ध्रुव गुप्त

बीसवी सदी के महानतम शायरों में एक कैफ़ी आज़मी को आधुनिक उर्दू शायरी का बादशाह कहा गया है। वे अपने आप में यक व्यक्ति न होकर एक पूरा युग थे जिनकी रचनाओं में उनका समय एक साथ अपनी तमाम खूबसूरती और कुरूपताओं के साथ बोलता नज़र आता है।

एक तरफ उन्होंने आम आदमी के दुख-दर्द और संघर्षों को शब्दों में जीवंत किया तो दूसरी तरफ सौंदर्य और प्रेम की नाज़ुक संवेदनाओं को ऐसी बारीक अभिव्यक्ति दी कि पढ़ने-सुनने वालों के मुंह से बरबस आह निकल जाय। उनकी शायरी में अभिव्यक्ति के इन दो छोरों के बीच इतना खूबसूरत सामंजस्य मुग्ध भी करता है और चकित भी।

1936 में कैफ़ी साहब साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित हुए जहां उन्हें तमाम धार्मिक रूढि़वादिताओं का हल मिला और जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण भी। यहीं से उनकी शायरी सामाजिक सरोकारों से जुडी। 1943 में साम्यवादी दल के मुंबई कार्यालय के प्रभार और उर्दू पत्रिका ‘मजदूर मोहल्ला’के संपादन के दौरान उनकी मुलाक़ात शौकत जी से हुई हुई। साहित्यिक संस्कारों वाली शौकत कैफी साहब की लेखनी की मुरीद थी। 1947 में दोनों विवाह बंधन में बंधे। उनके गहरे प्रेम और सफल दाम्पत्य की मिसालें आजतक दी जाती है। महान अभिनेत्री शबाना आज़मी और बाबा आज़मी उनकी संतानें थीं। का जन्म हुआ।

कैफ़ी साहब साहिर लुधियानवी और शकील बदायूनी की तरह उन गिने-चुने शायरों में थे जिन्हें अदब के साथ फिल्मों में भी अपार सफलता और शोहरत मिली।

1951 में फिल्म ‘बुज़दिल’ के लिए उन्होंने पहला गीत लिखा- ‘रोते-रोते गुज़र गई रात’। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है। उनके लिखे सैकड़ों फ़िल्मी गीत आज हमारी अनमोल संगीत धरोहर का हिस्सा हैं। गीतकार के रूप में उनकी प्रमुख फ़िल्में हैं – शमा, गरम हवा, शोला और शबनम, कागज़ के फूल, आख़िरी ख़त, हकीकत, रज़िया सुल्तान, नौनिहाल, सात हिंदुस्तानी, अनुपमा, कोहरा, हिंदुस्तान की क़सम, पाक़ीज़ा, उसकी कहानी, सत्यकाम, हीर रांझा, हंसते ज़ख्म, अनोखी रात, बावर्ची, अर्थ, फिर तेरी कहानी याद आई।

इतनी सफलता के बावज़ूद हिंदी फ़िल्मी गीतों के बारे में उनका अनुभव यह था – ‘फ़िल्मों में गाने लिखना एक अजीब ही चीज थी। आम तौर पर पहले ट्यून बनती थी, फिर उसमें शब्द पिरोए जाते थे। ठीक ऐसे कि पहले आपने क़ब्र खोद ली, फिर उसमें मुर्दे को फिट करने की कोशिश की। कभी मुर्दे का पैर बाहर रहता था, कभी हाथ। मेरे बारे में फ़िल्मकारों को यकीन हो गया कि मैं मुर्दे ठीक गाड़ लेता हूं, इसलिए मुझे काम मिलने लगा।’

उन्होंने फिल्म हीर रांझा, गरम हवा और मंथन के लिए संवाद भी लिखे थे। इस विलक्षण शायर और गीतकार की पुण्यतिथि (10 मई) पर हमारी हार्दिक श्रधांजलि, उनकी एक ग़ज़ल के साथ !

मैं ढूंढता हूं जिसे वह जहां नहीं मिलता
नयी ज़मीन नया आसमां नहीं मिलता

वो तेग मिल गई जिससे हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशां नहीं मिलता

वह मेरा गांव है, वो मेरे गांव के चूल्हे
कि जिनमें शोले तो शोले धुआं नहीं मिलता

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यों
यहां तो कोई मेरा हमज़बां नहीं मिलता

खड़ा हूं कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहां नहीं मिलता

लेखक पुर्व आईपीएस हैं।