आज भी लोकगीतों में इस घटना का जिक्र आता है जब हुमायूं एक राखी का संदेश पाकर ही अपनी मुंहबोली बहन की रक्षा करने के लिए चला आया।

यह उस जमाने की बात है जब देश के राजा-महाराजा बात-बात पर युद्ध के लिए तैयार हो जाते थे। तब चित्तौड़ पर बहादुर शाह ने हमला किया। रानी कर्णवती विधवा थीं और उनके पास इतनी सैन्य शक्ति नहीं थी कि वे अपने राज्य की रक्षा कर सकें।

तब उन्होंने हुमायूं को राखी भेजी और मदद के लिए प्रार्थना की। राखी तो हिंदुओं का पर्व है और हुमायूं मुस्लिम था, लेकिन उसने राखी का मान रखा और कर्णवती को बहन मानकर फैसला किया कि वह उसकी मदद जरूर करेगा।

हुमांयु उस समय बंगाल में सैनिक अभियान में व्यस्त थे। पर अपना प्रण निभाने के लिए हुमायूं एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ की ओर चल पड़ा। वह जमाना हाथी-घोड़ों की सवारी का था। सेना को साथ लेकर सैकड़ों किमी की दूरी तय करना आसान नहीं था और उसमें वक्त लगना स्वाभाविक भी था। हुमांयु की सहायता मिलने में रानी कर्नावती को देर हो गर्इ।

हुमायूं चित्तौड़ पहुंचा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 8 मार्च 1535 को रानी कर्णवती ने चित्तौड़ की वीरांगनाओं के साथ जौहर कर लिया और अग्नि में समा गईं। बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर कब्जा जमा लिया।

जब यह खबर हुमायूं तक पहुंची तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने हमला किया। हुमायूं को विजय मिली और उसने पूरा शासन रानी कर्णवती के बेटे विक्रमजीत सिंह को सौंप दिया।

इस घटना को सैकड़ों साल गुजर चुके हैं। आज हुमायूं नहीं हैं और न कर्णवती लेकिन कथा-कविताओं में इनका भाई-बहन का रिश्ता अमर है।

1905 र्इ में बंगाल विभाजन के दौरान कविगुरू रवीन्द्रनाथ टैगोर ने रक्षा बंधन को सामुदायिक त्यौहार के रूप में मनाने का आवहान किया।

उन्होने हिंदुओं और मुसलमानों को परस्पर को राखी बांधने के लिए कहा ताकि उनमें शांती, सदभाव और भार्इचारा बना रहे।कविगुरू का विचार था कि इससे विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों में राष्ट्रीय जागरूकता फैलेगी।

आजकल राखी केवल सगे और रिश्ते के भार्इ बहन का त्यौहार बनकर रह गया है। व्यापक अर्थ में देखा जाए तो राखी सदभाव और भार्इचारे का त्यौहार भी है

किसी के ज़ख्म पर चाहत से पट्टी कौन बांधेगा,
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बांधेगा ?