माजिद मजाज़

अल्लामा इक़बाल ने कभी एक आज़ाद मुस्लिम मुल्क की वकालत नहीं की थी और न ही इसे सही माना था। इक़बाल ने भारतीय गणराज्य के भीतर ही एक मुस्लिम राज्य की बात की थी। यही बात लाला लाजपत राय ने अपने कई लेखों में भारतीय गणराज्य के भीतर एक मुस्लिम राज्य बनाने की भरपूर वकालत करके की थी, लाला लाजपत राय ने उत्तर पश्चिम में एक मुस्लिम राज्य बनाने की बात की जो कि इक़बाल का भी यही कहना था। पर क्या किसी ने लाला लाजपत राय की देशभक्ति को लेकर कभी सवाल खड़ा किया? फिर इक़बाल के साथ ऐसा क्यों हुआ?

जिस सन 1930 के मुस्लिम लीग के इलाहबाद कांफ्रेंस को लेकर लोग विवाद खड़ा करते हैं उसमें तो इक़बाल की मुख्य नाराज़गी कांग्रेस की अल्पसंख्यकों के प्रति धोखाधड़ी को लेकर थी। वो भारत में एक मुस्लिम राज्य बनने की बात किए थे, भारत से निकलकर एक अलग देश बनाने की वकालत तो नहीं की थी।

अपनी किताब ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ में जवाहर लाल नेहरु ने अल्लामा इक़बाल की इंतक़ाल से कुछ दिन पहले अल्लामा के घर जाकर की गई मुलाक़ात का ज़िक्र किया है, चचा नेहरु लिखते हैं कि इक़बाल एक सच्चे देशभक्त थे। अब 1930 में इक़बाल गलत थे तो नेहरू की नज़र में आठ साल बाद भी इक़बाल कैसे सच्चे भारतीय दिख रहे थे?

वो इक़बाल जो राम को इमाम ए हिंद का लक़ब देता है, नानक पर शेर लिखता है, तमाम धर्मों को अपनी शायरी में जगह देता है, यहाँ तक की लेनिन तक पे शायरी करते हैं। तराना ए हिंदी “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा” लिखते हैं जिससे अच्छा तराना कभी हो ही नहीं सकता। पर जैसे ही इस्लामिक तहज़ीब और इसकी विरासत को अपनी ग़ज़लों में जगह देते हैं तुरंत वो कट्टर और गलत हो जाते हैं? ऐसे कैसे?

जब ग़दर पार्टी के संस्थापक लाला हरदयाल के कहने पर अल्लामा इक़बाल ने तरन्नुम में सुनाई “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा”

जिस इक़बाल को पूरी दुनिया अदब की निगाह से देखती है उन्हीं इक़बाल के साथ बतौर एक राष्ट्र हमने क्या किया? हमने तो उन्हें पाकिस्तानी बताकर उन्हें भुला दिया। अब पाकिस्तान ने उन्हें अपना आइकन मान लिया, उनको अपना वैचारिक राष्ट्रनिर्माता मानता है तो इसमें इक़बाल की क्या ग़लती? ग़लती तो इस राष्ट्र की है जो अपने इस अनमोल धरोहर को छोड़ दिया।

महात्मा गांधी से हमारी आपकी कई वैचारिक असहमति है, पर क्या कल को कोई देश इनको गलत तरीक़े से कोट करके अपना बना ले तो क्या हम बापू को छोड़ देंगे? अगर बापू को नहीं छोड़ा हमने तो इक़बाल को कैसे भुला दिया?

जिस इक़बाल की यौम ए पैदाईश पर जर्मनी इंग्लैंड अमेरिका फ़्रांस कनाडा से लेकर दुनिया के कई मुल्कों में प्रोग्राम होता है पर उसी इक़बाल के मुल्क जिसके लिए इक़बाल ने कहा था कि “रिफ़त है जिस ज़मीं की बाम-इ-फ़लक का ज़ीना, जन्नत की ज़िन्दगी है जिस की फ़ज़ा में जीना” उसी मुल्क में इनकी यौम ए पैदाईश पर सन्नाटा है, लोग ख़ामोश क्यों हैं?