस्ती ठूंस के खेलाइवो (न खाओगे तो ज़बरदस्ती ठूंस कर खिलाएंगे)……

थोड़ी देर रहने के बाद कलीम वापस पटना की तरफ़ निकल जाते हैं… उस साल के बाद हर साल अपने दिल की बैट्री को चार्ज करने कलीम अपने आबाई वतन “तिल्हाड़ा” जाया करते, पुरी बस्ती का तवाफ़ करते, और जितने गंजे ए शहीदां थे, उनके लिए फ़ातिहा पढ़ लेते……

ये पुकार सारे चमन में थी, वो सहर-हुई, वो सहर हुई..
मेरे आशियाँ से उठा धुआँ, तो मुझे भी इसकी ख़बर हुई।

8 नवंबर 1946 को आख़री बार तिल्हाड़ा उस समय गए थे, जब उन्हें 4 नवंबर को पता चला के एक दिन पहले से ही तिल्हाड़ा मुहासरे पर है, दंगाइयों की भीड़ मुस्लिम बस्ती को चुन चुन कर आग के हवाले कर रही है.. और लोगों को मार रही है…. तिल्हाड़ा में कलीम की माँ उम्मत फ़ातिमा और बहन बुन्नी सहित कई रिश्तेदरा थे…. 26 अक्तुबर को ख़ुद कलीम ने अपनी मां और बहन को पटना से तिल्हाड़ा भेजा था और 6 दिन बाद फ़साद की ख़बर आई….

हुआ कुछ यूँ था के 1943 में कलीम ने मेट्रिक बड़े अच्छे नंबर से पास कर लिया था, पर इसी बीच वालिद गुज़र गए, जिस वजह कर वो पटना कालेज में दाख़िला ले कर क्लास भी न कर सके, कुछ दिन बाद 1944 में कलीम के छोटे भाई अलीम अहमद बीमार पड़े, ढाई साल इलाज चला और सितम्बर 1946 में उनका इंतक़ाल हो गया… कलीम बहुत परेशान हो गए… मिजाज़ में चिड़चिड़ापन आ गया… सबको लेकर पटना में किराये के मकान में रहने लगे….

कलीम की माँ कलीम की हालत देख अपना ग़म भूल चुकी थीं, वो कलीम को समझाने बैठीं…. “अरे कलीम ये तुमको क्या हुआ जा रहा है?.. बाल बढ़े जा रहे हैं… कपड़े तेरे मैले रहते हैं.. हर दम ग़ुस्सा, हर दम चिड़चिड़… बेटा भाई का ग़म किसको नहीं होवे है, लेकिन ऐसा मत बन बेटा… अब तो सारा बोझ तुम्ही को लेना है बेटा…. मासूम बहन को देख… छोटे भाई को देख… हमको देख…. तुम्ही ऐसे रहोगे तो कैसे क्या होगा बेटा? हम तेरे बड़े भाई का घाव लिए बैठे हैं, तेरी बड़ी बहन को जीते जी गाड़ कर बैठे हैं, तेरे बाप को अल्लाह मियां के यहां भेज कर बैठे हैं,…. अब तो अलीम भी गया.. क्या तू भी जाना चाहे है? …… हमतो तोहको देख देख कर सुन हुवे जा रहे हैं… माँ बाप की दुहारी छोड़ पटना में बैठे हैं… देखो बेटा बक़रईद का दिन क़रीब आ रहे हैं, हमको घर जाना है… हम बक़रईद में कभी घर से बाहर नहीं रहे हैं, सबकी तरफ़ से क़ुर्बानी करनी है… तुम अपने को संभालो बेटा ताके हमको ढारस रहे”……..

माँ के वापस तिल्हाड़ा जाने की बात से कलीम घबरा गए, वो इस सोच में पड़ गये के माँ चली जाएंगी, बहन चली जाएगी तो पटना में वो कैसे रहेंगे?… आख़िर 26 अक्तुबर 1946 को 29 ज़ुल्क़दह था, इस के अगले दिन बेक़राईद की तारीख़ शुरू होने वाली थी, इसी रोज़ कलीम की मां और बहन वापस घर जाने को तैयार हो गईं… ये तारीख़ कलीम की ज़िन्दगी के लिए एक ऐतिहासिक दिन था, उस तारीख़ से आज तक कितनी तारीख़े आई और गुज़र गईं, आफ़ताब तुलू हुवे और ग़ुरूब हुवे, सुबह आईं और शाम हुईं, दिन आये और गुज़र गए, महीने आये और चले गए, साल बदले, मौसम बदले, ज़माने बदले और सदियाँ आयेंगी और गुज़र जाएंगी, लेकिन कलीम के दिल के कलेंडर पर ये तारीख़ हमेशा वैसी ही लटकी रहेंगी…..

छोटा भाई कमरे पर ही छोड़ 26 अक्तुबर की सुबह कलीम ख़ुद मां और बहन बुन्नी को ले कर नम आँखों के साथ पटना जंक्शन पहुंचते हैं, प्लेटफ़ार्म पर माँ और बहन दोनों ख़ुद को रोक न सके, बहन ज़ोर से रो पड़ी, तो माँ की आँखों से भी आंसू आ गए, जबकि बज़ाहिर रोने की कोई ख़ास वजह न थी. गाड़ी आई और रवाना हुई, दूर तक दोनों एक दूसरे को देखते रहे, माँ का चेहरा खिड़की से बाहर था, बहन दोनों हथेली पर टेके पुरी गर्दन निकाले कलीम की तरफ़ देख रही थी. वो दोनों रो रही थीं इसलिए के उन्हें फिर रोना नहीं था, कलीम ख़ामोश थे, इसलिए के उन्हें उम्र भर रोना था –

मेरे लिए क़ैद ए सहर ओ शाम नहीं है
रोता हूँ के रोने के सिवा काम नहीं है….

26 अक्तुबर को वो दोनों गई, और 28 को ख़बर मिली के छपरा में फ़साद हो गया है, फिर वहशतनाक ख़बरों का सिलसिला शुरू हुआ, फिर 4 नवंबर को कलीम ने ख़बर सुनी के तिल्हाड़ा पिछले एक दिन से महासरे पर है, लोग क़त्ल किये जा रहे हैं…. कलीम अपने 4-5 दोस्त के साथ लगातार मदद की गुहार लगाते रहे, यहाँ तक के 5 नवंबर हो गया, दोपहर गुज़र गया, बिना भूख प्यास की परवाह किये 5 की सुबह से ही वो लॉन (गांधी मैदान) के पास मौजूद डॉक्टर सय्यद महमूद की कोठी पर पहुँच कर उनसे मदद तलब की, सय्यद महमूद उस समय बिहार के गृहमंत्री थे, पर वो अपने दवात में मसरूफ़ थे, कलीम की कहां सुन रहे थे! उनके यहां मेहमान आ रहे थे, दावत चल रही थी, बिरयानी और मुर्ग़-मसल्लम के रौग़न को रुमाल में पोछा जा रहा था…… आख़िर दोपहर 3 बजे काफ़ी इल्तेजा करने के बाद आई.जी. से फ़ोन पर बात कर एक ट्रक और 6 मलेट्री वाले का इंतज़ाम हुआ, कलीम कोठी से निकल पर ट्रक पर सवार होने ही वाले थे के कुछ गाड़ी आ कर रुकी, उसमे से कुछ लोग उतरे… कलीम के एक साथी ने उनमे से एक शख़्स से मुख़ातिब हो कर पूछा “कहां से आ रहे हो महबूब साहब?” हमलोग तो तिल्हाड़ा जा रहे हैं, एक ट्रक और छ मलेट्री वालों का इंतज़ाम हुआ है…. ये सुनते ही महबूब साहब के मुंह से एक आह निकली “आह,… अब तिल्हाड़ा में क्या रखा है? वहीं से आ रहा हूँ, मेरा और मेरे साथियों के कपड़े देखो, ख़ून से सने लाशों को ठिकाना लगा कर आ रहा हूँ,…. बस्ती ख़त्म हो गई… तमाम मकान जल गए… सब लोग शहीद हो गए….. ” महबूब आज़ाद हिन्द फ़ौज के कर्नल महबूब अहमद थे.

ये सुनते ही कलीम बेहाल हो चुके थे, वो चीख़ते हुवे वापस कोठी की तरफ़ पलटे…. डॉक्टर साहब!.. डॉक्टर साहब!!.. डॉक्टर साहब!!!…. आइये….. अपने मेहमानों को भी साथ लाइए, उनके रुमाल का रौग़न देखा….. इनके दामनों का भी रौग़न देखिए….. कुछ और लोग भी दावत से आये हैं….. डॉक्टर साहब! इस दावत में शरीक न होने का आपको उम्र भर अफ़सोस रहेगा, क्या दस्तरख़्वान था डॉक्टर साहब….. इतना वसी दस्तरख़्वान कहां बिछ सकता है डॉक्टर साहब…. सैंकड़ों मुर्ग़-मसल्लम डॉक्टर साहब!… अरे डॉक्टर साहब आपकी अदाओं पर तो बारात की बारात क़ुर्बान हो गईं……

तेरा दर्द इतना बड़ा हादसा है
के हर हादसा भूल जाना पड़े है…

कलीम बदहवास थे, अगले दिन बचे खुचे ज़ख़्मी लोगों का क़ाफ़ला मलेट्री ट्रक से आया. चंद ज़ख़्मी बुज़ुर्ग और जवान, दो एक बच्चियां…. और लोग?….

महफ़िल महफ़िल ढूंढ रहे हैं टूटे हुवे पैमाने हम

कलीम अस्पताल में मारे मारे फिरते रहे, ज़ख़्मीयों को देखते रहे, दौड़ते रहे… आवाज़ देते रहे………. “अम्माँ !…. अम्माँ !!.. बुन्नी !…… रशीदह!!” कहीं कहीं कोई पहचानी सूरत नज़र आ जाती….. “कौन दरगाहन ख़ाला?”…… ख़ून से नहाई हुईं… “हाँ कलीम मैं हूँ”… “और हुस्ना ख़ाला?.. चंदा नानी?… क़सीमन नानी?…. और बताओ दरगाहन ख़ाला… मेरी अम्माँ? …. और बुन्नी?…. रशीदह?….. कोई नहीं?…. कोई नहीं?….. कोई नहीं?”….

कलीम बेहोश हो चुके थे, उन्हें अस्पताल से घर पहुंचा दिया गया, वो दो दिन तक लगातार बेहोश रहे, तीसरे दिन अपने रिश्तेदार के साथ एक ट्रक पर सवार हो कर कुछ मद्रासी के साथ तिल्हाड़ा गये.

कलेजा थाम लो, रुदाद ए ग़म हमको सुनाने दो,
तुम्हे दुखा हुआ दिल हम दिखाते हैं, दिखाने दो।

दूर से ही जामा मस्जिद की बुलंदी दिख रही थी, मस्जिद का अंदाज़ एक थके हुवे ज़ख़्मों से चूर झूमते हुवे मुजाहिद का सा था, जंग में सीना सिपर हो कर लड़ा हुआ मुजाहिद, साथियों की लाशों के दरमियान तलवार टेके, गिर कर मरने पर आमादा नहीं…. मस्जिद का दरवाज़ा सीने की ज़ख़्म की तरह खुला हुआ था. उसके दरो दीवार से वो तमाम निशानियाँ व अलामत नज़र आ रहे थे, जो 3 दिन तक बस्ती में चला….. कलीम मस्जिद की ज़ियारत करने के बाद संभल संभल कर आगे बढ़ रहे थे, कई दर्जन शहीदों के ख़ून का निशान देखते हुवे आगे बढ़ते रहे, हर जगह तबाही का मंज़र था, कलीम आगे बढ़ रहे थे, रिश्तेदार के जले हुवे मकान देखते हुवे, उन तमाम निशानियों को देखते हुवे जिसे बक़रईद की वजह कर सजाया गया था, मस्जिद, ईदगाह और इमामबाड़े होते हुवे उस मकान के पास पहुंचे जो 3 नवंबर से 3 दिन तक कर्बला बना हुआ था, ये वो मकान था जहां बस्ती की तमाम जवां, बूढ़ी औरतें तीन दिन तक बे आब ओ दाना जमा हुईं थीं, ये ज़िलहिज्जा के अशरे अव्वल का आख़री तीन दिन था. आख़िर में महाज़ टूट गया, शहीद हुवे लोग तलवार से ऐसे गले मिले थे जैसे कोई महबूब से मिलता हो :-

लिपट लिपट के गले मिल रहे थे खंजर से
बड़े ग़ज़ब का कलेजा था मरने वालों का…

अपनी आबरू बचाने को औरतों ने अपनी जान दे दी थी, कुएँ में छलांग लगा दिया था. कलीम आगे बढ़ रहे थे, उस कुएँ की तरफ़; जहां उन्हें पर्दे की ज़रूरत नहीं थी, वो उनके लिए महरम थे…. किनके लिए..? वही जिनको कलीम पुकारते थे, “अम्माँ !… बुन्नी !… रशीदह!…” “तुम कहाँ बैठी हो अम्माँ” “!…. आगे बढ़ कर आवाज़ दी “तुम कहाँ हो अम्माँ “!.. बन्नी कहाँ हो?… रशीदह कहां हो? … उधर से आवाज़ आती है “मै यहां हूँ बेटा “… “मै यहां हूँ भैया…. हमलोग यहीं हैं बेटा…. क़ुरान पढ़ रही हूँ बेटा “…. “हम अम्मा के गले से लिपटे हुवे हैं भैया”…. “बेटा तुम्हे याद है?….. तुम इंट्रेंस का इम्तेहान देने वाले थे. पटना में पढ़ रहे थे, तुम्हारा टेस्ट होने वाला था. मुझे टाइफ़ाइड हो गया था…. घर में सिर्फ़ मै थी और यही तिम्हारी बुन्नी, और एक मामू, एक माह टाइफ़ाइड में रही लेकिन तुम्हे ख़बर नहीं दी. बुन्नी से ख़ैरयत लिखवा दिया करती थी, न जाने तुम्हें कैसे ख़बर हो गई. तुम रातो रात पटना से तिल्हाड़ा आये. 2 बजे रात में तुम पुकार रहे थे. मै अच्छी हो चुकी थी मगर कमज़ोर थी. मामू ने दरवाज़ा खोला. तुम आ कर लिपट गए….. अम्माँ मुझे ख़ैरयत न दी? ……. मैंने कहा बेटा तू पढ़ने मे मशग़ूल था, तुझे क्यूँ परेशान करती….. मर भी जाती तो कोई बात न थी, तुम आ कर मिट्टी तो दे ही देते…… बेटा अल्लाह ने मेरी बात सच कर दी और तुम्हें भी भेज दिया…… बेटा दो मुठ्ठी ख़ाक उठाओ और कुएँ में डाल दो; तुम्हारा भी अरमान निकल जाए…. बेटा तुम इस तमन्ना में थे के अपनी बुन्नी को दुल्हन बनाओगे, लेकिन बेटा फिर मै अकेली हो जाती….. तुम्हारी नन्ही बुन्नी मेरे कलेजे से लगी हुई है. तीन दिन कलेजे से लगी रही और कलेजे से लगी चली आई…… तीन दिन तक हम तुम्हें याद करते रहे और दुआ करते रहे के कहीं तुम न आ जाओ – तुम आ जाते तो मरना भी दूभर हो जाता ….. अब तुम आ गए तो जी चाहता है छिदे हुवे सीने और कटी हुई गर्दन के साथ उठ कर तुम्हें सीने से लगा लूँ….. लेकिन ये आदाब ए फ़ना के ख़िलाफ़ है…… जाओ बेटा, मै तुमसे दूर नहीं रहूंगी, ज़िन्दगी में जितना क़रीब थी, मर कर उससे क़रीब हो गईं हूँ… मै तुम्हारे ख़्यालो में रहूंगी, निगाहों में रहूंगी. मेरे ख़्याल, मेरी याद से तुम्हारे दिल की भट्ठी गर्म रहेगी, तुम्हारी आँखें सीराब रहेंगी, तुम्हारी ज़ुबान ख़ुशगुफ़्तार रहेगी….. तुम कम सुख़न थे, अब सुख़नवर हो जाओगे. मै तुम्हारी ज़ुबान से बोलूंगी, तुम अपने अल्फ़ाज़ में मेरी आवाज़ सुन लेना. मै तुम्हारे अशआर में अपनी पुकार सुन लुंगी…. अगर मै तुम्हारे सामने मर जाती और तुम मुझे दफ़न कर देते तो तुम्हारी मुहब्बत का बड़ा हिस्सा दफ़न हो जाता…. लेकिन मै तुम्हारे दिल के अंदर ज़िंदा हूँ…. तुम्हारे जज़्बात में एक लामहदूद ख़ज़ाना बन कर छुप गईं हूँ….. तुम इस ख़ज़ाने से ढेर के ढेर लुटाते रहोगे और मै इज़ाफ़ा करती रहूंगी….. मेरी ख़ाक इस कुएँ में तुम्हारी आवाज़ सुनते रहेगी…….”

वो जो शायरी का सबब हुआ

और यहीं से शुरू होता है –

“वो जो शायरी का सबब हुआ, वो मामला भी अजब हुआ
मैं ग़ज़ल सुनाऊं हूँ इसलिए के ज़माना उस को भुला न दे….”

ये कहानी किसी आम आदमी की नहीं है, बल्कि भारत के मशहूर शायर कलीम अहमद ‘आजिज़’ की आप बीती है, जिसका ज़िक्र उन्होंने आपनी किताब “वो जो शायरी का सबब हुआ” में किया है, इस किताब के लिए भारत सरकार ने कलीम को पद्मश्री से नवाज़ा था.