मौलाना मोहम्मद अली जौहर 10 दिसम्बर, 1878 को रामपुर में एक महान मां के घर पैदा हुए जो पुरे हिन्दुस्तान में बी अम्मा के नाम से मशहूर हैं। वे उर्दू और इंग्लिश मे समाचार पत्र ‘हमदर्द’ और ‘कॉमरेड’ के संस्थापक व संपादक थे। वेैं मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। वे भारत की आज़ादी और खिलाफ़त आंदोलन की मशाल वाहक व कट्टर समर्थक थे। 1920 में खिलाफ़त आंदोलन के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया। 1920 मेें उन्होंने अलीगढ़ मेंं ‘जामिया मिलिया इस्लामिया’ की स्थापना की जिसे बाद में दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया।

हिन्दुस्तान की जंग ए आज़ादी के अज़ीम रहनुमा मौलाना शौकत अली हैं इस जगह दफ़न

मौलाना मुहम्मद अली जौहर का मानना था :- जहां तक ख़ुदा के एहकाम का तआल्लुक़ है, मैं पहले मुसलमान हूं, बाद में मुसलमान हूं, आख़िर में मुसलमान हूं – लेकिन जब हिंदुस्तान की आज़ादी का मसला आता है, तो मैं पहले हिंदुस्तानी हूं, बाद में हिंदुस्तानी हूँ, आख़िर में हिंदुस्तानी हुँ।

जिनके बारे में कामरान इब्राहीमी लिखते हैं मौलाना मुहम्मद अली जौहर मशरिक(पूरब ) की जमीन में पैदा हुए , लेकिन मग़रिब(पश्चिम) की आब व हवा से आपकी परवरिश हुई, मशरिक की मिट्टी में अपनी ज़िंदगी को परवान चढ़ाया लेकिन मग़रिब के हथियार से अपने जिस्म को सजाया, उन का दिमाग मग़रिबी था मगर दिल मशरिकी था , वो मशरिक की हिमायत मे बारहा मग़रिब के हथियार का इस्तेमाल करता रहे। वो मशरिक के आफ़ताब(सूरज) थे, ये आफ़ताब भी अगर मशरिक मे तुलु(उदय) होकर मग़रिब में डूबा तो दुनिया का कोई नया वाक़िया नही हुआ इस लिए हक़ था मशरिक और मग़रिब के बीच ओ बीच बैतुल मक़द्दस ही आख़िरी आरामगाह बने, ऐ मशरिक व मगरिब के मालिक अपनी रजामंदी के फुल से इस आफताब का दामन भर दे।

उन्होंने अंग्रेज़ों से लड़ने और हिन्दू-मुस्लिम एकता क़ायम करने के लिए रातों की नींद और दिन का चैन न्योछावर कर दिया था, अंग्रेज़ शासकों के ज़ुल्म सहे थे, जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेलों में गुज़ारा था।

मौलाना मुहम्मद अली की वफ़ात लंदन में उस वक्त हुई जब वो पहली गोलमेज़ कांफ़्रेंस में शामिल होने के लिये गये थे। जब वो हिंदुस्तान से गये तो डायाबिटीस ( शुगर) की बिमारी में मुब्तला थे। हिन्दुस्तान में तहरीक ए आज़ादी के सिलसिले में एक अप्रील 1930 से सिवील नाफ़रमानी ज़ोरो पर थी और तक़रीबन एक लाख लोग जेलो में क़ैद हो चुके थे कि अचानक सितम्बर 1930 में वाइसरॉय ए हिन्द ने 86 नुमाइंदो को लंदन में होने वाली इंडियन राउंड टेबल कांफ़्रेंस में शामिल होने के लिये बुलाया। उन में 57 एैंग्लो इंडियन, 16 रियासती हिंद और 13 हिन्दुस्तानी सियासी जमातो के नुमाइंदे थे।

ये कांफ़्रेंस नाकाम रही और बिना किसी नतीजे पर ख़त्म हुई तो वजीर ए आज़म नें ये कह कर सब नुमाइंदो को टालना चाहा कि आप हिंदुस्तान वापस जाये और अपने बीच में चर्चा करें और एक ऐसा हल तलाश करें जो सब के लिये क़ाबिल ए क़बूल हो। उस वक्त मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने कांफ़्रेंस मे ऐसी तकरीर की थी जिस में उन्होने बिल्कुल साफ़ लफ़्ज़ों में अपने मुल्क की सियासी जमातो को भी और हूकुमत को भी खरी खरी बातें सुनाइ थी और उन पर आज़ादाना नुक्ताचीनी की थी उनकी सब तक़रीरों में ये तक़रीर हमेंशा के लिये यादगार रहेगी जिस के बाद हिन्दुस्तान का ये ग़मख़्वार और तक़रीर, तहरीर का बादशाह हमेंशा के लिये ख़ामोश हो गया।

आज़ादी का परवाना लेने के लिए वह बीमारी की हालत में स्ट्रेचर पर लेट कर 1930 में गोल मेज़ कांफ़्रेंस में भाग लेने लंदन पहुंचे मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने उस समय अपने भाषण में कहा था – ”मेरे मुल्क को आज़ादी दो या मेरे कब्र के लिए मुझे दो गज जगह दे दो क्योंकि यहां मै अपने मुल्क की आज़ादी लेने आया हुं और उसे लिए बिना वापस नही जाऊंगा”, वह किसी गुलाम देश में मरना नहीं चाहते थे। उनके इस बयान ने आज़ादी के मतवालों के अंदर और जोश भर दिया था। इतिहास गवाह है कि उन्होंने अपना वचन पूरा करके दिखा दिया। आख़िर लंदन में 4 जनवरी 1931 को उनका इंतक़ाल हो गया।

उनके इंतक़ाल पर ना सिर्फ़ इंग्लैंड और हिंदुस्तान में उन के बेशुमार चाहने वालो और दोस्तो को सदमा पंहुचा बल्कि दुसरे मुल्को में भी जहां उनका नाम पहुंच चुका था वहां भी इज़हारे रंज और अफ़सोस हुआ। इंग्लेंड में उनके जो मुसलमान और गैर मुसलमान दोस्त थे उनकी चाहत थी के मौलाना जौहर को यहीं दफ़न किया जाए. हिंदुस्तान में उनके जो रिश्तेदार और दोस्त थे उनका वहां तार गया कि उन्हे वतन रामपुर और उनके बुजुर्गो के कब्रस्तान में दफ़न किया जाए. मगर उनके नसीब में ये बात थी कि वो बैतल मुकद्दस में आखरी नींद सोेए।

इत्तिफ़ाक़ ये हुवा कि आलम ए इस्लाम की एक मुमताज़ हस्ती और फ़लस्तीन के मशहुर रहनुमा अल्हाज मुफ़्ती अमीन अल हुसैनी के दिल में ये ख़्याल पैदा हुवा कि वो मौलाना जौहर के रिश्तेदारो को ये मशवरा दें कि वो उनका जनाज़ा बैतुल मुक़द्दस लाएं और मुबारक जमीन में उनकी कबर बने। मुफ़्ती साहब ने इस तरह का तार मौलाना शौकत अली को भेजा और उनको जानकारी दी कि मस्जिद ए अक़्सा की चार दिवारी के अंदर एक कमरा उनकी क़बर के लिये उनके एक गुमनाम चाहने वाले ने पेश किया है। इस ख़बर ने उन सब चर्चाओ का ख़ात्मा कर दिया जो मौलाना जौहर की तदफ़ीन के लिए हो रही थी। उनके रिश्तेदार भी राज़ी हो गए और इंग्लैंड वालों को भी ख़ामोश होना पड़ा। उनके जनाज़े को एहतेयात के साथ फ़लस्तीन पहुंचाने का इंतिजाम किया गया और उनकी लाश समुंदरी जहाज़ पर अपनी मंज़िल ए मक़सूद की तरफ़ रवाना हो गइ।

समुंद्री जहाज़ SS Narkunda की मदद से जनवरी 1931 को मौलाना शौकत अली जैसे ही अपने छोटे भाई मौलाना मुहम्मद अली जौहर के जनाज़े को लेकर इंगलैंड से पॉर्ट सईद (मिस्र) पहुंचे तो मिस्र के बेशुमार मुसलमान उनके इस्तक़बाल और उनके हक़ में दुआ ए ख़ैर करने के लिए मौजुद था और उनमें से बहुत सारे लोग जनाज़े के साथ बैतुल मुक़द्दस को रवाना हुए। जब ये सारी जमात बैतुल मुक़द्दस पहुंची तो एक बहुत बड़ी भीड़ फ़लस्तीनी मुसलमानो की वहां जनाज़े में शरीक होने के लिये मौजुद थी जो तक़रीबन दो लाख से उपर बयान की जाती है।

वो 5 रमज़ान का दिन था जब अज़ीम फ़लस्तीनी रहनुमा मुफ़्ती हाजी अमीन ने नमाज़ ए जनाज़ा पढ़ाया और फिर मौलाना मोहम्मद अली जौहर को मस्जिद ए अक़सा के आहते मे दफ़नाया गया; और यहां दफ़न होने वाले एकलौते ग़ैर-अरब और हिन्दुस्तानी बने। अरब दुनिया उन्हे “ज़रीह उल मुजाहिद उल अज़ीम मौलाना मुहम्मद अली अल हिन्दी” के नाम से जानती है।

मौलाना मोहम्मद अली जौहर को मस्जिद ए अक़सा (बैतुल मुक़द्दस) के आहते मे दफ़नाने का एक मक़सद था के किसी भी तरह हिन्दुस्तान के मुसलमान को येरुशलम से जोड़ा जाए वो भी मज़हबी एतबार से , जिस तरह वो मक्का व मदीना से मुहब्बत करते हैं वैसा ही येरुशलम से करने लगे।