क्यों झूठ बोलते हैं इतिहासकार ? पढ़िए क्या कहते थे इब्न-ख़ल्दून

इब्न-ख़ल्दून की पुस्तक ‘अल मुक़दमा’ से लिया गया एक अंश

इतिहास का अध्यन करते और उसपर लिखते समय उसमें कुछ असत्य/झूठ स्वाभाविक रूप से दाख़िल हो जाते हैं। इससे पार न पा सकने के अनेक कारण हैं। इसमें से एक इतिहासकार का किसी विचारधारा अथवा मत की ओर पक्षपातपूर्ण होना है। यदि इतिहासकार पूर्णतया निष्पक्ष हो तभी वह प्राप्त होने वाले तथ्यों की भली भांति जांच पड़ताल कर सकता है और सत्य एवं असत्य का पता लगा सकता है। परंतु यदि इतिहासकार किसी एक मत अथवा विचारधारा का पक्षधर हो या किसी का विरोधी हो  किसी भी तथ्य को सत्य मान लेगा जो उसकी विचारधारा से मेल खाता हो। पूर्वधारणा एवं पक्षपात इतिहासकार की समझ बूझ एवं परखने की शक्ति को नष्ट कर देते हैं। नतीजा ये होता है कि वे झूठ को सच मान कर लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं। 

 इतिहास से झूठ को अलग न कर पाने का एक अन्य कारण साक्ष्यों/गवाहों पर भरोसा करना है। यहां पर जिस मनुष्य से जानकारी आ रही है उसके चरित्र की समीक्षा आवश्यक हो जाती है। 

  एक अन्य कारण है किसी घटना के घटित होने के कारणों का सही से न पता होना। कई बार जानकारी को इतिहासकार तक लाने वाले व्यक्ति को स्वयं  ही न तो उस घटना की महत्ता का अंदाज़ा होता है और न उसके सही कारण का जिसका वह वर्णन कर रहा होता है। वह जानकारी उस परिपेक्ष में देता है जो कि वह उस घटना के बारे में मानता है। ऐसे में जानकारी का ग़लत होना स्वाभाविक हो जाता है। 

 एक और कारण किसी भी जानकारी को सत्य मान लेना होता है। ये आमतौर पर तब होता है जब इतिहासकार किसी साक्ष्य की बात को सत्य ही मानने लगता है।

 

एक और कारण है कि आमतौर पर हम असलियत और जो हमें महसूस देता है उसमें अंतर नहीं कर पाते। जो हम देखते, सुनते या महसूस करते हैं वे बहुत से कृत्रिम कारणों से सच नहीं होते। हम तक किसी तथ्य को पहुँचाने वाला वो वर्णन पहुँचाता है जो कि उसे दिखाई देता है लेकिन कई बार वो स्वयं ही सत्य से दूर होता है। 

 एक अन्य कारण ये है कि आमतौर पर हम किसी ऊंचे पद पर विराजमान अथवा मशहूर व्यक्ति की तारीफ़ ही करते हैं। ऐसे में उनकी बुराइयां छुपा दी जाती हैं और उनके मान सम्मान को ही हम तक पहुंचाया जाता है। ऐसे में सार्वजनिक जानकारी के असत्य होने की संभावना बढ़ जाती है। मनुष्य अपनी तारीफ़ का भूखा होता है और इस दुनिया में अपनी तारीफ़ सुनना और दौलत हासिल करना ही उसका मक़सद होता है। ऐसे में न तो उन्हें किसी के गुणों से मतलब है और न ख़ुद अपने ही गुणों से। 

 एक और कारण, जो कि सबसे महत्वपूर्ण भी है जिससे झूठ से बचना असंभव हो जाता है – वो है सामाजिक परिस्तिथियों का सही ज्ञान न होना। प्रत्येक घटना चाहे वह किसी कारणवश हुई हो अथवा उसके फलस्वरूप कोई और घटना हुई हो अपने आप में बिलकुल अनूठी होती है और उसके होने के कारण भी पुरे तौर पर अनूठे (सब से अलग) होते हैं। यदि इतिहासकार को किसी भी घटना के कारण, स्वभाव एवं उसकी समाजिक ज़रूरत का सही ज्ञान हो तभी वह इतिहास में सच और झूठ का भेद करते हुए आलोचनात्मक रूप से इतिहास को लिख सकता है। बाक़ी सभी बातों से इस पर ध्यान दिया जाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

 

(इब्न-ख़ल्दून 14वीं शताब्दी के अरब विद्वान थे। उनकी किताब ‘मुक़दमा’ दुनिया में समाज विज्ञान एवं इतिहास के शोध को विज्ञान के रूप में समझने वाली पहली पुस्तक मानी जाती है। आने वाले समय में यूरोप के विद्वानों में 18वीं सदी के बाद से उनके सिद्धांतों को आगे बढ़ाते हुए इतिहास लेखन को नई दिशा दी। 

अनुवाद वरिष्ठ इतिहासकार साक़िब सलीम ने किया है) 


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Saquib Salim

Saquib Salim is a well known historian under whose supervision various museums (Red Fort, National Library, IFFI, Jallianwala Bagh etc.) were researched. To his credit Mr. Salim has more than 400 published articles on history, politics, culture and literature in English and Hindi. Before pursuing his research and masters in modern Indian History from JNU, he was an electrical engineering student at AMU. Presently, he works as a freelance/ independent history researcher, writer and manages the website heritagetimes.in

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