‘शब्बीर हसन जोश’ या ‘जोश मलीहाबादी’ को शायर-ए-इंक़लाब भी कहा जाता है. तरक़्क़ीपसंद तहरीक और मार्क्सवाद से प्रभावित जोश ने न सिर्फ़ अपने नाम के अनुकूल जोश से भरी इंक़लाब की नज़्में और शायरी लिखीं बल्कि भारत की आज़ादी के आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत भी किया था. अपने काम और नारे के बारे में ख़ुद जोश लिखते हैं-

काम है मेरा तग़य्युर है मेरा शबाब
मेरा नारा ‘इंक़िलाब -इंक़िलाबो इंक़िलाब’

शब्बीर हसन ख़ान  मलीहाबादी 5 दिसम्बर सन् 1894 को मलीहाबाद (लखनऊ) में पैदा हुए। शब्बीर हसन ख़ान ने शांति-निकेतन से तालीम हासिल कर; आगे की पढ़ाई के लिए आगरा गए। लेकिन वालिद के इंतक़ाल की वजह से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आपको लखनऊ आना पड़ा। फिर लखनऊ में ही रहकर आपने उर्दू, फ़ारसी और अरबी की तालीम हासिल की।

शब्बीर हसन ख़ान शुरू से ही शेरो-शायरी में दिलचस्पी रखते थे और बाद में अपने तख़ल्लुस जोश मलीहाबादी के नाम से मशहूर हुए।

उन्होंने अपनी शायरी को वहीदुद्दीन सलीम पानीपती के ज़ेरेनिगरां एक नया अंदाज़ दिया। जोश ने इस नये अंदाज़ की शायरी से अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ जो माहौल पैदा किया और जिस अंदाज़ में वह हमलावर रहे, वह जंगे-आज़ादी के दीवानों की खास पसंद बन गयी। उनकी शायरी ने उन्हें क्रांतिकारी शायर के नाम से मशहूर किया।

सन् 1920 में उनकी पहली किताब रूहे-अदब के नाम से शाया हुई। उसके बाद तो सन् 1956 तक उनकी 27 किताबें शाया हुई और सभी ने मक़बूलियत हासिल की।

सन् 1924 से 1934 तक आप निज़ाम-हैदराबाद के यहां ट्रांसलेटर की नौकरी करते रहे लेकिन निज़ाम के अंग्रेज़ों से दोस्ती की बिना पर आपने नौकरी छोड़ दी। बाद में आपने सन् 1935 में उर्दू की एक मैग़ज़ीन कलीम के नाम से शुरू की, जिसके ज़रिये भी जंगे-आज़ादी की आवाज़ बुलन्द करते रहे।
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ उनकी शायरी और उनके मज़मून मुल्क के नौजवानों को ही नहीं, बल्कि बुज़्ाुर्गों को भी बहुत पसन्द थे।
आपने हिन्दी फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। जोश साहब पाकिस्तान बनने के बहुत मुख़ालिफ थे। उनकी ग़ज़लों में मुल्क़ के इत्तहाद की बात पर बहुत ज़ोर रहता था।

पाकिस्तान बनने के वक़्त उनके बहुत से दोस्तों ने पाकिस्तान जाने के लिए ज़िद की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। आज़ादी के बाद आप सन् 1948 से सन् 1955 तक हिन्दुस्तान गवर्नमेंट की उर्दू मैग़ज़ीन आजकल डेली अख़बार के एडिटर रहे। सन् 1955 में उन्होंने उस वक़्त की मौजूदा सरकार से उर्दू की तरक़्की के लिए कुछ तज़ावीज़ रखी, जिसे हुकूमते-हिन्द ने नहीं माना। इसी बात से नाराज़ होकर आप सन् 1956 मंे पाकिस्तान चले गये और वहां भी आपने उर्दू के लिए जद्दोजहद की।

मगर उनका मन वहां भी नहीं लगा। वहां की मुक़ामी सियासत उन्हें रास नहीं आयी और वहीं तन्हाई-पसन्द हो गये, सिर्फ़ मुशायरों में जाते थे, बाक़ी सोशल ज़िन्दगी से कटकर रहे। बीमारी की वजह से 22 फ़रवरी सन् 1982 को आपका इंतक़ाल हो गया।