दूसरी आलमी जंग के दौरान 1939 से 1945 तक के छह साल के वकफ़े में लाखों यहूदियों का क़त्ल किया गया (यहूदियों ने तादाद साठ लाख बताया है ) , इस नरसंहार को “होलो कास्ट” का नाम दिया गया। होलो कास्ट और उसकी सच्चाई क्या है ? यह एक लंबी बहस है ! एक तरफ यहूदी राष्ट्र है जिसने होलोकास्ट घटना को बहुत बढ़ाया और एक हद तक मबालगे से भी काम लिया दूसरी तरफ़ उनके विरोधी है जिसने इस यहूदी नरसंहार को ही सिरे से झुठला दिया और इसे सिर्फ़ यहूदियों की मक्कारी कहा है ।

होलोकास्ट के लिए नाज़ी पार्टी और हिटलर को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है , एडॉल्फ़ हिटलर की ज़िंदगी का अध्ययन किया जाए तो ये बात सामने आती है कि सिपाही से नेता और फिर चांसलर बनने तक के सफ़र मे उसकी ताक़त मोहब्बत और नफ़रत दोनो थी , वो जर्मनी और जर्मन राष्ट्र से जहाँ मोहब्बत करता है वहीं यहूदी से उसे सख़्त नफ़रत थी ! एडॉल्फ़ हिटलर को यहूदी से नफ़रत थी , और उसने इसे कभी छुपाने की कोशिश नही की वो एक जगह लिखता है ‘लंबे अदध्यन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि यहूदी और उनकी पूँजीवाद ही सारी समस्या की जड़ है’, उसने एक जगह और लिखा है ”आज हम यहूदियों को चालाक और मक्कारी का पुतला समझते हैं लेकिन वह हमेशा से ऐसे ही थे और ऐसे ही रहेंगे”।

30 जनवरी 1933 को हिटलर जर्मनी का चांसलर बना, तब पॉल वॉन हिंडन बरग जर्मनी के राष्ट्रपति थे, 1934 में उनकी मृत्यु के बाद हिटलर जर्मनी का तानाशाह शासक बन गया ! अपने सत्ता के मजबूत होने के बाद उसने यहूदी विरोधी भावना को खुलेआम व्यक्त करना शुरू कर दिया ! जर्मनी में यह नारा आम हो गया कि ” यहां यहूदियों के लिए कोई जगह नहीं है ” (Jews are unwanted here)।

1935 में जर्मनी में नियम लागू किए गए जिनके तहत केवल जर्मन मूल के लोग ही जर्मनी की नागरिकता के हकदार होंगे ! जिससे जर्मनी के यहूदी राज्यविहीन होकर रह गए। 1937 के शुरू में यहूदियों को व्यापार से वंचित कर दिया गया। 1938 में फ्रांस में एक जर्मन सरकारी कर्मचारी की एक यहूदी युवक ने हत्या कर दी, इस घटना के खिलाफ जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ ग़ुस्से की लहर उठी और पूरा देश दंगों की चपेट में आ गया! इस दंगे को नाइट ऑफ ब्रोकन ग्लासेज का नाम दिया गया क्योंकि उस रात ग्लास से सजी दुकानें इस तरह तोड़े गए कि गलियाँ शीशे के टुकड़े से भर गई ! यहूदी व्यापारियों का कारोबार बंद करा दिया गया, यहूदी बच्चों को स्कूलों से और यहूदियों को नौकरियों से निकाल दिया गया, यहूदियों के सार्वजनिक स्थानों में पार्क, क्लब्ज़, सिनेमा हॉल, खेल के मैदानों, दाख़िले पर पाबंदी लगा दी गई! लगभग तीस हजार यहूदियों को इन दंगों के लिए जिम्मेदार ठहराकर गिरफ्तार कर लिया गया ! इन हालात से तंग आकर कई यहूदियों ने आत्महत्या कर ली जबकि बहुत से जर्मनी से भाग गये !

जुलाई 1938 में 32 देशों के प्रतिनिधि फ्रांस में जमा हुए , और इस बात पर मशविरा करने बैठे कि कौन सा देश अपने यहाँ कितने यहूदी को पनाह दे सकता है ! सभी देशों ने पनाह देने से इंकार कर दिया , यहाँ तक के मीटिंग बुलाने वाले अमेरिका ने भी यहूदी को अपने यहाँ पनाह देने से इंकार कर दिया ।

1939 में दूसरी आलमी जंग शुरू हुई , जर्मनी ने रूस पर हमला किया और उसके बाद यहूदियों का जीना मुश्किल हो गया ! जगह जगह कॉन्सेंट्रेशन कैम्प बनाए गए जहाँ यहूदियों को बंदी बना कर लाया जाता , जो जवान होते उन्हें मेहनत मशक़्क़त के लिए रखा जाता बाक़ी की हत्या ज़हरीली गैस के ज़रिए कर दी जाती ! बहुत सारे पर मेडिकल टेस्ट किए गए जिसकी वजह से ये कहना मुश्किल था कि वो ज़िंदा थे या मर चुके।

जहाँ एक तरफ़ होलोकास्ट की सैंकड़ों दर्द भरी ख़ौफ़नाक कहानी है तो दूसरी तरफ़ इसे मनगढ़ंत कहानी बताने वाले लोग भी है , युद्ध के बाद जितने भी नाज़ी ऑफ़िसर गिरफ़्तार हुए उनपर तशदुद से बयान दिलवाने का जहाँ आरोप है वहीं मनगढ़ंत बताने वाले कुछ दस्तावेज़ भी पेश करते हैं जिससे होलोकास्ट की कहानी पर सवालिया निशान लग जाता है।

होलोकास्ट को सबसे पहले मनगढ़ंत बताने वाले फ़्रान्स पीकर थे उन्होंने अपनी किताब imperism में होलोकास्ट को सिरे से ख़ारिज कर दिया, इसके बाद उनपर मुसीबत का पहाड़ टूटा, किसी भी मुल्क में पनाह लेना जब मुश्किल हो गया तब मिस्र में जमाल नसिर ने पनाह दी लेकिन यहाँ FBI ने गिरफ़्तार कर लिया और क़ैद की हालात में मौत हो गयी, कहते है सायनायड खा कर आत्महत्या कर लिया था उन्होंने लेकिन उन तक सायनायड पहुँचा कैसे ये आज तक बताया नही गया ।

फ्रांसीसी इतिहासकार Paul Rassinier द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी की कैद में रहा, अपनी किताब Drama of European Jews , 1964 में लिखता है कि ” इलाज की सुविधाओं की कमी, घटिया और अपर्याप्त भोजन, अमानवीय मेहनत और परिश्रम और निमोनिया ही वह वजह थे जो उनके कंसंट्रेशन शिविरों में कैदियों की मौत का कारण बने” ।

दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहाँ होलोकास्ट को मनगढ़ंत बताना अपराध की श्रेणी में है ! रेड क्रॉस ने सेकंड वर्ल्ड वार में एक अच्छा रोल प्ले किया था, उनकी रिसायी नाज़ी कैम्प तक थी, उन्होंने एक दस्तावेज़ तैयार किया था जो आज यहूदियों के हाथ में और इसे सार्वजनिक करने पर पाबंदी है ! तो ये सवाल जाएज है कि अगर होलोकास्ट सच है तो अनुसंधान पर पाबंदी क्यूँ ?

सेकंड वर्ल्ड वार के बाद इन सब हालातों के आधार पर यहूदी के लिए समर्थन का आंदोलन चलाया गया , उन्हें एक अलग मुल्क देने की बात की गयी , Europe की नज़र पहले से ही फ़िलिस्तीन पर थी और वहाँ यहूदियों की बस्ती बसा दी गयी ।

ज़ुल्म हर हाल में ज़ुल्म है हत्या चाहे 60 लाख की हो या 60 हज़ार की और इस हत्या का कोई तुक नही था मरने वाले में बच्चे, बूढ़े और औरते भी शामिल थी ! लेकिन एक सवाल मेरे मन में है के यहूदी पर ज़ुल्म किसने किया ? मुसलमानों ने या ईसाई ने ? अगर अत्याचार करने वाले मुसलमान नहीं थे तो फिर जवाबी अत्याचार का शिकार मुसलमान क्यों बनाए गए? इजरायल की स्थापना निर्दोष और शांतिपूर्ण फिलिस्तीनियों के लाशों पर क्यों किया गया? होलोकास्ट के जवाब में फिलिस्तीनी मुसलमानों के नरसंहार का क्या तुक है? समय बीत जायेगा , मगर मेरे सवाल का जवाब शायद मुझे नही मिलेगा । मुझे नहीं मालूम की इसकी वजह क्या है ।