जामा मस्जिद का दरवाज़ा। एक कंधे की टेक लगाए खड़ा एक शख्स। रुंधा गला। एक तरफ़ झुकी गर्दन, भर्राती आवाज़… रुक जाओ मुसलमानो, तुम्हे जामा मस्जिद की मीनारे पुकार रही हैं….. एक मज़बूत आवाज़ जिसने टूटते रिश्तों, बिखरते भरोसे को रोक दिया। हर शख्स ठहर गया जो जहाँ था।

दौड़ कर अपने खड़े भाइयो को गले लगा लिया और कहा, हम जैसे भी रहे, खाना हो य न हो मगर अब तुमको नही छोड़ेंगे। इसी माटी में दफ़न होंगे। वादा।

जामा मस्जिद की दीवारें गवाह हैं की बंटते हुए लोगों को उसके सहन से ही जोड़ा गया था। उसके दरवाज़े पर खड़े शख़्स ने वोट की नही बल्कि दिल जोड़ने की अपील की थी। उसकी मीनारों से उस बूढ़े शख्स की टूटती हुई आवाज़ भी इंसान को रोने को मजबूर कर रही थी। वोह लाल दीवारें देख रहीं थी कोई कैसे इतने दिलों पर राज कर सकता है। जब हर तरफ़ अपनो से भरोसा टूट रहा था तब उसकी आवाज़, हाँ सिर्फ़ आवाज़ लोगों में ऐसा भरोसा दे गई की इंसान इस माटी का ही होकर रह गया।

यक़ीन न हो तो हमारे ख़मीर में शामिल उस शख्स को देख लो जो अपने आप में चलता फिरता इंस्टिट्यूट था। जिसकी ज़मीन पर जितनी पकड़ थी उतनी ही कलम पर। उतनी ही ज़बान पर। तभी तो वोह दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र का सबसे पहला शिक्षामंत्री बने। उनकी रखी बुनयाद पर ही आज हम झण्डे गाड़ रहे हैं।

वह अपने किरदार, बातो में एक सा वज़न रखने वाले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे। आज उन्हें याद करलें। आज उनको रोज़ से ज़्यादा याद करने का दिन है। उनकी जामा मस्जिद की स्पीच को सुन लीजिये। आपके पाँव खुद बखुद नफ़रत से दूर मोहब्बत को जोड़ने बढ़ जाएँगे।

हफ़ीज़ किदवई : लेखक लगातार #हैशटैग का उपयोग कर कई मुद्दों पर लिखते रहे हैं।