Ashish Jha

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि सपने वो नहीं होते जो बंद आंखों से दिखी जाये सपने तो वो होते हैं जो आपकी नींद चुरा ले…सचमुच ऐसा ही एक सपना था दरभंगा के रेल इतिहास का संरक्षण। 1976 में बरौनी में पैलेस ऑन व्हील जला डाला गया। उसके बाद नरगौना में रखे दूसरे सैलून को भी टूकडों में बांट कर बेच डाला गया। बडी रेल लाइन बनने के बाद कई इंजनों को दरभगा में ही तोडा गया। कई दरभंगा से दूसरे लोग उठा ले गये। पटरियां उखाड ली गयी और 1874 में बना प्लेंटफार्म तोडा जाने लगा। इसमाद का प्रतिनिधिमंडल मिथिला विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति से मिला और इसके संरक्षण की गुहार लगायी। तत्कालीन कुलपति प्रो साकेत कुशवाहा ने तत्का‍ल पहल की और उसे संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया। योजना तैयार हुई कि यहां एक रेल संग्रहालय बनाया जाये। इंजनों की तलाश करने का काम इसमाद को ही सौंपा गया। रेलवे से संपर्क करने पर पता चला कि उसके पास कोई हैरिटेज इंजन नहीं है। पत्रकार शशिमोहन जी ने रैयाम के इंजन को बेचे जाने की सूचना दी। फिर लोहट और सकरी के परिसरों को खंगालने का काम हैरिटेज फोटोग्राफर संतोष कुमार और दरभंगा सिटी के मोडरेटर अभिनव को सौंपा गया। दोनों ने जो रिपोर्ट सौंपी उससे काम आगे बढा। इसी बीच कुलपति साकेत कुशवाहा का कार्यकाल खत्म हो गया और नये कुलपति इस योजना को लेकर गंभीर नहीं हुए। इतना ही नहीं उन्‍होंने तो नरगौना टर्मिनल पर भवन निर्माण ही शुरु कर दिया गया। इसी बीच हैरिटेज फोटोग्राफर संतोष कुमार की चित्र प्रदर्शनी कामेश्वर नगर के चौरंगी पर लगायी गयी और उसमें पूर्व मध्य रेलवे के डीआरएम एके जैन मुख्य अतिथि बन कर आये। उन्होंने तिरहुत रेलवे के इतिहास को करीब से देखा और इसे संरक्षित करने की योजना पर काम शुरु हुआ। कई बार कुलपति से उनकी मुलाकात की कोशिश हुई लेकिन कुलपति तैयार नहीं हुए। अंतत: बात दरभंगा जक्शन पर लगाने की हुई। रेल प्रशासन ने इंजन की वास्तिविक स्थिति पर रिपोर्ट मांगा। संतोष कुमार को टीम लीडर के तौर पर इस पूरी योजना का काम सौंपा गया। संतोष कुमार ने लोहट के इंजन की स्थिति, उसके मालिकाना हक और उसको प्राप्ता करने की प्रक्रिया से रेलवे को अवगत कराया। इसके बाद रेलवे ने बिहार सरकार से संपर्क साधा और इंजन की मांग की।बिहार सरकार के लिए भी यह इंजन देना आसान नहीं था। कारखानों को लेकर सरकारी मेहकमा काफी चौकस रहता है। ऐसे में प्रधान सचिव ए सिद्धार्थ ने इसके महत्व को समझा और प्रस्ताव कैबिनेट को भेजी। मुख्य्मंत्री नीतीश कुमार ने प्रस्ताव पर बिना देर किये मुहर लगा दी। विधायक संजय सरावगी के सहयोग से विभाग ने इंजन देने का पत्र रेलवे को भेज दिया। इसके बाद रेलवे ने अपनी टीम को इंजन लाने के लिए तैयारी शुरु करने को कहा। जिम्मा सौंपा गया चंद्रशेखकर जी को। सबसे पहले लोहट में इंजन के आसपास के जंगलों को साफ किया गया। फिर गैरेज को तोडा गया। 26 चक्के का दो ट्रक पता नहीं कितने वर्षों बाद उस सडक पर लोगों ने देखा। ट्रक को देखते ही लोगों में चर्चा शुरु हो गयी।। रेल विभाग और इसमाद की टीम के बीच तालमेल का ही नतीजा रहा कि इस परियोजना को सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। सरकार ए तिरहुत की राजधानी दरभंगा में यह इंजन को लाने के दौरान लोहट में एक संस्था ने विरोध भी किया, लेकिन संतोष, शशिमोहन, पंकज प्रसुन, आदित्य झा, अभिनव जैसे तमाम लोगों ने मामले को सुलझाया और यह इंजन एक धरोहर के रूप में हमसब के बीच स्थापित हो गया है। याद रखें पिछले 40 वर्षों में हमने कई हैरिटेज इंजन और डिब्बों को टूटते जलते देखा है..इसे बचाने का सकून पूरे दरभंगा ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों को होना चाहिए.. क्यों इस इलाके में यह एक नयी परंपरा है एक सपन…..डीआरएम एके जैन जैसे अधिकारियों के बिना ऐसे सपने पूरे नहीं हो सकते हैं। रेलवे मिथिला के इस धरोहर को लेकर जितना गुमान करेगा उससे कहीं अधिक मिथिला के लोगों को जैन साहेब पर अभिमान होगा..आज उन्होंने पूरे तिरहुत का दिल जीत दिया..