दलितों, पिछड़ों और वंचितों के मसीहा कहे जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी, बिहार के अभूतपूर्व मुख्यमंत्री और बिहार में समाजवाद के सबसे मजबूत स्तम्भ जननायक स्व. कर्पूरी ठाकुर ने अपना तमाम जीवन सदियों से दबे-कुचले वर्गो में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जगाने और उन्हें ताकत देने में लगा दी। बगैर किसी तामझाम और प्रचार के उन्होंने बिहार की राजनीति में पारदर्शिता, ईमानदारी और जन-भागीदारी के जो प्रतिमान गढ़े, उनके आसपास भी पहुंचना उनके बाद के किसी राजनेता के लिए संभव नहीं हुआ। एक गरीब नाई परिवार से आए कर्पूरी जी सत्ता के तमाम प्रलोभन के बीच भी जीवन भर सादगी, सरलता और निश्छलता की प्रतिमूर्ति बने रहे।

ईमानदारी ऐसी कि अपने दो बार के लंबे मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल कभी अपने व्यक्तिगत कार्यों के लिए नहीं किया। उनके परवर्ती मुख्यमंत्रियों के घरों में कीमती गाड़ियों का काफ़िला देखने के आदी लोगों को शायद विश्वास नहीं होगा कि कर्पूरी जी ने अपने परिवार के लोगों को कभी सरकारी गाडी के इस्तेमाल की इज़ाज़त नहीं दी। एक बार तो उन्होंने अपनी बेहद बीमार पत्नी को रिक्शे से अस्पताल भेजा था। राजनीतिक मूल्य, निष्ठा, शुचिता एवं सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के अकाल के इस समय में कर्पूरी जी पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक दिखने लगे हैं। ‘गुदड़ी के लाल’ और ‘बिहार के भूमिपुत्र’ कर्पूरी जी की पुण्यतिथि (17 फ़रवरी ) पर नमन !

ध्रुव गुप्त : लेखक पुर्व आईपीएस पदाधिकारी है।