ध्रुव गुप्त

सुप्रसिद्ध उर्दू शायर, प्रखर साम्राज्यवाद-विरोधी पत्रकार, संपूर्ण स्वराज का नारा देने वाले निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में एक मौलाना हसरत मोहानी उर्फ़ फजलुर्र हसन अपने दौर के विलक्षण व्यक्तित्व रहे थे। वे सुलझे हुए राजनीतिज्ञ और निर्भीक योद्धा होने के साथ मुहब्बत के बारीक अहसास के हरदिलअज़ीज शायर भी थे। उन्होंने ज्यादा नहीं लिखा, लेकिन उनकी शायरी की मुलायम संवेदनाएं और नाज़ुकबयानी हैरान कर देने वाली हैं। हसरत मोहानी की पुण्यतिथि (13 मई,1951) पर खेराज़-ए-अक़ीदत, उनकी एक कालजयी ग़ज़ल के साथ !

चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है
हमको अबतक आशिक़ी का वो ज़माना याद हैै।

तुमसे मिलते ही वो कुछ बेबाक़ हो जाना मेरा
और तेरा दांतों में वो ऊंगली दबाना याद हैै।

तुमको जब तनहा कभी पाना तो अज़राहे लिहाज़
हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है।

खींच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ़ातन
और दुपट्टे से तेरा वो मुंह छुपाना याद है।

ग़ैर की नज़रों से बचके सबकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है।

आ गया जब वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे फ़िराक
वो तेरा रो रोके मुझको भी रुलाना याद है।

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है।

बेरुखी के साथ सुनना दर्द ए दिल की दास्तां
वो कलाई में तेरा कंगन घुमाना याद हैै।

वक़्त-ए-रुखसत अलविदा का लफ्ज़ कहने के लिए
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है

चोरी चोरी हमको तुम आकर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़री पर अबतक वो ठिकाना याद है

लेखक पुर्व अाईपीएस हैं।